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CAA के खिलाफ प्रदर्शनों पर फिर बोले नोबेल विजेता अमर्त्य सेन- 'अगर विपक्ष की एकता नहीं है तो...'

अमर्त्य सेन का नागरिकता (संशोधन) कानून या सीएए (CAA) को लेकर कहना है कि यह संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है.

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CAA के खिलाफ प्रदर्शनों पर फिर बोले नोबेल विजेता अमर्त्य सेन- 'अगर विपक्ष की एकता नहीं है तो...'

अमर्त्य सेन (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:

संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) को रद्द करने की मांग करने के कुछ ही दिन बाद नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन (Amartya Sen) ने सोमवार को कहा कि किसी भी कारण के लिए प्रदर्शन करने की खातिर विपक्ष की एकता जरूरी है. उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष में एकता नहीं होने के बावजूद प्रदर्शन जारी रह सकते हैं. वह सीएए, एनआरसी और एनपीआर को लेकर देशभर में चल रहे प्रदर्शनों के संबंध में पत्रकारों के सवालों का जवाब दे रहे थे. सेन ने सोमवार रात पत्रकारों से कहा, ‘किसी भी तरह के प्रदर्शन के लिए विपक्ष की एकता आवश्यक है. ऐसे में प्रदर्शन आसान हो जाते हैं. अगर प्रदर्शन जरूरी बात के लिए हो तो एकता जरूरी है.'

उन्होंने कहा, ‘लेकिन अगर एकता नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम प्रदर्शन बंद कर देंगे। जैसा कि मैंने कहा, एकता से प्रदर्शन आसान हो जाता है, लेकिन अगर एकता नहीं है तो भी हमें आगे बढ़ना होगा और जो जरूरी है, वह करना होगा.'


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बता दें, अमर्त्य सेन (Amartya Sen) ने नागरिकता (संशोधन) कानून (Citizenship Amendment Act)  या सीएए (CAA) को लेकर कहा था कि यह संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है. अमर्त्य सेन ने बेंगलुरु में इन्फोसिस में संवाददाताओं से बात करते हुए कहा था, 'सरकार द्वारा बनाए गए CAA कानून को मेरी नजर में सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक होने के आधार पर रद्द कर दिया जाना चाहिए क्योंकि हमारे पास ऐसे मौलिक मानवाधिकार नहीं हैं जो नागरिकता को धार्मिक मतभेदों के आधार पर जोड़ते हैं.  नागरिकता तय करने के लिए वास्तव में यह मायने रखता है कि एक व्यक्ति का जन्म कहां हुआ और एक व्यक्ति कहां रहता है'.

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साथ ही उन्होंने कहा था, "(संशोधित) कानून के बारे में पढ़ने के बाद मेरा यह मानना है कि यह संविधान के प्रावधान का उल्लंघन करता है,". उन्होंने कहा कि धर्म के आधार पर नागरिकता, संविधान सभा में चर्चा का विषय बना हुआ था, जहां यह तय किया गया कि "इस तरह के भेदभाव के उद्देश्य के लिए धर्म का उपयोग करना स्वीकार्य नहीं होगा." हालांकि, अमर्त्य सेन इस बात से सहमत हैं कि भारत के बाहर किसी देश में सताए जाने वाले हिंदू सहानुभूति के हकदार हैं और उनके मामलों को संज्ञान में लिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ''नागरिकता को धर्म से अलग रखना चाहिए लेकिन साथ ही पीड़ित या शोषित लोगों की परेशानियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए''.

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(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)


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