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नागरिकता कानून को लेकर नीतीश कुमार की पार्टी में क्यों मचा है घमासान?

सूचना मंत्री नीरज कुमार ने कहा- नीतीश कुमार का फ़ैसला है तो सवाल उठाने वाले प्रशांत या पवन वर्मा कौन होते हैं?

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नागरिकता कानून को लेकर नीतीश कुमार की पार्टी में क्यों मचा है घमासान?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फाइल फोटो).

खास बातें

  1. ललन सिंह और आरसीपी सिंह ने कहा प्रशांत पदधारक नहीं, उनकी क्या बिसात
  2. नीतीश कुमार पहले इस मुद्दे पर राय पूछे जाने पर विरोध में बोलते थे
  3. नीतीश का अपना आकलन है कि इस मुद्दे पर विरोध से नुकसान हो सकता था
पटना:

देश में नया नागरिकता कानून (Citizenship law) लागू होने के बाद कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं तो बिहार के जनता दल यूनाइटेड (JDU) के नेताओं के बीच इस कानून के समर्थन और विरोध पर घमासान मचा हुआ है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) मौन हैं. विवाद की शुरुआत जेडीयू के लोकसभा में बिल को समर्थन देने से हुई, जब चुनावी रणनीतिकार और पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने ट्वीट कर सवाल उठाया. जब तक यह बिल राज्यसभा में पारित नहीं हो गया तब तक नीतीश कुमार के इशारे पर प्रशांत किशोर पर जवाबी हमला शुरू नहीं हुआ. लेकिन बृहस्पतिवार को नीतीश मंत्रिमंडल के सूचना मंत्री नीरज कुमार ने विधिवत प्रशांत किशोर की आलोचना शुरू की. उनका कहना था कि नीतीश कुमार का फ़ैसला है तो सवाल उठाने वाले प्रशांत या पवन वर्मा कौन होते हैं?

शुक्रवार को इस कड़ी में लोकसभा में नेता ललन सिंह और राज्यसभा में नेता आरसीपी सिंह भी शामिल हो गए. उनका कहना था कि प्रशांत अब पार्टी में पदधारक नहीं हैं इसलिए उनकी क्या बिसात है.आरसीपी सिंह की प्रशांत किशोर से चिढ़ की पुरानी कहानी है और उन्हें लगता है कि इस मुद्दे पर जितना आक्रामक वे मीडिया में दिखेंगे उतनी राजनीतिक पूछ दिल्ली से पटना तक बढ़ेगी.


इस बात में कोई शक नहीं कि प्रशांत या पवन वर्मा की पार्टी में कोई पूछ नहीं है. खासकर दोनों नेताओं को बिहार की राजनीति से नीतीश कुमार ने पिछले एक वर्ष से अलग ही रखा है. लेकिन ये भी सच है कि नागरिकता संशोधन बिल का जब मसला चल रहा था तो पार्टी के एक और वरिष्ठ नेता केसी त्यागी और प्रशांत किशोर को ही उन्होंने अपना दूत बनाकर गुवाहाटी भेजा था. और वह चाहे संवाददाता सम्मेलन हो या पार्टी की बैठक, नीतीश कुमार इस मुद्दे पर राय पूछे जाने पर विरोध में बोलते थे. लेकिन जानकारों के अनुसार नीतीश कुमार का अपना आकलन है कि इस मुद्दे पर विरोध करने से नुकसान ही नुकसान हो सकता था. समर्थन करने के बाद उनके विरोधी भी मानते हैं कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में कम से कम उनकी गद्दी सुरक्षित है. और वह चाहे मुस्लिम समाज हो या धर्मनिरपेक्ष लोग, उनमें नीतीश कुमार के प्रति विश्वसनीयता कम ही नहीं खत्म हुई है. लेकिन नीतीश कुमार फिलहाल उनके समर्थकों के अनुसार अपने सिद्धांतों के लिए सत्ता नहीं गंवाना चाहते हैं. इस आकलन के आधार पर नीतीश ने अपना स्टैंड क्यों बदला, इस पर सार्वजनिक सफाई देना नहीं चाहते.

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लेकिन नीतीश कुमार को भी मालूम है कि जितना इस मुद्दे पर एक-दूसरे के खिलाफ बयानों का दौर जारी रहेगा, देश और राज्य में फ़ज़ीहत उनकी अपनी सरकार ज़्यादा होगी. आने वाले दिनों में पार्टी के मुस्लिम विधायकों के बगावती सुर भी और तेज़ हो सकते हैं.

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