वित्त वर्ष 2020-21 में शून्य रह सकती है भारत की GDP वृद्धि दर, क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस का दावा

एजेंसी ने इस दौरान देश में व्यापक राजकोषीय घाटा, ऊंचे सरकारी ऋण, कमजोर सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढांचे और नाजुक वित्तीय क्षेत्र की आशंका व्यक्त की है.

वित्त वर्ष 2020-21 में शून्य रह सकती है भारत की GDP वृद्धि दर, क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस का दावा

मूडीज ने भारत के GDP वृद्धि दर को लेकर जताया अनुमान

मुंबई:

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने शुक्रवार को कहा कि वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की आर्थिक वृद्धि शून्य रह सकती है. एजेंसी ने इस दौरान देश में व्यापक राजकोषीय घाटा, ऊंचे सरकारी ऋण, कमजोर सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढांचे और नाजुक वित्तीय क्षेत्र की आशंका व्यक्त की है.मूडीज ने कहा कि हाल के वर्षों में भारत की आर्थिक वृद्धि की गुणवत्ता में गिरावट आयी है. इसका पता ग्रामीण परिवारों में खराब वित्तीय स्थिति, अपेक्षाकृत कम उत्पादकता और कमजोर रोजगार सृजन से चलता है.

एजेंसी ने अपने नये पूर्वानुमान में कहा कि वित्त वर्ष 2020-21 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि शून्य रह सकती है. इसका अर्थ है कि देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की स्थिति इस वित्त वर्ष में सपाट रहेगी. एजेंसी ने हालांकि, वित्त वर्ष 2021-22 में वृद्धि दर के 6.6 प्रतिशत पर पहुंच जाने का अनुमान व्यक्त किया है.मूडीज ने चेतावनी दी कि कोरोना वायरस महामारी से लगा झटका आर्थिक वृद्धि में पहले से ही कायम नरमी को और बढ़ा देगा. इसने राजकोषीय घाटे को कम करने की संभावनाओं को पहले ही कमजोर कर दिया है.


विश्लेषक इस बात को लेकर सुनिश्चित हैं कि इस महामारी का देश की आर्थिक स्थिति पर बड़ा प्रभाव पड़ना तय है. मूडीज की स्थानीय इकाई इक्रा ने इस महामारी के कारण वृद्धि दर में दो प्रतिशत की गिरावट की आशंका व्यक्त की है.
इस महामारी के कारण पूरा देश करीब दो महीने से लॉकडाउन की स्थिति में है.मूडीज ने इससे पहले पिछले महीने के अंत में कैलेंडर वर्ष 2020 में जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 0.2 प्रतिशत कर दिया था.

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सरकार ने मार्च में 1.7 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की थी. अनुमान लगाया जा रहा है कि सरकार एक और राहत पैकेज की घोषणा कर सकती है.एजेंसी ने इस बारे में कहा कि इन उपायों से भारत की आर्थिक नरमी के असर और अवधि को कम करने में मदद मिल सकती है. हालांकि, ग्रामीण परिवारों में लंबे समय तक वित्तीय बदहाली, रोजगार सृजन में नरमी तथा वित्तीय संस्थानों व गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों (एनबीएफसी) के समक्ष ऋण संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. एजेंसी ने कहा कि सुधार की संभावनाएं कम हुई हैं.