Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com

इस शख्‍स ने भजिया बेचकर शुरू किया सफर, बाद में हमेशा के लिए बदली कॉरपोरेट इंडिया की तस्‍वीर

इस शख्‍स ने भजिया बेचकर शुरू किया सफर, बाद में हमेशा के लिए बदली कॉरपोरेट इंडिया की तस्‍वीर

धीरूभाई अंबानी ने रिलायंस को देश की पहली प्राइवेट सेक्‍टर कंपनी बनाया

'बड़ा सोचो, जल्‍दी सोचो और दूसरों से आगे की सोचो. विचारों पर किसी का एकाधिकार नहीं है'. यह फिलॉसफी अपने जीवन काल में लीजेंड बनने वाले रिलायंस समूह के संस्‍थापक धीरूभाई अंबानी की है. धीरूभाई की कहानी फर्श से अर्श तक पहुंचने वाले उस शख्‍स की है जो मजबूत इरादों, दमदार शख्सियत और विजनरी दृष्टि के चलते बिजनेस जगत के शिखर पर पहुंचे. रिलायंस साम्राज्‍य खड़ा करने वाले धीरूभाई अंबानी का आज जन्‍मदिन है.

28 दिसंबर 1932 को मुफलिसी में जन्‍मे धीरूभाई आर्थिक को आर्थिक तंगी की वजह से पढ़ाई छोड़नी पड़ी लेकिन अपने व्‍यवहारिक और व्‍यापारिक कौशल के दम पर उन्‍होंने भारत के बिजनेस जगत की कहानी को पूरी तरह से हमेशा के लिए बदल दी और जब 2002 में उनका निधन हुआ तो वह भारत के सबसे रईस शख्सियतों में शुमार थे एवं उनकी कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में शुमार हो चुकी थी. उन्‍होंने एक बार कहा भी था, 'यदि आप गरीबी में पैदा होते हैं तो इसमें आपका कोई दोष नहीं है लेकिन यदि आप गरीबी में ही मरते हैं तो इसके लिए सिर्फ आप ही जिम्‍मेदार हैं.' आज धीरूभाई के जन्‍मदिन के मौके पर आइए डालते हैं उनके कुछ अनछुए पहलुओं पर एक नजर :

जब बेचा भजिया
बिजनेस टायकून धीरूभाई का पूरा नाम धीरजलाल हीरांचद अंबानी था. उन्‍होंने महज 50 हजार रुपये और दो सहायकों की मदद से रिलायंस की शुरुआत की. उसके बाद कभी पीछे मुड़के नहीं देखा और महज तीन दशक के भीतर ही उनके परिवार की संपत्ति 60 अरब डॉलर हो गई. हालांकि बिजनेस की दुनिया में उन्‍होंने बहुत छोटी शुरुआत की थी. महज 16 साल की उम्र में उनको आर्थिक तंगी के चलते गिरनार पहाड़ी पर धार्मिक स्‍थल पर भजिया बेचना शुरू किया. उसके बाद दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद यमन चले गए.

300 रुपये की पहली पगार
यमन के अदन शहर में उन्‍होंने 300 रुपये महीने पर A.Besse and Co. में गैस स्‍टेशन अटेंडेंट का काम करना शुरू किया. आठ साल वहां गुजारने के बाद 1958 में यमन से 500 रुपये की पूंजी के साथ लौटे और कजिन चंपकलाल दमानी के साथ एक टेक्‍सटाइल ट्रेडिंग कंपनी माजिन की शुरुआत की. उसके बाद 1960 में रिलायंस कमर्शियल कारपोरेशन की स्‍थापना की.

पहला ऑफिस
मुंबई के मस्जिद बंडर इलाके के नरसिनाथन स्‍ट्रीट में उन्‍होंने पहला ऑफिस खरीदा. उसका कवर एरिया केवल 350 स्‍क्‍वायर फीट था. उस ऑफिस में दो टेबल, तीन कुर्सियां और एक टेलीफोन था.

ब्रांड का जमा सिक्‍का
उनकी शुरुआती बड़ी सफलताओं में विमल साड़ी ब्रांड की कामयाबी रही. विमल पहला ऐसा टेक्‍सटाइल ब्रांड है जिसने बड़े पैमाने पर उपभोक्‍ताओं को आकर्षित किया. यह पहली ऐसी रिटेल चेन भी है जिसे पूरे देश में स्‍थापित किया गया. उसकी बानगी इसी से समझी जा सकती है कि 100 विमल फ्रेंचाइजी स्‍टोर केवल एक दिन के भीतर खोले गए थे और इसने एक रिकॉर्ड बनाया. इसके साथ ही रिलायंस ब्रांड के शुरुआती दौर में धीरूभाई लगातार अपनी कंपनी का नाम बदलते रहे. रिलायंस कमर्शियल कारपोरेशन के बाद इसका नाम रिलायंस टेक्‍सटाइल्‍स प्राइवेट लिमिटेड रखा गया. उसके बाद अंतिम रूप से मौजूदा नाम रिलायंस इंडस्‍ट्रीज लिमिटेड रखा गया.

रेस्‍टोरेंट में खाने के शौकीन
अपने युवा दिनों में धीरूभाई कम पैसा पास में होने के बावजूद अलग-अलग महंगे रेस्‍टोरेंट में जाकर खाने पर पैसा खर्च किया करते थे. दरअसल उनको शुरू से ही यकीन था कि वह एक दिन बहुत अमीर आदमी बनेंगे.

अखबार पढ़कर सीखी अंग्रेजी
धीरूभाई की सीखने की इतनी ललक थी कि अंग्रेजी के अखबारों को पढ़कर उन्‍होंने अंग्रेजी सीख ली क्‍योंकि बचपन में आर्थिक दिक्‍कतों के चलते वह बहुत ज्‍यादा शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाए थे. वह सीखकर लोगों को आगे बढ़ने और अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रेरित करते थे. उनका कहना था, 'यदि अपने सपनों का निर्माण नहीं कर पाएंगे तो कोई दूसरा आपको उसके सपने पूरा करने में मदद के लिए हायर कर लेगा.'