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ज़मीन अधिग्रहण कानून में बदलाव से दिल्ली के किसानों में गुस्सा

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ज़मीन अधिग्रहण कानून में बदलाव से दिल्ली के किसानों में गुस्सा
नई दिल्ली: दिल्ली के कई गांवों में ज़मीन अधिग्रहण कानून पर केंद्र सरकार के नए अध्यादेश से किसानों में नाराज़गी है और एक विवाद खड़ा होने की आशंका हो गई है। छतरपुर के राजपुर खुर्द गांव में कोई 50 किसान एक मीटिंग में अपने गुस्से का इज़हार भी कर रहे हैं और हालात से निबटने के लिए प्लानिंग भी कर रहे हैं। राजपुर खुर्द ऐसा गांव है, जहां 34 साल पहले ज़मीन अधिग्रहण का काम शुरू हुआ था। काग़ज़ों पर ज़मीन ली गई, लेकिन असल में कब्ज़ा मूल मालिकों के पास ही रहा। इनमें से कुछ लोगों ने मुआवज़ा भी लिया, लेकिन चूंकि ज़मीन मूल मालिकों के पास ही रही और सरकार ने उसका कब्ज़ा नहीं लिया, लिहाज़ा लोगों ने कुछ साल बाद उस पर निर्माण करना शुरू कर दिया। आज राजपुर खुर्द एक बेहद घनी बसी हुई कॉलोनी है, लेकिन नए अध्यादेश के बाद यहां सरकार का डंडा चल सकता है।

यूपीए सरकार के वक्त पिछले साल लागू हुए ज़मीन अधिग्रहण कानून के मुताबिक अगर सरकार या कोई कंपनी ज़मीन अधिग्रहीत करती है तो उसे पांच साल के भीतर मुआवज़ा देकर ज़मीन को अपने क़ब्ज़े में लेना होगा और काम शुरू करना होगा। अगर सरकार के पास क़ब्ज़ा नहीं है या प्रभावित ज़मीन मालिक को मुआवज़ा नहीं दिया गया है तो पांच साल बाद ज़मीन वापस करनी होगी, लेकिन राजपुर खुर्द जैसे गांवों के हालात विवाद खड़े करेंगे।

दिल्ली में राजपुर खुर्द जैसे 120 गांव हैं, जहां मामले अदालत में हैं। नया कानून आने के बाद इनमें से 90 फीसदी मामलों में ज़मीन मूल ज़मीन मालिक के पास लौट जाती, लेकिन अब केंद्र सरकार के नए अध्यादेश के सेक्शन 24 (ए) में दिए गए प्रावधानों से मालिकाना हक सरकार के पास होगा। ऐसा लगता है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले ये हालात चुनावी रंग भी ले सकते हैं।

अदालत में कई केस लड़ रहे दिल्ली ग्रामीण समाज के अध्यक्ष कर्नल रायसिंह बलहारा कहते हैं, "ये हमें लूटने जैसा है... इतने साल तक सरकार ने यहां कुछ नहीं किया... बहुत कम लोगों ने मुआवज़ा लिया है... ये मकान 20-20 साल पुराने हैं... अगर सरकार कल क़ब्ज़ा ले लेगी तो इन गांवों के ये लाखों लोग कहां जाएंगे...?"

इन गांवों में लोग सरकार के खिलाफ दिखते हैं। वे तैश में आकर बीजेपी के खिलाफ नारे लगाते हैं। 'किसानों के हत्यारे तीन, मोदी, जेटली और नितिन...' लेकिन क्या इसका असर चुनावों में दिखेगा या यह सिर्फ भावनात्मक उबाल है।

दिल्ली ग्रामीण समाज के सचिव अनिल ज्ञानचंदानी कहते हैं, 'हम लोग मीटिंग कर रहे हैं... देखते हैं, कौन-सी पार्टी हमारा साथ देगी... किसानों के दबदबे वाली दिल्ली की 20 में 16 देहात की सीटें बीजेपी ने जीतीं, लेकिन वह आज हमारे खिलाफ है... हम आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों से बात करेंगे... अगर ज़रूरत पड़ी तो हम कोई नया मंच भी बना सकते हैं...'


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