भोपाल के गैस पीड़ितों के लिए जानलेवा साबित हो रहा कोरोना, यूनियन कार्बाइड से अतिरिक्‍त मुआवजे की मांग

गैस प्रभावितों के लिये संघर्षरत संगठनों का दावा है कि कोरोना की वजह से 56% मौतें गैस पीड़ित आबादी में हुईं. यह भोपाल जिले की आबादी में संक्रमितों का 17% है.

भोपाल के गैस पीड़ितों के लिए जानलेवा साबित हो रहा कोरोना, यूनियन कार्बाइड से अतिरिक्‍त मुआवजे की मांग

भोपाल गैस त्रासदी के प्रभावित अभी भी कई स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं का सामना कर रहे हैं (प्रतीकात्‍मक फोटो)

खास बातें

  • गैस पीडि़तों के लिए संघर्षरत संगठनों ने की यह मांग
  • दावा किया, कोरोना से ज्‍यादा प्रभावित हो रहे गैस पीडि़त
  • गैस प्रभावितों के फेफड़े पहले से ही हैं कमजोर
भोपाल :

Corona Pandemic: भोपाल गैस पीड़ितों (Bhopal Gas Victims)के लिए संघर्षरत संगठनों ने कोरोना महामारी के दौर में यूनियन कार्बाइड और डाउ केमिकल से अतिरिक्त मुआवजे की मांग की है. इन संगठनों का दावा है कि आम लोगों के मुकाबले 6.5% गुना ज्यादा गैस पीड़ित लोगों को कोरोना (Corona Infection) हुआ.भोपाल शहर में गैस पीड़ितों की तादाद लाखों में है, सबकी अपनी-अपनी स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी समस्‍याएं हैं. कोरोना के वक्त एक बड़ी दिक्कत ये है कि गैस पीड़ितों के फेफड़े पहले से कमज़ोर हैं. गैस पीड़ितों के लिये संघर्षरत संगठन ने गैस राहत अस्पतालों के रिकॉर्ड सर्वोच्च न्यायालय में लंबित सुधार याचिका में पेश करने की मांग की है. उन्होंने 90% गैस पीड़ितों को अस्थाई रूप से क्षतिग्रस्त मानते हुए 25 हजार के मुआवजे की मांग रखी है .

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गैस प्रभावितों के लिये संघर्षरत संगठनों का दावा है कि कोरोना की वजह से 56% मौतें गैस पीड़ित आबादी में हुईं. यह भोपाल जिले की आबादी में संक्रमितों का 17% है. वर्ष 2020 में भोपाल में गैस पीड़ितों की संख्या 4,63,050 है.कोरोना से यहां 450 लोगों की मौत हुई, इनमें से 254 गैस पीड़ित हैं गैस पीड़ित आबादी में कोरोना की वजह से हुई मृत्यु दर आम आबादी से 6.5 फीसदी ज्यादा है.भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन की रचना ढींगरा कहती हैँ, 'इन आंकड़ों से स्पष्ट हो गया है कि केन्द्र एवं राज्य सरकार ये झूठ बोलती आई है कि गैस पीड़ितों को अस्थाई क्षति पहुंची है. इन मौतों की भरपाई डाऊ केमिकल से करवाई जाई, सुधार याचिका पेंडिंग है. जिनकी मौत हो गई, उनकी तकलीफ पीछे छूट गई, वहींजो जिंदा रह गए उनकी अपनी तकलीफ है.लगभग 80 साल की शकीला बी और केसरबाई की गैस के असर के कारण सांस फूलती है. मुन्नी, सावित्री भी उन हजारों महिलाओं में से हैं, जिनके पास नेता राखी बंधवाते हैं, फोटों खिंचवाते है फिर भूल जाते हैं

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गैस प्रभावित शकीला बी बताती हैं, 'एक साल से पेंशन बंद है. जबसे लॉकडाउन लगा, तबसे बंद कर दी. आर्थिक रूप से कमर टूट रही है.काम-धंधा क्या करें. मुख्यमंत्री इस बारे में कुछ नहीं कर रहे हैं. गैस पीड़ितों को देखें तो 1000 रुपये मिलता था, वह भी बंद है. गल्ला कितना मिलता है, 5 किलो, एक किलो चावल और 5 किलो गेहूं. इसमें भी खूब कचरा निकलता है. चुनाव का समय आता है तो सब हाथ जोड़ने आ जाएंगे.' एक अन्‍य गैस प्रभावित केसरबाई ने बताया कि एक साल हो गई पेंशन नहीं मिली. उन्‍होंने कहा, 'मेरी भी तबीयत ठीक नहीं रहती कौन किसको खाने दे रहा है, आंखों से दिखता नहीं.' मुन्नी बाई ने बताया कि 'सरकार' ने आकर राखी बंधवा ली. हमें कहा गया था कि कहीं कोई परेशानी नहीं होगी लेकिन कोई मदद नहीं मिली. कहा था कि पेंशन कभी बंद नहीं होगी बंद और कर दी पेंशन. एक अन्‍य प्रभावित सावित्री बाई ने बताया कि लहसुन छीलते हैं तब 25 रु मिलते हैं.बिजली वाले परेशान करते हैं, नगर निगम वाले परेशान करते हैं, मजदूरी कुछ है नहीं, न मुआवज़ा है.