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अगले 50 वर्षों में खत्म हो सकती हैं भारत की 400 भाषाएं: भाषाविद गणेश एन. देवी

शायद हम जानते भी नहीं कि एक भाषा मरती है तो उसके साथ क्या-क्या मर जाता है. हम इस बात पर जरूर झगड़ते हैं कि हमारी भाषा आठवीं अनुसूची में नहीं आई और उनकी भाषा क्यों आ गई.

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अगले 50 वर्षों में खत्म हो सकती हैं भारत की 400 भाषाएं: भाषाविद गणेश एन. देवी

हम जानते भी नहीं कि जब एक भाषा मरती है तो उसके साथ क्या-क्या मर जाता है

खास बातें

  1. भाषाविद् गणेश एन. देवी ने किया है भाषाओं पर सबसे बड़ा सर्वे
  2. भारत की 780 भाषाओं में से 400 पर विलुप्त होने का खतरा
  3. दुनिया की 4,000 भाषाओं के 50 वर्षों में खत्म होने का खतरा
नई दिल्ली: विकास की दौड़ में बहुत कुछ पीछे छूट रहा है और बहुत कुछ ऐसा है जो खत्म हो रहा है. कह सकते हैं मर रहा है. कोई जीब-जंतु, कोई धरोहर, कुछ परंपराएं, कुछ संस्कृति और कुछ भाषाएं भी. जी हां, रिसर्च बताती है कि अगर यही हाल रहा तो अगले 50 सालों में भारत की करीब 40 भाषाएं दम तोड़ देंगी. शायद हम जानते भी नहीं कि एक भाषा मरती है तो उसके साथ क्या-क्या मर जाता है. हम इस बात पर जरूर झगड़ते हैं कि हमारी भाषा आठवीं अनुसूची में नहीं आई और उनकी भाषा क्यों आ गई. लेकिन जो असल हालात है्ं उस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है.
 
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भारत की कुल 780 भाषाओं में से 400 पर आगामी 50 वर्षों में विलुप्त होने का खतरा है. भाषाविद् गणेश एन. देवी ने यह बात कही है. उनका मानना है कि प्रमुख भारतीय भाषाओं मसलन हिंदी, बांग्ला, मराठी और तेलगु को अंग्रेजी से असल में कोई खतरा नहीं है. उन्होंने कहा कि दुनिया की 4,000 भाषाओं के अगले 50 वर्षों में विलुप्त होने का खतरा है और उनमें से 10 प्रतिशत भाषाएं भारत में बोली जाती हैं.

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देवी ने दावा किया गया है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा भाषाई सर्वेक्षण है. उन्होंने कहा कि दुनिया की 6,000 भाषाओं में से लगभग 4,000 भाषाओं पर वास्तविक नहीं लेकिन विलुप्त होने का संभावित खतरा मंडरा रहा है. 4,000 भाषाओं में से 400 भाषाएं यानी दस फीसदी भाषाएं भारत में बोली जाती हैं.

इसका मतलब है कि विलुप्ति की कगार पर होने वाली 10 फीसदी भाषाएं भारत में बोली जाती हैं. भारत में कुल 780 भाषाओं हैं. उन्होंने कहा कि यह धारणा गलत है कि अंग्रेजी हिंदी, बांग्ला, तेलगु, मराठी, कन्नड़, मलयालम, गुजराती और पंजाबी जैसी अहम भाषाओं को तबाह कर सकती है. यह भाषाएं दुनिया की पहली 30 भाषाओं में शामिल हैं. ये 30 भाषाएं वे हैं जो कम से कम एक हजार वर्ष पुरानी हैं और करीब दो करोड़ लोग इन्हें बोलते हैं. इन भाषाओं को फिल्म उद्योग, अच्छी संगीत परंपरा, शिक्षा की उपलब्धता और फलते-फूलते मीडिया का समर्थन हासिल है.

VIDEO: हमारी कई भाषाएं मर क्यों रही हैं? उन्होंने कहा कि सबसे ज्यादा खतरा देश के तटीय इलाकों में बोली जाने वाली भाषाओं को है. उन्होंने कहा कि कई भाषाएं लुप्त होने के कगार पर हैं और इनमें से ज्यादातर तटीय भाषाएं हैं. इसका कारण यह है कि तटीय इलाकों में आजीविका सुरक्षित नहीं रही. कॉरपोरेट जगत गहरे समुद्र में मछली पकड़ने लगा है. दूसरी ओर पारंपरिक मछुआरा समुदायों को तट से दूर अंदर की ओर जाना पड़ा है जिससे उनकी भाषाएं छूट गई हैं.

बहरहाल, उन्होंने कहा कि कुछ जनजातीय भाषाओं में हाल के वर्षों में वृद्धि दिखाई दी है. इस परियोजना के तहत 27 राज्यों में 3,000 लोगों के दल ने देश की कुल 780 भाषाओं का सर्वेक्षण किया गया. भाषा अनुसंधान एवं प्रकाशन केंद्र, वडोदरा और गुजरात के तेजगढ़ में आदिवासी अकादमी के संस्थापक निदेशक गणेश देवी ने कहा कि इस अध्ययन में शेष राज्यों सिक्किम, गोवा और अंडमान निकोबार द्वीप समूह का सर्वेक्षण दिसंबर तक पूरा कर लिया जाएगा.

(इनपुट भाषा से भी)


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