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भोपाल गैस त्रासदी : पीढ़ियों को निगल रहा जहर, सरकारें यूनियन कार्बाइड के हितों की रक्षक

महत्वपूर्ण शोध के ऐसे नतीजे को दबा दिया गया जिससे कंपनियों से पीड़ितों को अतिरिक्त मुआवजा देने के लिए दायर सुधार याचिका को बल मिलता

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भोपाल गैस त्रासदी : पीढ़ियों को निगल रहा जहर, सरकारें यूनियन कार्बाइड के हितों की रक्षक

भोपाल में गैस पीड़ितों की समस्याओं को लेकर विरोध प्रदर्शन करते हुए लोग.

खास बातें

  1. सन 1984 में मिथाइल आइसो साइनाइड गैस से 20 हजार से ज़्यादा लोग मरे थे
  2. गैस पीड़ित माताओं के 1,048 बच्चों में से नौ प्रतिशत में जन्मजात विकृतियां
  3. जो माएं गैस पीड़ित नहीं थीं उनके 1,247 बच्चों में से 1.3 फीसदी में विकृति
भोपाल:

सन 1984 में गैस रिसी और एक शहर तबाह हो गया...तीन दशक से ज्यादा वक्त बीत गया.. लेकिन लाखों लोगों के लिए वक्त 84 में ही ठहर गया. हजारों लोगों को मौत के मुंह में धकेलने वाली भोपाल गैस त्रासदी दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटनाओं में से एक है, लेकिन अब इस पर कोई बहस नहीं होती. आरोप लगते रहे हैं कि केन्द्र और राज्य सरकारें आज भी पीड़ितों के बजाए यूनियन कार्बाइड और उसके वर्तमान मालिक डाव केमिकल के हितों की रक्षा कर रही हैं. इन सबके बीच इन पीड़ितों की दमदार आवाज़ अब्दुल जब्बार कुछ दिनों पहले गुजर गए. इस बीच गैस पीड़ितों के लिए काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक और बड़ा आरोप लगाया है कि शोध के ऐसे नतीजे को दबा दिया, जिससे कंपनियों से पीड़ितों को अतिरिक्त मुआवजा देने के लिए दायर सुधार याचिका को मजबूती मिल सकती थी.
        
भोपाल में यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के बाहर सालों से एक मूर्ति आंचल में बच्चे को बचाये, अपने पीछे बच्चे को छिपाये खड़ी है. भोपाल में गैस की बरसी पर रंग टीप देख लेती है, सिसकती है उमेर जैसे बच्चों की कहानी पर. उमेर सात साल के हैं, बचपन में कमजोरी इतनी की बिस्तर पर ही लेटे रहते थे. मां कौसरबी ने उमेर के साथ कदम मिलाना शुरू किया तो वो उठने बैठने लगा,  स्कूल भी आने जाने लगा. अम्मी को लगता है जहरीली गैस ने बेटे को इस हाल में पहुंचाया. वे कहती हैं कि "डॉक्टरों ने बोला बच्चा नॉर्मल नहीं है, पापा, दादू, चाचा सभी गैस पीड़ित हैं. ये खुद को संभाल नहीं पाते थे हाथ में पैरों में जान नहीं थी... बॉटल से दूध पिलाते थे."

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ओमर डेढ़ साल के हैं, पिता भी मानसिक रूप से थोड़े परेशान हैं... दादा भी दिव्यांग हैं. ओमर जब पैदा हुए तो पैर हाथ सब टेढ़े थे... शरीर हमेशा टेढ़ा हो जाता है. मां सायमा ने कहा "डॉक्टरों ने कहा पापा की बीमारी है. दादा की बच्चे में आ सकती है. बहुत परेशानी हुई थी. डॉक्टरों ने कहा नॉर्मल नहीं हैं, बाप-दादा से आती है... पूरे कर्रे हो जाते हैं.

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रानू सिंह का बेटा रचित 6 साल का है. वे कहती हैं जहरीला पानी पीते हैं आज भी मोहल्ले में भी सब दूषित पानी पीने को मजबूर हैं. रानू को भी लगता है गैस रिसाव ने बेटे को इस हाल में पहुंचाया. वे कहती हैं कि "इनके पापा गैस पीड़ित हैं इसलिए बच्चे को भी है. टेढ़े खड़े होते हैं, बैलैंस नहीं बना पाते हैं. पैदा हुए तो रोए नहीं, पैदा होते ही भर्ती हो गए. दादा दादी को लगी, पापा को लगी पानी की वजह से हुई."

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मोहम्मद सुहैल खुद गैस पीड़ित हैं. बेटा सात साल का होने वाला है लेकिन वो न चल पाता है, न बैठ पाता है, न बोल पाता है. सुहैल कहते हैं कि उनकी आवाज़ में दिक्कत है. जिस दिन गैस रिसी, धुंआ उनकी आंखों में था. उसके बाद में ठीक हुआ. बेटे के बारे में बताते हैं कि उनको बिठाने में दिक्कत आती है, न चल पाते हैं न बोल पाते हैं. अपन को है, अपनी परछांई आई है, इसको भी लगी है."

35 साल बाद भी चिंगारी ट्रस्ट में ऐसे हजारों बच्चे आते हैं लेकिन वो 250-300 बच्चों को ही देख पाते हैं.  ट्रस्टी रशीदा बी कहती हैं जब हम मोहल्ले में जाते थे घर-घर में बच्चे पैदा हो रहे थे. उस जमाने से अब तक हजारों बच्चे दुनिया से जा चुके हैं. आज भी हजारों बच्चे विकलांग पैदा हो रहे हैं. चिंगारी ट्रस्ट में ही रजिस्ट्रेशन 1000 से ज्यादा बच्चों का हुआ है, लेकिन 300 को ही बुला पाते हैं. बिठाने की जगह नहीं है. पैंतीस साल हो गए हालात बद से बदतर हो रहे हैं.

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सालों से कई संगठन इन बच्चों के लिए, गैस पीड़ितों के लिए काम कर रहे हैं. कुछ दिनों पहले आरटीआई से इन्हें चौंकाने वाले दस्तावेज मिले, जो कहते हैं कि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर ने एक ऐसे अध्ययन के नतीजों को दबा दिया, जिससे कंपनियों से पीड़ितों को अतिरिक्त मुआवजा देने के लिए दायर सुधार याचिका को मजबूती मिल सकती थी.

दस्तावेज़ के मुताबिक़ इस अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता डॉ रूमा गलगलेकर ने गैस पीड़ित माताओं के 1,048 बच्चों में से नौ प्रतिशत में जन्मजात विकृतियां पाईं, जबकि जो पीड़ित नहीं थे उन माओं के 1,247 बच्चों में 1.3 प्रतिशत बच्चे ही विकृति ग्रस्त पाए गए. 48 लाख की लागत से ये अध्ययन हुआ. इसे दिसंबर 2014 से लेकर जनवरी 2017 तक हुईं तीन साइंटिफिक एडवाइजरी कमेटी की बैठकों में स्वीकृति दी गई थी. लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि एक्सपर्ट ग्रुप के जरिए आंकड़ों की समीक्षा के नाम पर रिपोर्ट को साझा नहीं किया गया ताकि पीड़ितों के हिस्से के अतिरिक्त मुआवजे का केस मजबूत न हो.

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गैस पीड़ितों के संघर्ष से जुड़ीं रचना ढींगरा कहती हैं "तीन साल तक कार्यप्रणाली पर बात होती रही. ये एक और उदाहरण है जो बताता है कि कैसे गैस पीड़ितों के अंदर दूसरी तीसरी पीढ़ी की समस्या को दबाया जा रहा है. आईसीएमआर ने ये काम पहले भी किया है. सन 1985 में यूनियन कार्बाइड की जिम्मेदारी को बचाने के लिए सोडियम थायोसल्फेट के इंजेक्शन बंद करवाए, आज सुप्रीम कोर्ट में जब गैस पीड़ितों के अतिरिक्त मुआवजे की पिटीशन जारी है जहां ये जानकारी जानी चाहिए गैस पीड़ितों के बच्चों में साढ़े सात फीसदी विकृति है, इस बात को छिपाया जा रहा है."

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सरकारी आंकड़े कहते हैं कि भोपाल गैस त्रासदी में 3787 लोगों की मौत हुई, लेकिन गैस पीड़ितों के लिए काम कर रहे संगठनों का दावा है कि 2-3 दिसंबर, 1984 की दरम्यानी रात को यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित कारखाने से रिसी जहरीली गैस से 20,000 से ज़्यादा लोग मारे गए थे और लगभग 5.74 लाख लोग प्रभावित हुए.

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प्रधानमंत्री अपने भाषण में भोपाल गैस त्रासदी का जिक्र करते हैं. उन्हें शायद पता न हो कि राहत और पुनर्वास विभाग द्वारा संचालित छह अस्पतालों में हर रोज 4000 से अधिक मरीज इलाज कराने आते हैं लेकिन इनमें से पांच अस्पतालों में पिछले 19 सालों से एक भी मानसिक रोग चिकित्सक नहीं रहा. भोपाल की सांसद राम मंदिर पर बहुत खुश हुईं लेकिन राम-रहीम के इन बंदों से मिलने की फुर्सत ना तो उन्हें है, ना राज्य सरकार को जिसकी प्राथमिकता भी फिलहाल राम वन पथ गमन और राम लीला के मंच हैं.

VIDEO : गैस पीड़ितों को न्याय, चुनावी मुद्दा नहीं

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