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कच्चे तेल की कीमतें 'पाताल' में, लेकिन क्या आम आदमी को मिला उसका फायदा...?

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कच्चे तेल की कीमतें 'पाताल' में, लेकिन क्या आम आदमी को मिला उसका फायदा...?
नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें तेज़ी से गिरती जा रही हैं, और बुधवार को वे घटकर 46.97 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, जो पिछले साढ़े पांच साल में सबसे निचला स्तर है। तेल की कीमतों में यह गिरावट कितनी तेज़ है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि 27 नवंबर से 12 दिसंबर, 2014 के बीच कच्चे तेल की औसत कीमत 67.24 डॉलर प्रति बैरल थी, जो 12 दिसंबर से 29 दिसंबर, 2014 के बीच घटकर 58.12 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई। अब पेट्रोलियम मंत्रालय की तरफ से जारी ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक 7 जनवरी को यह और घटकर 46.97 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई, यानि डेढ़ महीने में करीब 30 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।

यह ज़रूर है कि इस दौरान अमेरिकी डॉलर भारतीय रुपये के मुकाबले मज़बूत हुआ है, और 11 दिसंबर, 2014 को अमेरिकी डॉलर की कीमत 62.21 रुपये थी, जो 7 जनवरी को मज़बूती के साथ 63.45 रुपये हो गई। भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 70 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है, लेकिन डॉलर की कीमत बढ़ने की वजह से खर्च कुछ बढ़ा ज़रूर, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट इतनी ज़्यादा रही कि उसका कुछ फायदा तेल कंपनियों को भी मिला।

लेकिन इन कीमतों में इस गिरावट से एक और सवाल पैदा होता है कि क्या जनता की चहुंओर भलाई के वादों के साथ सत्ता में आई नरेंद्र मोदी सरकार ने सचमुच यह फायदा इसी अनुपात में आम आदमी तक पहुंचाया या नहीं। मोदी सरकार ने पिछले साल 26 मई को शपथ ग्रहण की थी, और उस दिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत 108.05 डॉलर प्रति बैरल थी, जो 7 जनवरी, 2015 को 46.97 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई, यानि इन कीमतों में पिछले साढ़े सात महीने में 60 डॉलर से भी ज्यादा (यानि लगभग 57 फीसदी) की गिरावट आई। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इस दौरान डॉलर के मुकाबले रुपया कमज़ोर हुआ है। 26 मई, 2014 को डॉलर की कीमत 58.48 रुपये थी, जो 7 जनवरी, 2015 को 63.45 हो गई, लेकिन फिर भी याद रखने वाली बात यह है कि इसके बावजूद कच्चे तेल पर आयात के खर्च का बोझ काफी कम हुआ है।

अब सवाल यह है कि क्या इस तेज़ गिरावट का फायदा आम लोगों तक भी पहुंचा...?

जिस दिन मोदी सरकार सत्ता में आई थी, दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 71.56 रुपये प्रति लिटर थी, जो कई बार घटने के बाद 7 जनवरी, 2015 को 61.33 रुपये प्रति लिटर हो गई, यानि इस कीमत में सिर्फ लगभग 15 फीसदी की कमी आई, जबकि कच्चे तेल की कीमतें इस दौरान 57 फीसदी नीचे उतरीं। यानि, आम आदमी तक फायदा उसी अनुपात में नहीं पहुंचा, जिस अनुपात में पहुंचाया जा सकता था।

दरअसल, इस दौरान सरकार ने पेट्रोल और डीज़ल पर उत्पाद शुल्क में तीन बार बढ़ोतरी की है। आंकड़ों के हिसाब से देखें तो सरकार ने तीन बार में कुल मिलाकर पेट्रोल पर 5.75 रुपये प्रति लिटर तथा डीज़ल पर 4.50 रुपये प्रति लिटर उत्पाद शुल्क बढ़ाया, जिससे सरकारी खज़ाने को हज़ारों करोड़ रुपये की आय हुई। इस फैसले के पीछे अर्थशास्त्र से जुड़े चाहे जो भी तर्क हों, लेकिन इतना ज़रूर है कि आम आदमी उस 'ज़्यादा फायदे' से वंचित रह गया, जो शायद उसे दिया जा सकता था, क्योंकि आम आदमी आज भी यही सोचता है कि पिछले कई सालों से जब भी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं, तेल कंपनियों ने फौरन दाम बढ़ाने की तरफ कदम बढ़ा दिए, लेकिन अब जब कीमतें आधी से भी कम रह गई हैं, तब उसका फायदा कुल 15 फीसदी तक ही सीमित क्यों है...


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