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नेताजी की मृत्यु की तारीख 18 अगस्त का उनके पोते आशीष रे ने किया समर्थन, कहा- मेरी जांच के हिसाब से भी सही

पीआईबी ने 18 अगस्त को सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु के दिन को स्वीकार करते हुए इसे उनकी पुण्यतिथि घोषित किया था

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नेताजी की मृत्यु की तारीख 18 अगस्त का उनके पोते आशीष रे ने किया समर्थन, कहा- मेरी जांच के हिसाब से भी सही

नेताजी के परिवार के एक वर्ग ने तारीख 18 अगस्त का विरोध किया था.

खास बातें

  1. पीआईबी ने ट्वीट कर 18 अगस्त घोषित की थी नेताजी की पुण्यतिथि
  2. पौत्र चंद्र बोस ने जताया था विरोध
  3. पौत्र आशीष रे ने किया समर्थन
नई दिल्ली:

नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Netaji Subhas Chandra Bose) की 18 अगस्त को पुण्य तिथि मनाये जाने संबंधी पत्र सूचना कार्यालय (PIB) के ट्वीट का उनके पोते और लेखक आशीष रे (Ashish Ray) ने स्वागत किया है. रे ने कहा कि 1987 से 1995 के बीच उनके द्वारा की गई जांच में पता चला था कि सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को प्लेन क्रैश में ताइपे में हुई थी. उन्होंने कहा कि केंद्र ने 2017 में एक आरटीआई में जवाब में यही तारीख बताई थी. 

पीआईबी ने 18 अगस्त को सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु के दिन को स्वीकार करते हुए इसे उनकी पुण्यतिथि घोषित किया था.  रे ने बुधवार को टेलीफोन पर लंदन से पीटीआई को बताया, ''मैं इस फैसले का स्वागत करता हूं.'' पीआईबी ने रविवार को ट्वीट किया, "पीआईबी महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस को उनकी पुण्यतिथि पर याद करता है.'' 

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हालांकि नेताजी के परिवार के एक वर्ग ने इसका विरोध किया था, जिसके बाद इसे वापस ले लिया गया था. नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र एवं भाजपा नेता चंद्र कुमार बोस ने कहा था कि नेताजी की गुमशुदगी से जुड़ा रहस्य सुलझाया जाना अभी बाकी है और उनकी मृत्यु के बारे में कोई घोषणा सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की जानी चाहिए.

चंद्र कुमार बोस ने ट्वीट किया, ‘‘राष्ट्र नेताजी से जुड़े रहस्य को समाप्त होते देखना चाहता है, खासतौर पर निहित स्वार्थ वाले लोगों द्वारा फैलाये जा रहे झूठे सिद्धांतों को रोकने के लिए. पीआईबी इंडिया का ट्वीट सही रुख नहीं है. ऐसी घोषणा अवश्य ही आधिकारिक तौर पर माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को ठोस सबूत के आधार पर करनी चाहिए.''

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गौरतलब है कि कई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि नेताजी ताईवान के ताईहोकु हवाई अड्डा से 18 अगस्त 1945 को एक विमान में सवार हुए थे, जिसकी दुर्घटना हो जाने पर उनकी मृत्यु हो गई. हालांकि, इसकी कोई पुष्टि नहीं हुई है क्योंकि विशेषज्ञों ने अलग-अलग सिद्धांत पेश किये हैं. केंद्र सरकार ने भी नेताजी की मृत्यु या गुमशुदगी के लिए जिम्मेदार परिस्थितियों पर प्रकाश डालने के लिए समय-समय पर पैनल गठित किये. इसमें शाह नवाज समिति (1956), खोसला आयोग (1970) और मुखर्जी आयोग (2005), लेकिन वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके.

नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में एक सितंबर 2016 को जापान सरकार की खोजी रिपोर्टें सार्वजनिक की थी, जिनमें यह कहा गया था कि नेताजी की ताईवान में एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई. रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि उनके अवशेष तोक्यो के रेनकोजी मंदिर में रखे हुए हैं. हालांकि, कई का मानना रहा है कि नेताजी विमान दुर्घटना में बच गये थे. वर्ष 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार ने स्वीकार किया था कि रेनकोजी मंदिर में रखे अवशेष नेताजी के हैं. 



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