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अमिताव घोष को मिला ज्ञानपीठ पुरस्कार, यह उपलब्धि हासिल करने वाले अंग्रेजी के पहले लेखक बने

नपीठ पुरस्कार  (Jnanpith award 2018) दूसरी भारतीय भाषाओं के लेखकों को मिलता रहा है मगर अंग्रेज़ी के लेखकों को कभी नहीं मिला.

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अमिताव घोष को मिला ज्ञानपीठ पुरस्कार, यह उपलब्धि हासिल करने वाले अंग्रेजी के पहले लेखक बने

अमिताव घोष को मिला ज्ञानपीठ पुरस्कार

नई दिल्ली:

पहली बार ज्ञानपीठ का पुरस्कार (Jnanpith award 2018) किसी अंग्रेज़ी के लेखक को दिया गया है. ज्ञानपीठ पुरस्कार  (Jnanpith award 2018) दूसरी भारतीय भाषाओं के लेखकों को मिलता रहा है मगर अंग्रेज़ी के लेखकों को कभी नहीं मिला. ऐसा नहीं था कि अंग्रेज़ी के लेखकों की दुनिया में धूम नहीं थी या उनकी रचनाएं श्रेष्ठ नहीं थीं. इस बार का ज्ञानपीठ पुरस्कार (Gyanpeeth Award 2018) अमिताव घोष (Amitav Ghosh) को दिया जा रहा है जो निस्संदेह ऐसे लेखक हैं जो किसी भी बड़े सम्मान के हक़दार हैं. उनके उपन्यास बेमिसाल हैं. इतिहास और कल्पना के घोल से जो रसायन वह तैयार करते हैं, जितनी गहराई से अपने विषय पर शोध करते हैं और उसे जिस बारीक़ी से रचना में बदलते हैं, वह आपको बिल्कुल हैरान छोड़ जाता है. भाषा, पर्यावरण, राजनीति- जैसे जीवन का कोई पहलू उनसे छूटता नहीं. 'सी ऑफ़ पॉपीज़़' में वे इस बात की ओर ध्यान खींचते हैं कि कैसे भारत में अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने यहां की खेती बरबाद की, आम फ़सलों की जगह अफीम उगाने को मजबूर किया और पूरे उत्तर भारत के सामाजिक-आर्थिक तंत्र को झकझोर दिया.

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वैसे आप चाहें तो अमिताव घोष को अंग्रेज़ी में भोजपुरी के उपन्यासकार भी कह सकते हैं. उनकी एक पृष्ठभूमि यह भी है. 'सी ऑफ पॉपीज़' की नायिका दिती भोजपुरी बोलती है, वह एक जहाज़ आता देख कुछ हैरान होती है और अपने पूजाघर में सिंदूर से उसकी भी तस्वीर बना लेती है. उसके पति की अफीम के कारख़ाने में मौत हो जाती है. फिर यह कहानी कलकत्ता पहुंचती है- और वहां से गिरमिटिया मजदूरों के साथ मॉरीशस तक. आप देखिए, एक ही साथ अमिताव कितने सारे मुद्दे उठा लेते हैं. सती प्रथा, अछूत प्रथा, गिरमिटिया मजदूरी, ढहती राजशाहियां. नीलरतन हालदार नाम के राजा का जो हाल होता है, वह डरावना है. एक बात और बता दूं. इस उपन्यास में हिंदी शब्दों का भरपूर इस्तेमाल है. आप अंग्रेजी में पगली लिखा देखेंगे, खजाना की स्पेलिंग देखकर हैरान रह जाएंगे.

देशकाल, इतिहास-भूगोल सब जैसे उनके दायरे में हैं. सर्किल ऑफ़ रीज़न में वे सलाह देते हैं कि कलकत्ता से कंपास रखकर घुमाइए और देखिए कि इसका गोल घेरा किस सांस्कृतिक परिधि को घेरता है. उपन्यास की शुरुआत दिलचस्प है जब एक महान वैज्ञानिक कोलकाता एयरपोर्ट पर आ रहा होता है और सब उसकी राह देख रहे होते हैं. 'शैडो लाइन्स' कोलकाता से लंदन तक आती-जाती एक मीठी सी कहानी है जिस पर अमिताव घोष को साहित्य अकादेमी सम्मान मिल चुका है.

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लेकिन अमिताव घोष की सबसे ख़ास बात- या सबसे ख़ास बातों में एक- पर्यावरण पर उनकी गहरी नज़र है. प्रियदर्शन ने आपके लिए लिखा है कि द हंगरी टाइड में वे गुम होती डॉल्फिन्स की ख़बर लेते हैं- बताते हैं कि कभी वे कलकत्ता तक पहुंच जाती थीं. उपन्यास की एक नायिका डॉल्फ़िन पर रिसर्च करने के लिए सुंदरवन जाना चाहती है. सरकारी अमला उसे लूटने पर लगा है. एक हादसा होता है, वह समंदर में गिर जाती है, उसे एक मछुआरा बचाता है. इसके बाद यह कमाल की कहानी है- सुंदरवन के अलग-अलग द्वीपों की कथा कहती हुई- समंदर पर बहती हुई, आने वाले विराट तूफ़ान से बेख़बर प्रेम में डूबी हुई. बेशक, अपने उपन्यासों के देशकाल को अमिताव कभी नहीं भूलते. इस उपन्यास में भी वे जन प्रतिरोध की कथा पिरो लेते हैं. अमिताव लोगों और सभ्यताओं के ही नहीं, शब्दों के इतिहास में भी जाते हैं.

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इस उपन्यास में वे बताते हैं कि कैसे कोलकाता की मशहूर मिठाई लेडीगेनी दरअसल लेडी कैनिंग के नाम पर रखी गई है. ऐसे उदाहरण और भी हैं.कुछ बरस पहले पर्यावरण पर केंद्रित उनकी किताब 'द ग्रेड डिरेंजमेंट' ख़ूब चर्चा में रही है. पर्यावरण के सवाल को उन्होंने जितने बड़े आयामों के साथ उठाया है, अमूमन उन पर हमारी नज़र नहीं जाती. हम भारत के एक शानदार रचनाकार अमिताव घोष को बधाई देते हैं.
 


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