'इमरजेंसी में मौलिक अधिकारों का हनन हुआ'

खास बातें

  • उच्चतम न्यायालय ने स्वीकार किया है कि वर्ष 1975 में आपातकाल के समय उसने भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन किया था।
नई दिल्ली:

उच्चतम न्यायालय ने स्वीकार किया है कि वर्ष 1975 में आपातकाल के समय उसने भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन किया था। इसके साथ ही न्यायालय ने हत्या के मामले में अपनी ओर से सुनाई गई मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया। न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली की खंडपीठ ने अपने एक निर्णय में आपातकाल की स्थिति के संदर्भ में यह राय रखी। खंडपीठ ने कहा कि वर्ष 1976 में जबलपुर के एडीएम वी शिवकांत शुक्ला के मामले में उच्चतम न्यायालय की पांच न्यायधीशों की पीठ द्वारा मौलिक अधिकारों का निलंबन बरकरार रखने का फैसला सही नहीं था। न्यायमूर्ति गांगुली ने राय रखी, इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जबलपुर के एडीएम के मामले में न्यायालय के बहुमत के फैसले से देश की जनता के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ था। न्यायाधीश ने हत्या के मामले में मौत की सजा पाए रामदेव चौहान उर्फ राजनाथ चौहान को दी मौत की सजा को भी बदल दिया। खुद उनकी मौजूदगी वाली खंडपीठ ने पांच मई, 2009 को सुनाए अपने एक फैसले में चौहान को मिली मौत की सजा को बरकरार रखा था। चौहान ने आठ मार्च, 1992 को अपने ही परिवार के चार लोगों की हत्या कर दी थी। न्यायमूर्ति गांगुली ने कहा, जबलपुर के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट वी शिवकांत शुक्ला के मामले में न्यायालय की ओर से दिए गए बहुमत के फैसले को याद करें तो उसमें न्यायाधीशों ने यह राय दी थी कि 27 जून, 1975 को राष्ट्रपति की ओर से जारी आदेश के अनुसार प्रतिबंधात्मक कानून मीसा के तहत हिरासत में लिया गया कोई भी व्यक्ति अनुच्छेद 226 के अंतर्गत कोई याचिका दाखिल नहीं कर सकता। राष्ट्रपति का यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 359 (1) के तहत आया था। आपातकाल के इस मामले के बाद खंडपीठ ने चौहान के मामले में भी स्पष्ट राय रखी। पहले उच्चतम न्यायालय की ही एक खंडपीठ ने यह कहते हुए मौत की सजा को बरकरार रखा था, उच्चतम न्यायालय की ओर से कोई फैसला बरकरार रखे जाने के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास इस बात अधिकार नहीं है कि वह मौत की सजा को उम्रकैद में बदनले के लिए राज्यपाल से सिफारिश करे। दरअसल, चौहान को गुवाहाटी की एक सत्र अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी। बाद में उच्च न्यायालय ने भी इस सजा को बरकरार रखा। यही नहीं, 31 जुलाई, 2000 को उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति के टी थॉमस और आर पी सेठी की खंडपीठ ने भी चौहान की मिली मौत की सजा को बरकरार रखा। चौहान की दलील यह थी कि वारदात के वक्त वह महज 16 साल का था और इस आधार पर उसे मौत की सजा नहीं दी जा सकती। बाद में चिकित्सा जांच में न्यायालय ने पाया कि वारदात के समय वह 20 साल का था और ऐसे में उसका मामला किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत नहीं आया। इस मामले पर दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए 10 मई, 2001 को न्यायालय की एक खंडपीठ ने बहुमत से चौहान की सजा को बरकरार रखने का फैसला फिर कर दिया। इस फैसले में ही एक न्यायाधीश ने एक अलग राय रखी। इस न्यायाधीश ने कहा कि चौहान की उम्र को लेकर संदेह है और ऐसे में उसे उम्रकैद की सजा दी जा सकती थी। चौहान मामले पर एक जर्नल में लेख प्रकाशित होने के बाद मानवाधिकार आयोग ने दखल दिया। आयोग ने असम के राज्यपाल से आग्रह किया कि चौहान की उम्र को लेकर संदेह होने की स्थिति में उसे मिली मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील किया जाना चाहिए। आयोग की इस सिफारिश के बाद पीड़ित परिजनों ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। न्यायालय ने आठ मई, 2009 को आयोग को फटकरार लगाई और कहा कि उसके पास इस मामले में दखल देने का कोई आधार नहीं है। चौहान ने उच्चतम न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए दूसरी बार पुनर्विचार याचिका दायर की। अब उसकी याचिका पर न्यायालय ने कहा, अगर हम वर्ष 1993 के अधिनियम की धारा 12 (जे) पर गौर करेंगे तो मालूम पड़ता है कि मानवाधिकार आयोग मानवाधिकारों को बढ़ावा देने के लिए जरूरी पहल कर सकता है।

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