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बीजेपी सांसद सत्यपाल सिंह ने डार्विन को फिर कटघरे में खड़ा किया, कहा- हम बंदरों की नहीं, ऋषियों की संतान

बागपत के बीजेपी सांसद सत्यपाल सिंह ने एक बार फिर महान वैज्ञानिक डार्विन के उत्पत्ति के सिद्धांत पर सवाल खड़े किए

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बीजेपी सांसद सत्यपाल सिंह ने डार्विन को फिर कटघरे में खड़ा किया, कहा- हम बंदरों की नहीं, ऋषियों की संतान

सांसद सत्यपाल सिंह ने एक बार फिर डार्विन के उत्पत्ति के सिद्धांत पर सवाल खड़ा करते हुए मानव का बंदरों की संतान होने से इनकार किया.

खास बातें

  1. कहा- भारतीय परंपरा में मानवाधिकार पर नहीं, संस्कार पर जोर
  2. डार्विन के उत्पत्ति के सिद्धांत पर सवाल खड़ा किया
  3. कहा इंसानों की विकास यात्रा बंदरों से शुरू नहीं हुई
नई दिल्ली:

पूर्व केंद्रीय मंत्री और बागपत से मौजूदा बीजेपी सांसद सत्यपाल सिंह ने एक बार फिर डार्विन के सिद्धांत को नकारा. उन्होंने कहा कि 'इंसानों की विकास यात्रा बंदरों से शुरू नहीं हुई है, हम ऋषियों की संतान हैं. उन्होंने यह भी कहा कि भारत की परंपरा में मानव अधिकार पर जोर नहीं था, संस्कार पर जोर था.'

शुक्रवार को लोकसभा में मानवाधिकार संरक्षण संशोधन बिल पास हो गया. इस संशोधन के बाद राष्ट्रीय और राज्य मानवाधिकार संस्थाओं के चेयरमैन का कार्यकाल पांच साल से घटाकर तीन साल कर दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट के रिटायर चीफ जस्टिस के अलावा चीफ जस्टिस भी आयोग के अध्यक्ष बन सकेंगे. राज्यों में हाईकोर्ट के पूर्व जज को यह मौका मिलेगा. इसी बहस में हिस्सा लेते हुए सत्यपाल सिंह ने कहा, 'हम ऋषियों की संतान हैं. जो लोग कहते हैं कि हम बंदरों की संतान हैं उनकी भावना को ठेस पहुंचाना नहीं चाहता. हम ऋषियों की संतान हैं. मैं केवल कहना चाहता हूं कि हमारी संस्कृति परंपरा में मानव मनुष्य निर्माण पर ज़ोर दिया गया है, मानव अधिकारों पर नहीं. संस्कारों के बल पर एक मनुष्य के निर्माण पर ज़ोर दिया गया है.'

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सत्यपाल सिंह ने कहा कि 'हम सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखें, इसलिए हमारे यहां कभी भी मानव अधिकार की बात नहीं की गई, केवल कर्तव्य की बात की गई है. यह संकल्पना पश्चिमी है. बांटकर खाना सीखें, त्याग करें. हमने सोचा कि मानव ही सृष्टि के अंदर ट्रस्टी है. हजारों-लाखों का कत्ल करने वाले देशों पर कब्जा करने वाले ही मानव अधिकार की बात करने लगे. अमेरिका का इतिहास देखिए, न्यूज़ीलैंड का इतिहास देखिए, धर्म के नाम पर मारा है. वही मानव अधिकार की बात करते हैं. हम अधिकार लेकर क्या करेंगे.'

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सत्यपाल सिंह की बात पर विपक्षी सदस्यों ने विरोध दर्ज कराया. तृणमूल कांग्रेस की सदस्य महुआ मोइत्रा ने कहा , ‘यह उत्पत्ति के सिद्धांत के खिलाफ है.' सिंह के बयान के बाद चर्चा में भाग लेते हुए द्रमुक सांसद कनिमोई ने कहा, ‘दुर्भाग्य से मेरे पूर्वज ऋषी नहीं हैं. मेरे पूर्वज होमो सैपियंस हैं जैसा कि वैज्ञानिक कहते हैं और मेरे माता-पिता शूद्र हैं. वे किसी भगवान से भी नहीं जन्मे थे.'

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विज्ञान में एवोल्यूशन की एक प्रक्रिया बताई गई है. डार्विन ने अपनी संकल्पना 1859 में दी थी. माना जाता है कि 40 लाख साल पहले इंसान का उद्गम ऑस्ट्रेलोपिथेकस से हुआ. उसके बाद अलग-अलग चरणों में इंसान का विकास हुआ. उन सभी चरणों के अलग-अलग नाम हैं. डार्विन ने बेशक इसे विस्तार से बताया था लेकिन इतने भी सरल तरीके से इंसान का उद्भव नहीं हुआ था. बाद के वैज्ञानिक शोध में डार्विन की बात मानी गई लेकिन मानव विकास यात्रा की कई जटिल परतें सामने आईं. डार्विन के समय में भी और अभी कई धर्मों के मठ इन सारी बातों को नहीं मानते हैं. थ्‍योरी ऑफ इवोल्यूशन वैज्ञानिक रूप से एक स्थापित सिद्धांत है.

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जनवरी 2018 में भी सत्यपाल सिंह ने डार्विन के सिद्धांत को चुनौती दी थी. उस समय वे मानव संसाधन राज्यमंत्री थे. उनके इस बयान के बाद तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बयान दिया था कि इस तरह के बयान नहीं देनी चाहिए. लेकिन सत्यपाल सिंह ने सात महीने बाद एक किताब की लॉन्‍चिंग में फिर वही बयान दिया. उन्होंने तब कहा था कि जनवरी का बयान लतीफा नहीं था. 'मैं विज्ञान का छात्र रहा हूं. मैं विज्ञान समझता हूं. डार्विन का सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से गलत है. मैं खुद को बंदर की संतान नहीं मानता हूं. किसी ने बंदर को इंसान बनते नहीं देखा है. एक जीवन में कोई यह कैसे देख सकता है.' सत्‍यपाल सिंह रसायन शास्त्र के छात्र रहे हैं, लेकिन उनकी पीएचडी लोकप्रशासन में है.

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