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चुनाव के बाद बूथ के आधार पर गिनती क्यों? SC ने केन्‍द्र से मांगा जवाब

देश में चुनाव के बाद बूथ के आधार पर मतगणना के खिलाफ दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि आखिर कानून में संशोधन कर बूथ के आधार की बजाए सारी EVM की एक साथ गिनती करने में क्या परेशानी है?

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चुनाव के बाद बूथ के आधार पर गिनती क्यों? SC ने केन्‍द्र से मांगा जवाब

फाइल फोटो

खास बातें

  1. चुनाव के बाद बूथ के आधार पर मतगणना के खिलाफ दाखिल PIL पर सुनवाई
  2. सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते में हलफनामा दाखिल कर जवाब देने को कहा है
  3. केंद्र ने फिर दोहराया कि इस संबंधी में राजनीतिक दलों की मीटिंग हुई थी
नई दिल्ली: देश में चुनाव के बाद बूथ के आधार पर मतगणना के खिलाफ दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि आखिर कानून में संशोधन कर बूथ के आधार की बजाए सारी EVM की एक साथ गिनती करने में क्या परेशानी है?  सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते में हलफनामा दाखिल कर जवाब देने को कहा है. 

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वहीं केंद्र ने फिर दोहराया कि इस संबंधी में राजनीतिक दलों की मीटिंग हुई थी और इसमें इसका विरोध किया गया है. कोर्ट दो हफ्ते बाद मामले की सुनवाई करेगा. एक जनहित याचिका में कहा गया है कि फिलहाल मतगणनना के दौरान बूथ के आधार पर वोटों की गिनती होती है जिससे ये पता चल जाता है कि किस इलाके के लोगों ने किस प्रत्याशी को वोट दिए है. इससे जीतने वाला प्रत्याशी उस इलाके से भेदभाव करता है जहां के लोगों ने वोट नहीं मिले हैं. इसलिए वोटों की गिनती एक साथ होनी चाहिए. इस मामले में चुनाव आयोग ने दलील दी थी कि इसे लेकर केंद्र सरकार के पास प्रस्ताव भेजा गया है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार पर नाराजगी जाहिर करते हुए पूछा था कि वो इस नियम को लागू क्यों नहीं कर रही है. 

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सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने एक बार फिर बूथवाइज मतगणना को सही ठहराया था. केंद्र ने चुनाव आयोग की एक साथ मतगणना के सुझाव का विरोध किया. केंद्र सरकार ने कहा कि बूथ के आधार पर मतगणना पार्टी और उम्मीदवार के लिए ज्यादातर बेहतर है. क्योंकि इससे पार्टी या प्रत्याशी को ये पता चल जाता है कि किस इलाके में उसे ज्यादा वोट मिले हैं और किस हिस्से में उसे और काम करना चाहिए.

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16 सिंतबर 2016 को मंत्रीमंडल समूह की फाइनल मीटिंग की गई। इस मीटिंग में ये तय हुआ कि बूथ के आधार पर मतगणना पार्टी और उम्मीदवार के लिए बेहतर है. सरकार ने ये भी कहा है कि ये तर्क सही नहीं है कि जिन इलाके के लोगों ने वोट नहीं दिया, वहां जीतने के बाद काम नहीं करेंगे. ये मीडिया एक्टिविज्म के जमाने में संभव नहीं है. अगर किसी ने ऐसा किया तो मीडिया और सोशल माडिया पर ऐसे मामले तुरंत फैल जाएंगे जिससे जनप्रतिनिधि और पार्टी पर दबाव आ जाएगा.
 


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