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सभापति कार्यालय डाकघर नहीं संवैधानिक पदाधिकारी है : एम वेंकैया नायडू

नायडू ने कहा कि महाभियोग प्रस्ताव को लेकर पिछले कुछ समय से मीडिया में चल रही अटकलों के मद्देनजर वह इस बारे में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया, प्रावधान और परंपराओं का बीते लगभग एक महीने से अध्ययन कर रहे थे.

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सभापति कार्यालय डाकघर नहीं संवैधानिक पदाधिकारी है : एम वेंकैया नायडू

एम वेंकैया नायडू(फाइल फोटो)

नई दिल्ली:

राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू ने भारत के प्रधान न्यायाधीश ( सीजेआई ) दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव के नोटिस को खारिज करने के अपने फैसले की आलोचनाओं का जवाब देते हुए मंगलवार को कहा कि उन्होंने प्रस्ताव के सभी पहलुओं पर पर्याप्त विचार विमर्श के बाद फैसला किया है. नायडू ने विपक्षी दलों द्वारा इसे जल्दबाजी में कानून का पालन किये बिना किया गया फैसला बताने का जवाब देते हुये मंगलवार को कहा कि न्यायाधीश ( जांच ) अधिनियम 1968 में सभापति को महाभियोग प्रस्ताव को गुणदोष के आधार पर स्वीकारने अथवा खारिज करने की प्रथम दृष्टया जिम्मेदारी दी गयी है. इसलिये कानून की स्पष्टता के रहते हुए इसकी यह व्याख्या नहीं की जा सकती है कि ‘सभापति कार्यालय महज डाकघर है. सभापति से संवैधानिक प्राधिकारी की तरह काम करना अपेक्षित है और यह उसकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है.’ नायडू ने उनके सोमवार के फैसले पर वकीलों के एक समूह से मुलाकात के दौरान यह बात कही.

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सभापति कार्यालय के सूत्रों के अनुसार नायडू ने वकीलों के समूह से कहा ‘मैंने वही फैसला किया जो इस तरह के मामले में सभापति से अपेक्षित था कुछ संसद सदस्यों के इस बारे में अपने विचार हो सकते हैं, जिन्हें व्यक्त करने के लिये वे स्वतंत्र हैं, लेकिन मेरी अपनी जिम्मेदारी है जिसे मैंने पूरा किया और मैं इससे संतुष्ट हूं. उल्लेखनीय है कि कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के सदस्यों ने नायडू के फैसले को जल्दबाजी में किया गया फैसला बताते हुये इसमें कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किये जाने का आरोप लगाया. दस वकीलों का समूह महाभियोग प्रस्ताव खारिज करने के फैसले पर नायडू को बधाई देने के लिए आया था.

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नायडू ने कहा कि प्रधान न्यायाधीश देश के सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी हैं और ‘उनसे जुड़ा कोई भी मुद्दा अगर सार्वजनिक तौर पर आता है तो उसे तय प्रक्रियाओं के मुताबिक जल्द से जल्द सुलझाने की जरूरत है ताकि माहौल को ज्यादा खराब होने से रोका जाए.’ नायडू ने सोमवार को कांग्रेस सहित सात विपक्षी पार्टियों की ओर से दिए गए महाभियोग प्रस्ताव के नोटिस को खारिज कर दिया था. कांग्रेस ने उनके फैसले को ‘अवैध ’ और ‘जल्दबाजी ’ में उठाया गया कदम बताया था. नायडू ने कहा कि महाभियोग प्रस्ताव को लेकर पिछले कुछ समय से मीडिया में चल रही अटकलों के मद्देनजर वह इस बारे में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया, प्रावधान और परंपराओं का बीते लगभग एक महीने से अध्ययन कर रहे थे. इसके आधार पर प्रस्ताव के सभी पहलुओं पर गौर करने के बाद उन्होंने यह फैसला किया है.

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)



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