NDTV Khabar

अलविदा 2016 : मोदी सरकार के 'वर्चस्व' पर भारी पड़े अदालत के कई फैसले

 Share
ईमेल करें
टिप्पणियां
अलविदा 2016 : मोदी सरकार के 'वर्चस्व' पर भारी पड़े अदालत के कई फैसले

पीएम नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

खास बातें

  1. उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाए पर सरकार को मुंह की खानी पड़ी
  2. अरुणाचल प्रदेश में प्रेसीडेंट रुल पर भी सरकार को शर्मिंदगी झेलनी पड़ी
  3. नोटबंदी पर भी सरकार की सांसे अटकी रहीं
नई दिल्ली:

उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर न्यायपालिका और सरकार के बीच बढ़ती खींचतान और कॉलेजियम की कार्यशैली 2016 के दौरान उच्चतम न्यायालय में छायी रही. जहां अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के मामले में मोदी सरकार को जबर्दस्त शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा.

देश में पांच सौ और एक हजार रुपये के नोटों को अमान्य घोषित करने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद यह मुद्दा लगातार शीर्ष अदालत पहुंचता रहा जिसकी वजह से सरकार की सांसे अटकी रहीं. न्यायालय ने इस मामले की लगभग हर सुनवाई पर इस निर्णय से जनता को हो रही परेशानियों के लिए सरकार को आड़े हाथ लिया और उससे कुछ असहज करने वाले सवाल भी पूछे.

न्यायालय ने हालांकि विमुद्रीकरण के फैसले में किसी प्रकार की छेड़छाड़ से इनकार कर दिया लेकिन इसे लेकर दायर कई याचिकाओं को बाद में उसने सारे मामले को सुविचारित निर्णय के लिये संविधान पीठ को सौंप दिया. सरकार को विमुद्रीकरण के मामले में ही न्यायालय की फटकार नहीं सुननी पड़ी बल्कि अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने के मामले में भी शर्मसार होना पड़ा. हालांकि इस दौरान उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर न्यायपालिका और सरकार के बीच वाकयुद्ध चलता रहा और दोनों ही एक दूसरे पर 'लक्ष्मणरेखा' लांघने का आरोप लगाते रहे.


न्यायपालिका और भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार के बीच तलवारें तो पिछले साल ही उस समय खिंच गई थीं जब संविधान पीठ ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून निरस्त कर दिया था. यह खींचतन इस साल उस समय और बढ़ गयी जब शीर्ष अदालत ने न्यायाधीशों की नियुक्ति का मामला न्यायिक पक्ष की ओर से उठाने की धमकी दी परंतु बाद में उसने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायपालिका का काम ठप करने के लिये केंद्र को जिम्मेदार ठहराया.

न्यायाधीशों की नियुक्तियों के मामले में सरकार के रवैये के प्रति अपना आक्रोश जाहिर करते हुये प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर, जो तीन जनवरी को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, के अत्यधिक भावुक होने और इसे लेकर व्यक्त किए गए जज्बात भी पूरे साल छाये रहे. न्यायपालिका में बड़ी संख्या में रिक्तियों के मामले की चर्चा करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में आयोजित एक समारोह में अपनी व्यथा जाहिर की थी. न्यायाधीशों के चयन से संबंधित प्रक्रिया ज्ञापन को कोलीजियम द्वारा अंतिम रूप नहीं दिये जाने की केन्द्र सरकार की निरंतर दी जा रही दलील पर प्रधान न्यायाधीश ने टिप्पणी भी की कि इसे अंतिम रूप नहीं दिया जाना न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं करने का कोई आधार नहीं है.

कॉलेजियम जिस समय अपनी कार्यशैली को लेकर चौतरफा आलोचनाओं का शिकार हो रही था, उसी दौरान इसके सदस्य न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर ने प्रधान न्यायाधीश को एक पत्र लिखकर कॉलेजियम की बैठकों से हटने की जानकारी दी और उन्होंने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये नामों के बारे में चर्चा की लिखित जानकारी चाही.

इस तरह की गतिविधियों के बीच ही न्यायालय के फैसलों पर उसके ही पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने सवाल उठाया और वह अपने ब्लाग के माध्यम से न्यायपालिका के बारे में कथित रूप से असंयमित भाषा और उसे बदनाम करने के आरोप में न्यायालय की अवमानना की नोटिस प्राप्त करने वाले शीर्ष अदालत के पहले न्यायाधीश बन गए. इससे पहले, न्यायमूर्ति काटजू न्यायालय में पेश हुए थे और उनकी न्यायाधीशों के साथ तकरार हुई थी.

टिप्पणियां

यही नहीं, इस साल धनाढ्य बीसीसीआई को पूर्व न्यायाधीश आरएस लोढ़ा की अध्यक्षता वाली समिति की बोर्ड की कार्यशैली में सुधार की सिफारिशों को अपनाने का उल्लंघन करने के कारण शीर्ष अदालत में मुंह की खानी पड़ी.

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)



NDTV.in पर विधानसभा चुनाव 2019 (Assembly Elections 2019) के तहत हरियाणा (Haryana) एवं महाराष्ट्र (Maharashtra) में होने जा रहे चुनाव से जुड़ी ताज़ातरीन ख़बरें (Election News in Hindi), LIVE TV कवरेज, वीडियो, फोटो गैलरी तथा अन्य हिन्दी अपडेट (Hindi News) हासिल करने के लिए हमें फेसबुक पर लाइक और ट्विटर पर फॉलो करें.


Advertisement