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IFS संजीव चतुर्वेदी के केस की सुनवाई से कैट चेयरमैन का इन्कार, केस से हट चुके हैं पहले भी कई जज

हरियाणा से लेकर दिल्ली के एम्स में कई घोटालों का खुलासा कर सियासी और प्रशासनिक गलियारे को हिला देने वाले व्हिसिल ब्लोवर अफसर संजीव चतुर्वेदी के केस की सुनवाई से अब तक कई जज अलग हो चुके हैं.

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IFS संजीव चतुर्वेदी के केस की सुनवाई से कैट चेयरमैन का इन्कार, केस  से हट चुके हैं पहले भी कई जज

आईएफएस अफसर संजीव चतुर्वेदी की फाइल फोटो.

नई दिल्ली:

हरियाणा से लेकर दिल्ली के एम्स में कई घोटालों का खुलासा कर सियासी और प्रशासनिक गलियारे को हिला देने वाले व्हिसिल ब्लोवर अफसर संजीव चतुर्वेदी के केस की सुनवाई से अब तक कई जज अलग हो चुके हैं. ताजा मामला कैट चेयरमैन  जस्टिस एल नरसिम्हन रेड्डी का है. हालांकि जस्टिस रेड्डी ने केस से अलग होने के पीछे के कारणों का खुलासा किया है, अन्य जजों के आदेश में इस बात का स्पष्ट जिक्र नहीं है कि उन्होंने किन कारणों से केस की सुनवाई से खुद को दूर किया. संजीव चतुर्वेदी से जुड़े अलग-अलग मुकदमों में अब तक सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट से लेकर सीजेएम स्तर के जज अपने को अलग कर चुके हैं.  केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण(कैट) के चेयरमैन जस्टिस एल नरसिम्हन रेड्डी ने 29 मार्च को जारी अपने आदेश में कहा है कि वह चतुर्वेदी के लंबित चार प्रकरणों की सुनवाई से खुद को अलग करते हैं.आदेश में उन्होंने कहा है कि यह एक बहुत ही दुर्लभ प्रकरण है, जिसमें बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं घट रहीं थीं. जिसके कारण चेयरमैन के पद की प्रतिष्ठा ही दांव पर लग गई थी. इन हालात के कारण आवश्यक हो गया था कि वादी इस न्यायालय के स्थान पर किसी अन्य न्यायालय में अपने केस की सुनवाई के लिए वाद दायर करे. इसी के साथ जस्टिस रेड्डी ने रजिस्ट्रार के जरिए यह आदेश भी दिया कि वादी को उसकी याचिकाओं से संबंधित फाइल वापस कर दी जाए, ताकि वह कानून के अनुसार किसी अन्य सक्षम न्यायालय में वाद दायर कर सके. कहा जा रहा है कि इस तरह का आदेश शायद पहली बार दिया गया हो, जब जज ने केस की फाइल तक वादी को लौटाने के आदेश जारी कर दिए हैं. 

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बताया जा रहा है कि इस प्रकरण की शुरुआत जुलाई 2018 में दिए गए जस्टिस रेड्डी के उस आदेश से हुई, जिसमें उन्होंने संजीव चतुर्वेदी की एसीआर के मामले में नैनीताल कैट में चल रही सुनवाई को छह सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया था. उस समय चतुर्वेदी को केंद्र सरकार ने प्रशिक्षण के लिए फिनलैंड भेजा गया था. इस आदेश को चतुर्वेदी ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी, जिस पर हाई कोर्ट ने केंद्र व एम्स के रवैये को प्रथम दृष्टया बदला लेने वाला बताते हुए 25 हजार का जुर्माना भी लगाया. हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट आदेश दिया कि संजीव चतुर्वेदी के एसीआर के मामले की सुनवाई नैनीताल कैट में ही होगी. इस निर्णय को एम्स ने चुनौती में चुनौती दी गई, जिसने उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखते हुए 25  हजार का और जुर्माना लगाया. इस बीच जस्टिस रेड्डी ने 29 मार्च को इस मामले से खुद को अलग करने का फैसला कर लिया. सूत्र बताते हैं कि यह पहला मामला नहीं है, जब कांग्रेस और बीजेपी दोनों सरकारों में भ्रष्टाचार के मामलों का खुलासा करने के कारण सरकारों की आंख की किरकिरी बने संजीव चतुर्वेदी के संवेदनशील केस की सुनवाई से किसी जज ने खुद को अलग किया हो.

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इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश रंजन गोगोई(अब सीजेआई) ने सितंबर 2013 में संजीव चतुर्वेदी द्वारा हरियाणा के तत्कालीन सीएम भूपिंदर सिंह हुड्डा और उनकी सरकार के अन्य मंत्रियों व अफसरों के खिलाफ सीबीआई जांच के लिए दायर याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था. इस केस में हरियाणा सरकार की तरफ से वकील के तौर पर रोहिंटन नरीमन उपस्थित थे, जो बाद में वर्ष 2015 में सुप्रीम कोर्ट के जज बने. इसके बाद अगस्त 2016 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश यूयू ललित ने भी इस केस से खुद को अलग कर लिया था. जून 2017 में उत्तराखंड  हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ(अब सुप्रीम कोर्ट में जज) ने भी केस की सुनवाई से इन्कार करते हुए मामले को कैट भेजने के आदेश दिए थे. इसी तरह अप्रैल 2018 में शिमला की निचली अदालत के जज ने संजीव  चतुर्वेदी के खिलाफ हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव विनीत चौधरी द्वारा दायर आपराधिक मानहानि के मामले से व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए हुये खुद को अलग कर लिया गया था. बता दें कि भारतीय वन सेवा के 2002 बैच के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी 2015-16 की एसीआर में एम्स प्रशासन की ओर से की गई प्रतिकूल प्रवृष्टियों व अन्य मामलों को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं. (इनपुट-भाषा से भी)

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