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अयोध्या विवाद : 1934 से पहले मुसलमान वहां नियमित रूप से नमाज पढ़ते थे, हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था : सुप्रीम कोर्ट

निर्मोही अखाड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को दलील दी कि 1934 से ही किसी मुसलमान को राम जन्मस्थल में प्रवेश की अनुमति नहीं थी और उस पर सिर्फ निर्मोही अखाड़ा का नियंत्रण था.  प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ को निर्मोही अखाड़ा का पक्ष रख रखे वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील जैन ने बताया कि वह क्षेत्र पर नियंत्रण और उसके प्रबंधन का अधिकार चाहते हैं.

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अयोध्या विवाद : 1934 से पहले मुसलमान वहां नियमित रूप से नमाज पढ़ते थे, हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था : सुप्रीम कोर्ट

अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट में रोजाना सुनवाई शुरू हुई

नई दिल्ली:

अयोध्या विवाद  मामले की सुनवाई आज  से नियमित रूप से सुप्रीम कोर्ट में शुरू हो चुकी है. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है कि 1934 से पहले मुसलमान वहां नियमित रूप से नमाज पढ़ते थे, हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था . वहीं निर्मोही अखाड़ा की ओर से कहा गया कि  1934 से 1949 तक मुसलमान विवादित ढांचे में जुमे की नमाज अदा करते थे. निर्मोही अखाड़ा के वकील ने भूमि विवाद मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के निष्कर्षों का हवाला दिया. इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा के वकील से कहा कि वह अपनी दलीलों को दीवानी विवाद मामले तक ही सीमित रखें. वहीं मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश अधिवक्ता राजीव धवन से सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि  अदालत किसी की दलीलों को छोटा नहीं करना चाहते, अदालत की गरिमा बनाए रखें 

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निर्मोही अखाड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को दलील दी कि 1934 से ही किसी मुसलमान को राम जन्मस्थल में प्रवेश की अनुमति नहीं थी और उस पर सिर्फ निर्मोही अखाड़ा का नियंत्रण था.  प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ को निर्मोही अखाड़ा का पक्ष रख रखे वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील जैन ने बताया कि वह क्षेत्र पर नियंत्रण और उसके प्रबंधन का अधिकार चाहते हैं. अखाड़ा के वकील ने शीर्ष अदालत को बताया कि उनका वाद मूलत: वस्तुओं, मालिकाना हक और प्रबंधन अधिकारों के बारे में है. वकील ने कहा, “मैं एक पंजीकृत निकाय हूं.  मेरा वाद मूलत: वस्तुओं, मालिकाना हक और प्रबंधन के अधिकारों के संबंध में हैं.” साथ ही उन्होंने शीर्ष अदालत को बताया कि सैकड़ों साल तक भीतरी परिसर और राम जन्मस्थान पर आखाड़ा का नियंत्रण था. वरिष्ठ अधिवक्ता ने पीठ को बताया, “भीतरी परिसर और राम जन्मस्थान सैकड़ों साल से हमारे अधिकार क्षेत्र में था.  बाहरी परिसर जिसमें सीता रसोई, चबूतरा, भंडार गृह हैं, वे हमारे नियंत्रण में थे और किसी मामले में उनपर कोई विवाद नहीं था.” 

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सुनवाई शुरू करते हुए शीर्ष अदालत ने मामले की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग या सीधे प्रसारण की मांग वाली आरएसएस के पूर्व विचारक के एन गोविंदाचार्य की अर्जी खारिज कर दी थी.  इस पीठ में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर भी शामिल हैं. पीठ ने तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल की रिपोर्ट पर दो अगस्त को संज्ञान लिया था कि करीब चार महीने तक चली मध्यस्थता की कार्यवाही में कोई अंतिम समाधान नहीं निकला. मध्यस्थता पैनल की अध्यक्षता शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश एफ एम आई कलीफुल्ला कर रहे थे. साथ ही इसमें आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक एवं आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता एवं प्रख्यता मध्यस्थ श्रीराम पांचू ने बृहस्पतिवार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि हिंदू और मुस्लिम पक्ष इस पेचीदे विवाद का समाधान ढूंढने में सफल नहीं रहे.     

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(हेडलाइन के अलावा, इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है, यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)


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