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सरकारी बंगला खाली न करने वाले पूर्व सांसदों की मुश्किल बढ़ाएगा नया कानून

लोकसभा चुनाव में हारने वाले सांसदों में से 81 सांसदों ने अब तक दिल्ली स्थित सरकारी बंगला खाली नहीं किया है.

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सरकारी बंगला खाली न करने वाले पूर्व सांसदों की मुश्किल बढ़ाएगा नया कानून
नई दिल्ली:

कार्यकाल समाप्त होने या लोकसभा चुनाव में हार के बाद भी सरकारी बंगला नहीं छोड़ने वाले सांसदों के लिए अब संसद द्वारा पारित नया कानून मुश्किलें बढ़ाने वाला है. आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा सोमवार को जारी बयान के अनुसार सरकारी स्थान (अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) संशोधन अधिनियम 2019 को 15 सितंबर से लागू कर दिया गया है. इस संशोधित कानून के तहत 15 दिन के नोटिस की औपचारिकता पूरी करने की जरूरत नहीं होगी. अब कब्जाधारक को बंगला खाली नहीं करने का कारण बताने के लिये सिर्फ तीन दिन का समय देते हुये एक नोटिस जारी किया जा रहा है. संतोषजनक कारण नहीं बता पाने पर संपदा निरीक्षक संपत्ति को खाली करा सकेंगे. 

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गत जून में हुये लोकसभा चुनाव में हारने वाले सांसदों में से 81 सांसदों ने अब तक दिल्ली स्थित सरकारी बंगला खाली नहीं किया है. मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि इन सांसदों को संसद सदस्यता खत्म होने की तारीख से 30 दिन के भीतर बंगला खाली करना था लेकिन ऐसा नहीं कर पाने वाले सांसदों को संपदा निदेशालय की ओर से 15 दिन का नोटिस भी भेजा जा चुका है. 

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 17 वीं लोकसभा के हाल ही में संपन्न हुये पहले संसद सत्र में मंत्रालय द्वारा पेश सरकारी स्थान (अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) संशोधन विधेयक 2019 को दोनों सदनों से पारित किया गया था. इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद विधि एवं न्याय मंत्रालय ने नौ अगस्त को अधिसूचित कर दिया था. इसके बाद संपदा निदेशालय ने भी इसे बतौर कानून लागू करने की अधिसूचना 12 सितंबर को जारी कर दी. अधिसूचना के मुताबिक इस कानून को 15 सितंबर से प्रभावी घोषित किया गया है. केन्द्रीय कर्मचारियों, संसद सदस्यों और अन्य प्रमुख व्यक्तियों को सरकारी आवास के आवंटन, रखरखाव और खाली कराने का दायित्व मंत्रालय के अंतर्गत संपदा निदेशालय का है. 

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सरकारी आवास के अनधिकृत उपयोग की समस्या से सख्ती से निपटने के लिये इस कानून में प्रभावी प्रावधान किये गये हैं. मंत्रालय ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि केन्द्र सरकार अपने कर्मचारियों, संसद सदस्यों और अन्य प्रमुख व्यक्तियों को उनके कार्यकाल के दौरान लाइसेंस के आधार पर आवासीय सुविधा मुहैया कराती है. आवंटन नियमों के मुताबिक आवंटी को कार्यकाल समाप्त होने पर आवास खाली नहीं करने पर उसे अनधिकृत कब्जे की श्रेणी में रखा जाता है. संशोधित कानून लागू होने से पहले की प्रक्रिया के तहत सरकारी आवास खाली कराने में पांच से सात सप्ताह का समय लगता था. आवंटी द्वारा मामले को अदालत में ले जाने पर इस प्रक्रिया में लगभग चार सप्ताह का अतिरिक्त समय लगता था. इससे अधिक समय तक अदालती प्रक्रिया चलने पर मामला सालों साल चलता था.

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(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)


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