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स्वदेश-निर्मित लड़ाकू विमान 'तेजस' को विमानवाहक पोत पर लैंड कराना - छोटी टीम कर रही है बड़ी डेडलाइन का सामना

गोवा में समुद्रतट पर बनी टेस्ट फैसिलिटी में इस परीक्षण का बार-बार सफल होना ही साबित करेगा कि LCA-N सबसे अहम डिज़ाइन फीचर - किसी भी विमानवाहक पोत के डेक पर 'अरेस्टेड लैंडिंग' के जबाव को यह विमान झेल सकता है - बिल्कुल सही काम कर रहा है.

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स्वदेश-निर्मित लड़ाकू विमान 'तेजस' को विमानवाहक पोत पर लैंड कराना - छोटी टीम कर रही है बड़ी डेडलाइन का सामना

सरकार पहले ही तेजस को विकसित करने के लिए 3,500 करोड़ रुपये आवंटित कर चुकी है.

नई दिल्ली:

हो सकता है, आने वाले छह महीनों के भीतर भारत के सबसे महत्वाकांक्षी लड़ाकू विमान विकास कार्यक्रमों से एक को अपने अस्तित्व के लिए असमंजस-भरे माहौल का सामना करना पड़े. संभावना है कि दिसंबर में रक्षा मंत्रालय इस बात पर फैसला करेगा कि स्वदेश-निर्मित हल्के लड़ाकू विमान 'तेजस' के विमानवाहक पोत से उड़ सकने और उस पर उतरने योग्य संस्करण को विकसित करने का काम बंद कर दिया जाए, या उसमें निवेश जारी रखा जाए. सरकार पहले ही इस लड़ाकू विमान को विकसित करने के लिए 3,500 करोड़ रुपये आवंटित कर चुकी है, और अब उसे साफ-साफ जवाब की ज़रूरत है. क्या तेजस-एन का प्रोटोटाइप, जिसका परीक्षण इस वक्त किया जा रहा है, ऐसे विमान का रूप ले सकेगा, जो पोत से उड़ सके, उस पर उतर सके, और हिन्द महासागर के इलाके में उभर रहे खतरों से निपटने में सक्षम हो? और क्या इस प्रोटोटाइप के अत्याधुनिक संस्करण, जिन्हें LCA-N Mk-2 कहा जा रहा है, पांच से सात साल के निश्चित समय के भीतर विकसित, निर्मित और तैनात किए जा सकते हैं?

अब चूंकि विकास कार्यक्रम की गति बढ़ाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है, इसलिए भारतीय नौसेना, एयरोनॉटिकल डिज़ाइन एजेंसी (ADA) तथा हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के पायलटों, इंजीनियरों और डिज़ाइन-टीम सदस्यों की एक छोटी कोर टीम जी-जान से जुटी हुई है कि अहम लक्ष्यों को समय से पूरा किया जा सके. इस वक्त इनमें सबसे बड़ा लक्ष्य है 260 किलोमीटर (140 नॉट्स) से कुछ ही कम रफ्तार से उड़ने वाले साढ़े दस टन के लड़ाकू विमान का समुद्रतट पर मौजूद विमानवाहक पोत के डेक की नकल पर तेज़ी से झुकना, उतरना, अपने फ्यूज़लेज पर लगे हुक के ज़रिये रनवे पर मौजूद अरेस्टिंग वायर को पकड़ना, और सिर्फ 90 मीटर की दूरी के भीतर रुक जाना सुनिश्चित हो सके. किसी भी विमानवाहक पोत के डेक पर 'अरेस्टेड लैंडिंग' के लिए यही सब कुछ करना पड़ता है, जो अब तक कुछ ही लड़ाकू विमान कर पाते हैं, जिन्हें अमेरिका, रूस, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और हाल ही में चीन ने विकसित किया है.

गोवा में समुद्रतट पर बनी टेस्ट फैसिलिटी में इस परीक्षण का बार-बार सफल होना ही साबित करेगा कि LCA-N सबसे अहम डिज़ाइन फीचर - किसी भी विमानवाहक पोत के डेक पर 'अरेस्टेड लैंडिंग' के जबाव को यह विमान झेल सकता है - बिल्कुल सही काम कर रहा है. जब समुद्रतट पर होने वाले ये परीक्षण सफल हो जाएंगे, तभी LCA-N के प्रोटोटाइप के विकास कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे नौसेना पायलट अगला कदम उठा पाएंगे - यानी भारत के एकमात्र ऑपरेशनल विमानवाहक पोत INS विक्रमादित्य पर वास्तव में इसे लैंड कराया जाएगा.

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LCA-N विकास टीम के जुड़े अहम सदस्यों ने NDTV से बातचीत में बताया कि उन्होंने पिछले लगभग एक महीने के दौरान गोवा टेस्ट फैसिलिटी में 60 बार उड़ान भरी है, और मॉनसून के खत्म होते ही अहम लैंडिंग ट्रायल शुरू कर देने के लिए तैयार हैं. विमान को INS विक्रमादित्य के डेक पर पहुंचाने के लिए LCA-N के इंजीनियरों और पायलटों को इस बात के प्रति आश्वस्त होना होगा कि विमान 7.5 मीटर प्रति सेकंड (1,500 फुट प्रति मिनट) के 'सिंक रेट' (नीचे आने की गति) से क्षतिग्रस्त हुए बिना पोत पर पहुंच सकता है. हालांकि संभवतः वे इस सिंक रेट पर विमान का परीक्षण तत्काल नहीं करेंगे, लेकिन पोत ट्रायल के योग्य साबित होने के लिए उन्हें सफलतापूर्वक सिद्ध करना होगा कि वे 5.6 मीटर प्रति सेकंड के सिंक रेट से लैंड कर सकते हैं. अब तक विमान का परीक्षण 5.1 मीटर प्रति सेकंड के सिंक रेट से किया गया है. प्रोजेक्ट से जुड़े इंजीनियरों तथा पायलटों को भरोसा है कि वे लैंडिंग सर्टिफिकेशन के लक्ष्य को हासिल कर लेंगे.

यदि यह मान लिया जाए कि LCA-N परीक्षण में INS विक्रमादित्य के डेक पर उतरने के लिए क्वालिफाई कर जाता है, फिर भी दो ऐसी अहम बाधाएं हैं, जिनसे पार पाना बेहद ज़रूरी है. विमान को उड़ा रहे टेस्ट पायलटों को लैंडिंग के दौरान उतरने से ऐन पहले विमानवाहक पोत से हटने वाली हवा के प्रभाव को खुद अनुभव करना होगा. सुरक्षित 'अरेस्टेड लैंडिंग' के लिए LCA-N को उतरते वक्त 240-260 किलोमीटर (130-140 नॉट्स) की लगभग समान गति बनाए रखनी होगी, और ध्यान रखना होगा कि पोत के डेक पर हवा के अलग-अलग हालात का आसानी से असर हो जाता है. इन हालात का अनुभव लेने के लिए टेस्ट पायलट कई बार INS विक्रमादित्य के डेक पर 'टच एंड गो' करेंगे, जिसमें वे उतरते ही पूरी तरह रुके बिना दोबारा उड़ान भर लेते हैं. विमानवाहक पोत पर सम्पूर्ण 'अरेस्टेड लैंडिंग' तभी हो पाएगी, जब टेस्ट पायलट लैंडिंग के लिए नीचे आते वक्त विमान की स्थिरता और लैंड करते वक्त एक समान गति बनाए रखने के प्रति आश्वस्त हो जाएंगे.

इसके अलावा, एक और बड़ी तकनीकी चिंता है, जो LCA-N के विकास कार्यक्रम पर असर डाल सकती है. INS विक्रमादित्य पर विमान के लैंड करते ही उसकी गति घटा देने वाला मैकेनिकल सिस्टम, यानी अरेस्टर गियर, उस अरेस्टर गियर से डिज़ाइन के लिहाज़ से काफी अलग है, जो गोवा की टेस्ट फैसिलिटी में लगा हुआ है. LCA-N प्रोजेक्ट टीम के अहम सदस्य उम्मीद कर रहे हैं कि इस अंतर से प्रोजेक्ट पर असर नहीं पड़ेगा, लेकिन आश्वस्त वे तभी हो सकेंगे, जब वास्तव में पोत पर लैंडिंग कर ली जाएगी.

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और अंत में, सबसे बड़ी दिक्कत - जिसे तेजस-एन टीम के अहम सदस्य ने 'अधिग्रहण बनाम विकास बहस' का नाम दिया है. हालांकि अभी नौसेना LCA-N प्रोजेक्ट को पूरा समर्थन दे रही है, लेकिन वह अमेरिका या फ्रांस से 57 पूर्णतः विकसित लड़ाकू विमान खरीदने के लिए भी उत्सुक है. भारतीय नौसेना बोइंग एफए/18 ई/एफ 'हॉरनेट' तथा दसॉ द्वारा निर्मित राफेल-एम पर नज़र टिकाए है, जो युद्ध में इस्तेमाल किए जाने की वजह से खुद को सिद्ध कर चुके हैं. अब अहम सवाल यह है - क्या तेजस-एन के विकास कार्यक्रम तथा पश्चिम से इस तरह के विमानों का खरीदा जाना, दोनों के लिए पर्याप्त फंड उपलब्ध होगा?

तेजस-एन टीम के सदस्यों ने NDTV से कहा कि उनसे अक्सर पूछा जाता है, "आपको ऐसा कुछ फिर से बनाने की क्या ज़रूरत है, जो पहले ही बनाया जा चुका है...?" इस सवाल का जवाब सरकार की 'मेक इन इंडिया' के प्रति कटिबद्धता को साबित कर सकता है, और देश की सबसे चुनौतीपूर्ण लड़ाकू विमान परियोजना का भविष्य उज्ज्वल कर सकता है.



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