Covid-19 के दौर में कई शोधों में लगे रिसर्च स्कॉलरों की कोई सुनने वाला नहीं, महीनों से नहीं मिली फेलोशिप

भारत में बीते छह महीने से CSIR, ICMR,DST और DBT की तरफ से रिसर्च कर रहे हजारों छात्रों को फेलोशिप नहीं मिली है. नई दवा और नई तकनीक पर शोध करने वाले ये रिसर्चर आजकल मकान के किराए और दो जून की रोटी में उलझे हैं.

Covid-19 के दौर में कई शोधों में लगे रिसर्च स्कॉलरों की कोई सुनने वाला नहीं, महीनों से नहीं मिली फेलोशिप

बड़े संस्थानों के साथ रिसर्च में लगे स्कॉलरों को महीनों से फेलोशिप नहीं मिली है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

खास बातें

  • रिसर्च स्कॉलरों की मुश्किल
  • महीनों से नहीं मिली फेलोशिप
  • सरकारी संस्थाओं की ओर से कोई जवाब नहीं
नई दिल्ली:

भारत में बीते छह महीने से CSIR (Council of Scientific & Industrial Research), ICMR (Indian Council of Medical Research), DST (Department of Science and Technology) और DBT (Department of Biotechnology) की तरफ से रिसर्च कर रहे हजारों छात्रों को फेलोशिप नहीं मिली है. नई दवा और नई तकनीक पर शोध करने वाले ये रिसर्चर आजकल मकान के किराए और दो जून की रोटी में उलझे हैं. रिसर्च पर भारत अपनी GDP का केवल 0.7 फीसदी खर्च करता है उसमें भी लाल फीताशाही और कागजी खानापूर्ति के चलते रिसर्च में सालों साल खपाने वाले स्कॉलर्स को पैसा वक्त से नहीं मिल पा रहा है. 

देश के नामी चिकित्सा संस्थान AIIMS में अनिद्रा पर रिसर्च करने वाले लालचंद विश्वकर्मा के खुद की रातों की नींद हराम हैं. महोबा के रहने वाले लालचंद्र ने नौकरी के बजाए रिसर्च करने की सोची. JRF की परीक्षा पास कर रिसर्च में लगे उनका ये शोध नामी अखबारों और रिसर्च पेपर में भी छपा, लेकिन दिल्ली में मकान का किराया देने के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं. बीते छह महीने से 35000 हजार रुपए की फेलोशिप नहीं मिली है. उन्होंने NDTV से बातचीत में कहा, 'सरकारी कर्मचारियों को वक्त से पैसा मिलता है, लेकिन हमें टाइम से फेलोशिप नहीं मिली है, इसकी वजह से हम पूरा दिमाग रिसर्च में लगा ही नहीं पाते हैं.'

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AIIMS ही नहीं international centre for genetic engineering and biotechnology जैसे प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट में टीबी पर रिसर्च करने वाले संदीप कौशिक भी पैसे की कमी से जूझ रहे हैं. लॉकडाउन के चलते लैब बंद रही है अब एक तरफ रिसर्च पूरा करने का दबाव दूसरी तरफ फेलोशिप न आने से आर्थिक तंगी से संदीप खासी परेशानी में हैं. उन्होंने बताया, 'मार्च के बाद से मेरी फेलोशिप नहीं आई है. अब मुझे कमरे का किराया देना है, कुछ और सामान खरीदना है लेकिन पैसा न होने के चलते दिमाग परेशान है, जिसका असर मेरे रिसर्च पर पढ़ रहा है.'

संदीप और लालचंद जैसे करीब 30 हजार से ज्यादा रिसर्च स्कॉलर अलग-अलग संस्थानों में शोध कर रहे हैं. इनको 31 हजार से लेकर 55,000 तक की फेलोशिप मिलती है लेकिन वक्त से फेलोशिप न मिलने की शिकायत को लेकर कई बार सड़कों से लेकर ट्विटर तक पर अपनी बात रख चुके हैं. लेकिन साइंस डिपार्टमेंट और मानव संसाधन विकास मंत्रालय इनकी सुनने को तैयार नहीं है. NDTV ने भी  डिपार्टमेंट आफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी से बार-बार संपर्क करने की कोशिश की. उनको एक मेल भी किया लेकिन विभाग की तरफ से हमें भी कोई जवाब नहीं दिया गया है.

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IIT Jodhpur में PHD स्कॉलर सत्यपाल चौधरी ने कहा कि 'चार साल पहले स्कॉलर्स ने प्रदर्शन किया था तब हमारी आवाज सुनी गई थी लेकिन अब कुछ फंडिग एजेंसी है जो बहुत देर कर रही हैं फेलोशिप देने में. इसकी वजह से हमारा इनोवेशन प्रभावित होता है.'

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