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अयोध्या केस : राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति ने कहा- बाबर न तो जमीन का मालिक था, न ही उसने मस्जिद बनवाई

वकील पीएन मिश्रा ने कहा- किसी दूसरे के धर्म स्थल को जबरदस्ती गिराकर उस पर मस्जिद नहीं बनाई जा सकती, वह अल्लाह की इबादत के लिए बनाई जाती है

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अयोध्या केस : राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति ने कहा- बाबर न तो जमीन का मालिक था, न ही उसने मस्जिद बनवाई

प्रतीकात्मक फोटो.

खास बातें

  1. इस बाबत सबूत नहीं हैं कि 1528 में मस्जिद का निर्माण किया गया
  2. हाई कोर्ट ने माना था कि मस्जिद का निर्माण मंदिर को नष्ट कर किया गया
  3. अगर कहीं अजान होती है और दो समय की नमाज नहीं होती तो वह मस्जिद नहीं
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद के मामले में 15 वें दिन की सुनवाई हुई. सुप्रीम कोर्ट में राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति की ओर से वकील पीएन मिश्रा ने इस बात पर जिरह की कि बाबरी मस्जिद बाबर ने नहीं औरंगजेब ने बनवाई थी. पीएन मिश्रा ने किताबों को सबूतों के तौर पर स्वीकार करने संबंधी इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला पढ़ा. मिश्रा ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में जस्टिस एसयू खान ने कहा था कि मुझे इस बात का सबूत नहीं मिला कि ढांचे का निर्माण बाबर ने कराया था, जबकि जस्टिस अग्रवाल ने कहा था कि औरंगजेब ने बनवाया था. पीएन मिश्रा ने कहा कि मुस्लिम पक्षकार ये साबित नहीं कर पाए थे कि मस्जिद का निर्माण बाबर ने करवाया था.

पीएन मिश्रा ने कहा कि हाई कोर्ट ने माना था कि मुस्लिम इस बाबत कोई सबूत नहीं दे पाए कि बाबर ने बनाया था. इस बाबत सबूत नहीं हैं कि 1528 में मस्जिद का निर्माण किया गया और न ही इस बात के सबूत हैं कि इसका निर्माण बाबर ने किया था. पीएन मिश्रा ने कहा कि यह तो स्पष्ट है कि मस्जिद को मंदिर के ऊपर बनाया गया था क्योंकि मंदिर के अवशेष उस जगह से मिले हैं. कुछ लोगों का मानना है कि मंदिर को गिराकर मस्जिद बनी जबकि कुछ लोगों का मानना है कि मंदिर को ध्वस्त करके मस्जिद बनाई गई.
 
पीएन मिश्रा ने कहा इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह साबित नहीं हो पाया है कि विवादित जमीन पर मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण बाबर ने कराया था या औरंगजेब ने? मिश्रा ने कहा कि बाबर विवादित जमीन का मालिक नहीं था. ऐसे में मेरा कहना है कि जब कोई सबूत ही नहीं है तो मुस्लिम पक्षकार को विवादित जमीन पर कब्जा या हिस्सेदारी नहीं दी जा सकती. मिश्रा ने कहा कि  बाबर ने मस्जिद का निर्माण नहीं कराया था और न ही वह विवादित जमीन का मालिक था. जब बाबर जमीन का मालिक ही नहीं था तो सुन्नी वक्फ बोर्ड का मामले में दावा ही नहीं बनता.


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जस्टिस बोबडे ने पीएन मिश्रा से तीन बिंदु स्पष्ट करने के लिए कहा कि वहां पर एक ढांचा था इस बारे में कोई विवाद नहीं है, पर क्या वह ढांचा मस्जिद है या नहीं? बहस यह है. वह ढांचा किसको समर्पित था? पीएन मिश्रा ने कहा कि 1648 में शाहजहां का शासन था और औरंगजेब गुजरात का शासक था. इस पर मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने आपत्ति जताई. राजीव धवन ने कहा अब तक 24 बार मिश्रा संदर्भ से बाहर जाकर किस्से कहानियां सुना चुके हैं. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि यह अपने तथ्यों को रख रहे हैं, लेकिन उन्होंने मिश्रा से भी कहा कि सिर्फ संदर्भ बताएं. पीएन मिश्रा ने कहा कि सिर्फ कोर्ट मुझे गाइड कर सकता है, मेरे साथी वकील नहीं. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि आप स्वतंत्र हैं अपने तथ्य रखने को, आप आपका पक्ष रखें.

मिश्रा ने कहा कि इस बात के सबूत नहीं हैं कि मस्जिद का निर्माण बाबर ने कराया था. जस्टिस बोबड़े ने पूछा इसका मतलब है कि बाबर जमीन का मालिक नहीं था? पीएन मिश्रा ने कहा कि हाईकोर्ट ने बहुमत से माना था कि इस बात के सबूत नहीं हैं कि बाबर जमीन का मालिक था. उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट ने माना था कि मस्जिद का निर्माण मंदिर को नष्ट कर किया गया था. हाई कोर्ट ने माना था कि मस्जिद का निर्माण मंदिर को ध्वस्त कर किया गया था. बाबर के कहने पर मीर बाकी ने निर्माण किया था.

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जस्टिस चंद्रचूड़ ने पूछा कि इसका मतलब है कि हाईकोर्ट ने बहुमत से यह माना था कि इस बात के सबूत नहीं कि मस्जिद का निर्माण बाबर ने कराया था? मिश्रा ने कहा कि हां, इस बात के सबूत नहीं हैं कि मस्जिद का निर्माण बाबर ने कराया था.

पीएन मिश्रा ने मस्जिद बनाने के बारे में बहस की कि इस्लाम में मस्जिद बनाने के क्या कानून हैं. एक मस्जिद उसी जगह पर बनाई जा सकती है जब उसका मालिक मस्जिद बनाने की इजाजत दे. वक़्फ़ को दी गई जमीन मालिक की होनी चहिए. मिश्रा ने कहा कि कुरान में यह नहीं बताया गया कि इस तरह की ज़मीन पर मस्जिद बनाई जा सकती है. मिश्रा ने कहा कि इस्लाम के अनुसार दूसरे के पूजा स्थल को गिराकर या ध्वस्त करके उस  स्थान पर मस्जिद नहीं बनाई जा सकती. ऐसी ज़मीन जिस पर दो लोगों का कब्ज़ा हो और एक मस्जिद बनाने का विरोध करे तो उस जमीन पर भी मस्जिद नहीं बनाई जा सकती. उन्होंने कहा कि किसी दूसरे धर्म स्थल को गिराकर उसका सामान इस्तेमाल करके मस्जिद बनाना मकरूह है.उन्होंने कहा कि यह सत्य है कि किसी दूसरे के धर्म स्थल को जबरदस्ती गिराकर उस पर मस्जिद नहीं बनाई जा सकती, मस्जिद अल्लाह की इबादत के लिए बनाई जाती है.

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पीएन मिश्रा ने कहा कि विवादित ढांचे को जुमे की नमाज के लिए 2-3 घंटे के लिए ही खोला जाता था. इस्लामिक कानून के अनुसार अगर कहीं मस्जिद में अजान होती है और दो समय की नमाज नहीं होती है तो वह मस्जिद नहीं रह जाती है.

जस्टिस बोबडे ने पूछा कि क्या कोई राजा राज्य की संपत्ति से वक्फ बना सकता है या उसे पहले संपत्ति खरीदनी होगी? मिश्रा ने तारखी फिरोज शाही का हवाला देते हुए कहा कि विजित संपत्ति से विजेता पारिश्रमिक के रूप में 1/10 का मालिक है. और अपने पारिश्रमिक में से वह एक वक्फ बना सकता है.

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मिश्रा ने कहा कि 1860 तक अयोध्या में विवादित ढांचे में मुसलमानों के नमाज पढ़ने का कोई सबूत नहीं है. जस्टिस चंद्रचूड़ ने पूछा कि क्या कोई राजा किसी की संपत्ति को वक्फ कर सकता है?  मिश्रा ने ऐतिहासिक वाकये का हवाला देते हुए बादशाह और मुफ़्ती के बीच हुई बातचीत का जिक्र किया. इसका सार था कि राजा जजिया वसूल सकता है पर किसी की जमीन छीनकर वक्फ नहीं कर सकता. मिश्रा ने इस्लाम के इतिहास में हजरत मोहम्मद और उनके अनुयायियों के बीच खैबर में खरीदी ज़मीन को लेकर हुई बातचीत का ब्यौरा दिया. यानी ज़मीन खरीदकर ही आप मकबरा, मस्जिद या धार्मिक इमारत बना सकते हैं. जबरन धमकाकर, छीनकर या कब्ज़ा कर नहीं.

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मिश्रा ने कहा कि कोई कितना भी बड़ा राजा या हुक्मरान हो, इस्लाम के नियमों से अलग कुछ स्थापित नहीं कर सकता. कोई राजा कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, यह नहीं कह सकता कि हम चाहते हैं कि अब से हज हमारी सल्तनत में ही हो, ये नहीं हो सकता. मस्जिद में पांचों वक्त के साथ शुक्रवार की सामूहिक नमाज़ और अज़ान हो तभी उसकी मस्जिद के रूप में मान्यता रहती है. दो वक्त की नमाज़ का नागा हो गया तो मस्जिद की मान्यता नहीं होती. जजिया कर के ज़माने में भी तीन-तीन दिन तक जजिया के रूप में मुस्लिम सिपाही या लोग मंदिरों में नमाज़ अदा करते थे लेकिन इससे कभी मंदिर मस्जिद नहीं बना. क्योंकि जजिया के रूप में वह जगह नमाज़ पढ़ने के लिए ली जाती थी. सन 1860 तक जजिया कर लागू रहा. इसके एवज में मुगल और मुस्लिम मंदिरों की इमारत में नमाज़ पढ़ते रहे थे.

कोर्ट ने पूछा कि जब मंदिरों की इमारत में नमाज़ हो सकती थी तो क्या मस्जिद की इमारत में पूजा नहीं हो सकती? मिश्रा ने कहा कि हिन्दू सदियों पहले से ही वहां पूजा करते रहे हैं. मुस्लिम तो बाद में जबरन वहां नमाज़ पढ़ने लगे. मामले की सुनवाई शुक्रवार को भी जारी रहेगी.

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