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साइकिल से साढ़े चार हजार किलोमीटर का सफर, ताकि पढ़ सकें बेटियां, बढ़ सकें बेटियां...

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साइकिल से साढ़े चार हजार किलोमीटर का सफर, ताकि पढ़ सकें बेटियां, बढ़ सकें बेटियां...

सुमित और प्रिस्लिया.

खास बातें

  1. साइकिल से कन्याकुमारी से जम्मू-कश्मीर के खरदुंग ला तक का सफर
  2. रोज लगभग 100 किलोमीटर साइक्लिंग करते हैं सुमीत और प्रिस्लिया
  3. गांवों में लड़कियों को शिक्षित करने के लिए कर रहे हैं जागरूक
नई दिल्ली: अंग्रेज़ी में एक कहावत है- Educate a man, you educate one person, educate a women, you educate a complete family. यानी आप एक पुरुष को पढ़ाते हैं तो एक व्यक्ति शिक्षित होता है और अगर एक महिला को पढ़ाते हैं तो पूरा परिवार. इसी मकसद के साथ 22 साल की प्रिस्लिया मदान और 26 साल के सुमीत पारींगे का लंबा सफर शुरू होता है. महाराष्ट्र के पनवेल के निवासी यह दोनों 'बेटी पढ़ाओ' का नारा लेकर साइकिल से कन्याकुमारी से जम्मू कश्मीर के खरदुंग ला तक जा रहे हैं.

हर दिन इनके सफर की शुरुआत सुबह सात बजे हो जाती है और यह लोग रोज लगभग 100 किलोमीटर साइक्लिंग करते हैं. करीब 4400 किलोमीटर के इस सफर में दोनों 11 राज्यों से होते हुए गुजर रहे हैं जिनमें केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र, दिल्ली, यूपी, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर शामिल है. इस दौरान दोनों स्कूलों में जाकर और गांवों में लोगों से मिल रहे हैं. वे उन्हें लड़कियों की शिक्षा की अहमियत के बारे में जागरूक कर रहे हैं.
 
लड़कियों के लिए शिक्षा जरूरी
भारत में लड़कियों के लिए मां की कोख से ही चुनौतियां शुरू हो जाती हैं. आज भी कई राज्यों में लड़का न होने पर मां-बच्ची दोनों को ही नफरत की नजर से देखा जाता है. बड़े होने पर लड़कों के मुकाबले उन्हें कम शिक्षा देने के साथ-साथ उनकी जल्द से जल्द शादी करा दी जाती है.
 

सुमीत कहते हैं कि दक्षिण भारत में लड़कियों की साक्षरता दर काफी अच्छी है लेकिन महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के गांवों और हरियाणा जैसे राज्यों में लड़कियों को शिक्षित करना बेहद जरूरी है. उनके मुताबिक आज हर क्षेत्र में लड़कियां आगे निकल रही हैं. समाज में लड़का-लड़की को लेकर भेदभाव खत्म होना चाहिए. वे कहते हैं कि “मुझे बहुत खुशी होती है जब मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर साइक्लिंग कर रही प्रिस्लिया को देखकर लोग खुश होते हैं.”

प्रिस्लिया, कंप्यूटर साइंग ग्रेजुएट और क्लासिकल डांसर हैं. अपने सफर के दौरान वे लड़कियों को पढ़ने-लिखने और जागरूक करने की कोशिश करती हैं. वे कहती हैं “प्राथमिक शिक्षा का सबको अधिकार है और उससे लड़कियों को दूर नहीं रखा जा सकता है.”
 

कैसे की तैयारियां?
इस सफर के लिए दोनों ने काफी तैयारियां कीं. हालांकि प्रिस्लिया कहती हैं कि यह पहली बार नहीं है जब वे ऐसी किसी मुहिम के लिए साइक्लिंग कर रही हैं.  इससे पहले वे 1800 किलोमीटर की पनवेल से कन्याकुमारी और मनाली से खारदुंग ला का साइकिल के जरिए सफर कर चुकी हैं. सुमीत के मुताबिक साइक्लिंग उनके लिए जुनून है. उन्होंने इस सफर के लिए खुद को शारिरिक से लेकर मानसिक तौर पर पूरी तरह से तैयार किया था और इसी वजह से वे रोजाना इतना लंबा सफर तय कर पा रहे हैं.

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लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए एक एनजीओ 'इम्पैक्ट' और 'गोदरेज' उनकी मदद कर रहे हैं. अब तक के इस सफर में दोनों ने 28 लाख से ज्यादा की रकम जुटा ली है और मकसद 50 लाख रुपये जुटाना है ताकि इस पैसे से वे लड़कियां भी स्कूल जा सकें जो अब तक शिक्षा से महरूम रही हैं.

'इम्पैक्ट' की सीईओ निर्मला टंडन कहती हैं कि समाज में लोगों की सोच बदलना जरूरी है और इसके लिए लड़कियों और महिलाओं की काउंसलिंग की जा रही है ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें. निर्मला टंडन के मुताबिक लड़कियों को पढ़ाने की इम्पैक्ट की यह मुहिम पिछले कई सालों से चल रही है लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की 'बे
टी बचाओ बेटी पढ़ाओ' मुहिम से इन्हें भी बल मिला है.
 

बांस की बनी साइकिल
यूं तो यह सफर कई मायनों में अहम है, लेकिन इसमें इस्तेमाल हो रही साइकिल भी खास है जो कि बांस की बनी है. सुमीत के मुताबिक यह साइकिल स्टील से बनी साइकिल से ज्यादा आरामदेह है. इसमें स्टील की साइकिल के मुकाबले कम झटके लगते हैं. इसे गोदरेज की तरफ से सुमीत और प्रिस्लिया को दिया गया है. यह आम तौर पर बाजार में उपलब्ध नहीं है. गोदरेज की तरफ से इस मुहिम के प्रोजेक्ट मैनेजर आकाश उजवाने ने बताया कि बांस की इस साइकिल को क्रेग कैल्फ़ी ने डिज़ाइन किया है जो अमेरिका मूल के साइकिल डिजाइनर हैं. गोदरेज ने  भारत में एक इंटरनेशनल वर्कशॉप के लिए कैल्फ़ी को निमंत्रण दिया और उन्होंने 16 लोगों को बांस से बनी साइकिल बनाने का प्रशिक्षण दिया.
 

महिलाओं को सशक्त बनाना ज़रूरी
ओलिंपिक में देश को पदक दिलाने वालीं पीवी सिंधु हों या साक्षी मलिक... या फिर अपने प्रदर्शन से सबका दिल जीतने वालीं दीपा कर्मकार, तीनों ने साबित किया है कि लड़कियों को सशक्त करने की नींव परिवार से ही पड़ती है. बांस की यह साइकिल जिंदगी की हकीकत बताती है जिसमें दो पहिये साथ चलते हैं, एक दूसरे को सहारा देते हैं और एक पहिये के बिना दूसरा पहिया किसी काम का नहीं. लड़की भी जिंदगी की साइकिल का एक पहिया है, उसके बिना परिवार की साइकिल नहीं चल सकती है. उसे भी सम्मान चाहिए, प्यार चाहिए, दुलार चाहिए.


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