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देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत नहीं, पर्सनल लॉ में सुधार की जरूरत : विधि आयोग

परामर्श पत्र में कहा गया, ‘‘समान नागरिक संहिता का मुद्दा व्यापक है और उसके संभावित नतीजे अभी भारत में परखे नहीं गए हैं.

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देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत नहीं, पर्सनल लॉ में सुधार की जरूरत : विधि आयोग

खास बातें

  1. विधि आयोग ने दिया परामर्श पत्र
  2. ट्रिपल तलाक को बताया अवैध
  3. विवाह अधिनियम 1954 में भी हो बदलाव
नई दिल्ली: विधि आयोग ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिन आज पर्सनल लॉ पर एक परामर्श पत्र जारी किया जो ‘बिना गलती’ के तलाक, भरण-पोषण और गुजारा भत्ता तथा विवाह के लिये सहमति की उम्र में अनिश्चितता और असमानता के नए आधारों पर चर्चा करता है. समान नागरिक संहिता पर पूर्ण रिपोर्ट देने की बजाए विधि आयोग ने परामर्श पत्र को तरजीह दी क्योंकि समग्र रिपोर्ट पेश करने के लिहाज से उसके पास समय का अभाव था. आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बी एस चौहान ने पूर्व में कहा था कि समान संहिता की अनुशंसा करने के बजाए, आयोग पर्सनल लॉ में ‘चरणबद्ध’ तरीके से बदलाव की अनुशंसा कर सकता है. अब यह 22वें विधि आयोग पर निर्भर करेगा कि वह इस विवादित मुद्दे पर अंतिम रिपोर्ट लेकर आए. हाल में समान नागरिक संहिता के मुद्दे को लेकर काफी बहस हुई हैं. विधि मंत्रालय ने 17 जून 2016 को आयोग से कहा था कि वह ‘‘समान नागरिक संहिता के मामले को देखे.’’    परामर्श पत्र में कहा गया, ‘‘समान नागरिक संहिता का मुद्दा व्यापक है और उसके संभावित नतीजे अभी भारत में परखे नहीं गए हैं. इसलिये दो वर्षों के दौरान किए गए विस्तृत शोध और तमाम परिचर्चाओं के बाद आयोग ने भारत में पारिवारिक कानून में सुधार को लेकर यह परामर्श पत्र प्रस्तुत किया है

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क्या हैं परामर्श पत्र की मुख्य बातें


समान नागरिक संहिता : देश में समान नागरिक संहिता न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय है.  वर्तमान पर्सनल लॉ में सुधार की जरूरत है, धार्मिक रीति-रिवाजों और मौलिक अधिकारों के बीच सद्भाव बनाए रखने की आवश्यकता है. 
 

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ट्रिपल तलाक : ट्रिपल तलाक सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवैध बताया गया है. इसका विवाह पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. एकतरफा तलाक को घरेलू हिंसा अधिनियम, महिलाओं पर क्रूरता, और आईपीसी की धारा 4 98 के तहत दंडित किया जाना चाहिए. रिपोर्ट ट्रिपल तलाक से निपटने के लिए किसी भी विशेष कानून की बात नहीं करती है.  हालांकि रिपोर्ट तीन तलाक की तुलना सती प्रथा, दासता, देवदासी और दहेज प्रथा के साथ करती है. ये न तो धार्मिक शिक्षा के साथ और न ही मौलिक अधिकारों के साथ समन्वयित है.

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मुस्लिम विवाह और निकाहनामा : मुसलमानों के बीच प्रचलित संविदात्मक विवाह महिलाओं के लिए फायदेमंद है यदि अनुबंध वास्तव में बातचीत और पक्षों द्वारा सहमत है. रिपोर्ट अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मॉडल निकहनामा और जीनतशौकत अली द्वारा लिखित भारत में विवाह और  तलाक पुस्तक में दिखाए जाने पर विचार करने की बात है.
 
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बहुविवाह : मुस्लिमों में यह दुर्लभ है. यह अन्य धर्म के लोगों के बीच अधिक प्रचलित है जो इस्लाम में बहुविवाह करने के लिए परिवर्तित हो जाते हैं. कई मुस्लिम देशों में बड़े पैमाने पर सख्त कानून है. पाकिस्तान में एक प्रावधान है जिसमें पहली पत्नी की सहमति से ही दोबारा शादी करना अनिवार्य है. पहली पत्नी की सहमति के बिना, दूसरी शादी एक अपराध है. इसलिए यह सुझाव दिया जाता है कि निकाहनामे में यह उल्लेख करना चाहिए कि बहुविवाह एक अपराध है. हालांकि, आयोग इसकी सिफारिश नहीं कर रहा है क्योंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

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बच्चों के लिये धर्म निरपेक्ष : कानून आयोग सभी धर्मों के अवैध बच्चों के लिए विशेष धर्मनिरपेक्ष कानून बनाने के लिए संसद की सिफारिश करता है. इन बच्चों को माता-पिता की अधिग्रहित संपत्ति में विरासत के समान अधिकार प्राप्त करना चाहिए.

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विवाह अधिनियम 19 54 :  विधि आयोग विशेष विवाह अधिनियम 19 54 में परिवर्तन चाहता है. विवाह वैध होने से पहले विवाह करने वाले जोड़े के माता-पिता को 30 दिन के अनिवार्य नोटिस अवधि दी गई है. आयोग ने सिफारिश की है कि इस 30 दिन के खंड को हटा दिया जाना चाहिए या जोड़े को सुरक्षा दी जानी चाहिए. माता-पिता द्वारा 30 दिनों की अवधि का दुरुपयोग किया जाता है जो अंतर-धार्मिक या अंतर-समुदाय विवाह का विरोध कर रहे हैं. यह धर्म परिवर्तन को भी बढ़ावा देता है जहां लोग सिर्फ शादी करने के लिए परिवर्तित होते हैं.

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इनपुट : भाषा से भी


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