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ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने ट्रिपल तलाक के खिलाफ जनहित याचिकाओं का किया विरोध

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ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने ट्रिपल तलाक के खिलाफ जनहित याचिकाओं का किया विरोध

फाइल फोटो

नई दिल्‍ली: ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि यह अवधारणा गलत है कि निकाह और तलाक के मामले में मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव होता है. इस्लाम पहला ऐसा धर्म था जिसने महिलाओं को समान अधिकार दिया था. सुप्रीम कोर्ट को दिए अपने लिखित जवाब में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि तलाक, हलाला और बहुविवाह को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार नहीं किया जाना चाहिए. बोर्ड का कहना है कि ये मसले न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं. बोर्ड ने कहा कि इस्लामिक कानून का परीक्षण संविधान के प्रावधानों की कसौटी पर नहीं किया जाना चाहिए. बोर्ड ने कहा कि याचिकाओं में जो मसले उठाए गए हैं वह विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हैं.

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तलाक निजी मसला है, इसे मूल अधिकारों के दायरे में लाकर नहीं देखा जा सकता. बोर्ड का कहना है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ को बिना समझे याचिकाएं दायर की गई हैं. संविधान सभी धार्मिक समूह को अपने धर्म के मामलों में निर्णय लेने का अधिकार प्रदान करता है. याचिकाकर्ता निजी मसले को मूल अधिकार बता रहे हैं, लिहाजा इन पर विचार नहीं किया जाना चाहिए. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था ट्रिपल तलाक मामले की सुनवाई के लिए 5 जजों की संविधान पीठ बनाई जा सकती है.

CJI खेहर ने ये इशारा करते हुए कहा था कि इस मामले में कानूनी पहलुओं पर ही सुनवाई होगी. सभी पक्षों के एक-एक शब्द पर गौर सुप्रीम कोर्ट करेगा. हालांकि कोर्ट कानून से अलग नहीं जा सकता. जस्टिस खेहर ने कहा है कि कोर्ट 11 मई से गर्मियों की छुट्टियों में सुनवाई शुरू करेगा. 30 मार्च को मामले के मुद्दे तय किए जाएंगे. इससे पहले सारे पक्ष अपने लिखित जवाब दाखिल करें.


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