केंद्र ने कॉलेजियम सिस्‍टम की खामियों पर उठाए 'सवाल'

केंद्र ने कॉलेजियम सिस्‍टम की खामियों पर उठाए 'सवाल'

नई दिल्‍ली:

NJAC मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने कॉलेजियम सिस्टम की खामियों पर फिर सवाल उठाए हैं। सरकार ने कहा कि अगर कोर्ट इस आयोग के फैसले को हटाती है तो ये लोकतंत्र के लिए सही नहीं होगा।

बेंच ने कहा, संदेह जताने के बजाए ठोस सबूत दे सरकार
केंद्र ने हाइकोर्ट के कुछ जजों की सूची भी पीठ को सौंपी, जिनमें सरकार के विरोध के बावजूद उन्हें हाइकोर्ट का जज बनाया गया। ये नियुक्तियां वर्ष 2013 और 2014 में की गईं। केद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि ऐसे कई मामले हैं, जिनमें खुफिया विभाग की रिपोर्ट के बावजूद कॉलेजियम ने जजों की नियुक्ति की। हालांकि संविधान पीठ ने सवाल उठाया कि किसी व्यक्ति के बारे में संदेह की रिपोर्ट देने से ही उसकी नियुक्ति कैसे रोकी जा सकती है? ऐसे में सरकार बजाए संदेह जताने के कोई ठोस सबूत क्यों नहीं देती?

हमेशा लेट आने वालीं महिला जज को भी सुप्रीम कोर्ट भेजा
इस दौरान मुकुल रोहतगी ने कोर्ट में कई जजों के उदाहरण भी दिए। उन्होंने कहा कि एक महिला जज अदालत में हमेशा देरी से आती थीं। उनकी वजह से बेंच के दूसरे जज भी परेशान थे। ये पता होने के बावजूद उन्हें सुप्रीम कोर्ट की जज बना दिया गया। इसके अलावा एक जज ऐसे हैं, जिन्‍होंने अपने कार्यकाल में सिर्फ सात फैसले सुनाए जबकि हाईकोर्ट में उन्होंने कोई फैसला नहीं सुनाया था और उन्हें सुप्रीम कोर्ट में लाया गया। यहां तक की सरकार ने एक मामले में रिपोर्ट दी कि एक जज के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला है, उन्‍हें भी नियुक्त किया गया।

मद्रास हाइकोर्ट के मामले में भी उठे सवाले
केंद्र सरकार ने हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और जज के बीच हुए विवाद पर सुप्रीम कोर्ट पर एक्शन न लेने का आरोप लगाया। सरकार ने कहा कि चीफ जस्टिस ने  अदालत की अवमानना के मामले की चेतावनी देने वाले जस्टिस करनन के खिलाफ कारवाई नहीं की। संविधान पीठ के सामने मध्य प्रदेश की ओर से वरिष्ठ वकील के के वेणुगोपाल ने कहा कि जस्टिस करनन के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए थी। इस दौरान अर्टॉनी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि उक्‍त जज ने ही उस वक्त के चीफ जस्टिस से बदतमीजी की थी, लेकिन कॉलेजियम ने डेढ़ साल तक कुछ नहीं किया। चीफ जस्टिस को इस जज को काम से हटा देना चाहिए था। वहीं याचिकाकर्ता के वकील फली नरीमन ने कहा कि इस मामले में संसद भी अपना काम नहीं कर रही है। संसद को इस जज के खिलाफ महाभियोग लाना चाहिए, लेकिन पीठ की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस जे एस खेहर ने कहा कि ये 60 साल में इकलौता उदाहरण है। कोई ये कैसे बता सकता है कि नियुक्ति के बाद कोई जज कैसा बर्ताव करेगा। गौरतलब है कि 5 जजों की संविधान पीठ राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
 

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