अकोला : किराये पर बैल लेने के लिए नहीं हैं पैसे, किसान ने बेटे को खेत में जोता

अकोला : किराये पर बैल लेने के लिए नहीं हैं पैसे, किसान ने बेटे को खेत में जोता

मुंबई:

महाराष्ट्र के अकोला में बरसात हो रही है, कई किसानों के लिये ये खुशखबरी है लेकिन कुछ के लिये मुसीबतें कम नहीं हुई हैं। ज़िले के दहीगांव के रहने वाले अरुण गावंडे उनमें से एक हैं, बैल कर्ज पर ले नहीं सकते इसलिये खेत जोतने बेटे की मदद ले रहे हैं।

खेती में मदद के लिये अरुण ने 12वीं में पढ़ने वाले अपने बेटे ऋषिकेश को वापस बुला लिया है, वो फिलहाल स्कूल में नहीं खेत में है, खेत जोतने के लिए बैल की जगह खुद मशक्कत कर रहा है। 2 एकड़ खेत में सोयाबीन की बुवाई करनी है लेकिन पिता के पास किराये पर बैल लेने के पैसे नहीं थे सो बेटे को जोत दिया।

गांव में बरसात 4 साल बाद आई है, इस उम्मीद में पिता के साथ पसीना बहा रहे हैं कि बारिश के साथ राहत की फसल उगेगी। ऋषिकेश गावंडे का कहना है कि वो पढ़ना चाहता है लेकिन पिताजी के पास पैसे नहीं हैं। ''पिताजी ने बोला घर आ जाओ पैसे नहीं हैं, पैसे कैसे देंगे पढ़ने के लिये। दो तीन दिन से खेत जोत रहा हूं, बारिश आई बीज सड़ गया तो दुबारा कर रहा हूं। उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती, 3 बार अटैक आया 2009 में।"

अरुण गावंडे ने महाराष्ट्र बैंक से 36 हज़ार का कर्ज लिया था, 3 साल से सूखे की वजह से फसल बर्बाद हो रही है, सो कर्ज चुका नहीं सके। प्रशासन ने खरीफ की बुवाई के लिये कर्ज चुकाने की अनुसूची फिर से बनाने की बात कही थी, लेकिन वक्त पर पैसे मिले नहीं। बादल आ गये, ऐसे में बीज और खेत जेब की राह तकने को तैयार नहीं थे। अरुण ने बेटे को बैल बनाने की बात पर हामी भरते हुए कहा कि "बैल बनाया क्योंकि पैसा नहीं आया, बीज लाने के पैसे नहीं हैं, बैल वालों को क्या देंगे? मां की दवा लानी पड़ती, बाजार करना पड़ता, परिस्थिति ऐसी नहीं है। बच्चे और मैं मिल कर जुताई कर लेंगे। 3 साल हो गये, 2007 में पिता गुजर गये, कोई पैसा नहीं है। पूरी जवाबदेही मेरे ऊपर है। मैंने कहा 3 साल से कर्ज नहीं मिला, बोला नहीं है पैसा।

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प्रशासन हकीकत जानने के बाद इस मामले में अरुण के परिवार को मदद का भरोसा दे रहा है। अकोला में एसडीओ राजस्व संजय खडसे ने कहा, "हमने जांच की है, तहसीलदार से रिपोर्ट मंगवाई है प्रशासन की तरफ से जो भी मदद होगी हम करेंगे।"

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2015 में महाराष्ट्र में लगभग 3000 किसानों ने खुदकुशी की थी। अप्रैल से पहले इस साल भी औसतन 3 किसान खेती या उससे जुड़ी दिक्कतों की वजह से मौत को गले लगा रहे थे, फौरी मामलों में कार्रवाई फौरन हो तो राहत मिले नहीं तो राहत ढूंढने पता नहीं कितने बच्चों को बस्ता छोड़ खेत में यूं ही जुतना पड़ेगा।