यह ख़बर 05 फ़रवरी, 2014 को प्रकाशित हुई थी

द्विवेदी के आरक्षण संबंधी बयान से उठे विवाद में सोनिया को देना पड़ा दखल

द्विवेदी के आरक्षण संबंधी बयान से उठे विवाद में सोनिया को देना पड़ा दखल

फाइल फोटो

नई दिल्ली:

जाति के आधार पर कोटा की व्यवस्था को समाप्त करने के कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी के बयान से उपजे विवाद को शांत करने का प्रयास करते हुए पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बुधवार को कहा कि अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था को जारी रखने पर कांग्रेस के रुख को लेकर कोई शक या असमंजस नहीं नहीं होना चाहिए।

संप्रग सरकार को बाहर से समर्थन दे रहीं सपा और बसपा को द्विवेदी का बयान कतई रास नहीं आया और उन्होंने इसे सामाजिक न्याय विरोधी बताकर खारिज कर दिया, जबकि भाजपा और शिरोमणि अकाली दल ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले इस तरह के बयान के समय पर सवाल उठाया।

इस संबंध में सोनिया गांधी ने दो पेज के अपने बयान में कहा, 'अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी का सशक्तिकरण कांग्रेस के लिए आस्था की बात है।' उन्होंने कहा, 'अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था पर कांग्रेस के रुख को लेकर कोई शक या असमंजस नहीं होना चाहिए। ये कांग्रेस द्वारा लागू की गई हैं। इन्हें कांग्रेस ने मजबूती प्रदान की है और कांग्रेस इनकी हिमायत करना जारी रखेगी।'

सोनिया गांधी के इस बयान का उद्देश्य द्विवेदी की टिप्पणी को लेकर उठे राजनीतिक विवाद के मद्देनजर किसी प्रकार के नुकसान को रोकना माना जा रहा है।

लोकसभा चुनावों से कुछ ही महीने पहले आए द्विवेदी के इस बयान से पल्ला झाड़ने में पार्टी और सरकार ने यह कहते हुए देर नहीं लगाई कि यह उनकी निजी राय है। सोनिया गांधी ने अपने बयान में कहा कि, 'सदियों से उन पर थोपे गये भेदभाव और ज्यादतियों से निपटने के लिए यह आवश्यक है।'

इस मुद्दे को लेकर राज्यसभा में हंगामे के बीच संसदीय कार्य राज्य मंत्री राजीव शुक्ला ने कहा कि सरकार आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के किसी तरह के प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है। आरक्षण की आज जो व्यवस्था है, संविधान के प्रावधानों के मुताबिक वह जारी रहेगी।

एक इंटरव्यू में द्विवेदी ने जाति के आधार पर आरक्षण को समाप्त करने की वकालत करते हुए राहुल गांधी से आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लिए कोटा व्यवस्था लागू कर सभी तबकों को उसके दायरे में लाने की मांग की थी।

सपा के नेता राम गोपाल यादव और बसपा प्रमुख मायावती ने इस बयान की आलोचना की। यादव ने कहा कि कांग्रेस देश में सामाजिक न्याय प्रणाली को समाप्त करने की कोशिश कर रही है जबकि बसपा प्रमुख मायावती ने मांग की कि कांग्रेस इस मामले पर अपना रुख स्पष्ट करे।

द्विवेदी के बयान से राज्यसभा में बवाल मच गया और बसपा सदस्यों ने सदन के बीचोंबीच आकर 'गरीब विरोधी सरकार, इस्तीफा दो' के नारे लगाए। सपा के सदस्यों ने भी उनके सुर में सुर मिलाए, जबकि जद यू ने कहा कि कांग्रेस आरक्षण प्रणाली से हट रही है और इस संबंध में 'साजिश' का रोना रोया।

लोकसभा में बसपा के सदस्य भी सदन के बीचोंबीच चले आए।

अकाली दल की सांसद हरसिमरत कौर बादल ने हालांकि सुझाव का समर्थन किया, लेकिन इस कदम के समय पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा, 'इस मौके पर यह बात क्यों? हालांकि यह बहुत अच्छा विचार है, लेकिन मेरे विचार में इस समय और पिछले छह महीने में कांग्रेस ने जो भी कदम उठाया है उसका एजेंडा वोटबैंक की राजनीति के लिए एक खास समूह को रिझाना रहा है। उनके पास 10 साल थे, वह बहुत कुछ कर सकते थे, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया।'

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भाजपा ने भी इस कदम के समय पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह 'क्रांतिकारी विचार' काफी पहले आना चाहिए था। भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा, 'हम समाज के प्रत्येक वर्ग की प्रगति चाहते हैं। लेकिन कांग्रेस नेता के दिमाग में ऐसे वक्त पर यह विचार क्यों आया, जब चुनाव सन्निकट हैं? इससे पहले उनके पास बहुत समय था और इसपर राष्ट्रीय मंच पर बहस की जा सकती थी।'

विचार को खारिज किए बिना उन्होंने कहा, 'हम हमेशा इस बात के हामी रहे हैं कि प्रगति का अवसर उन लोगों को मिले जो आर्थिक अथवा सामाजिक रूप से पिछड़े हैं।' द्विवेदी को बहुत अनुभवी और मंजा हुआ राजनेता बताते हुए कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, 'जातिगत आरक्षण के मामले पर उनका बयान उनकी निजी राय है।'