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वृंदावन-मथुरा के मंदिरों में चढ़ाए गए फूलों का विधवाओं के सशक्तिकरण के लिए हो इस्‍तेमाल : सुप्रीम कोर्ट

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार ने बताया कि 1.67 करोड़ रुपये की लागत से इन उत्पादों के लिए उद्योग लगाए जाएंगे.

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वृंदावन-मथुरा के मंदिरों में चढ़ाए गए फूलों का विधवाओं के सशक्तिकरण के लिए हो इस्‍तेमाल : सुप्रीम कोर्ट

भारतीय सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

नई दिल्‍ली:

देशभर में विधवाओं के हालात के मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हो रही है. मंगलवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को निर्देश दिया कि मथुरा वृन्दावन के मंदिरों में भगवान को अर्पित होने वाले फूल और हार अब यमुना या कूड़ेदान में नहीं जाएंगे. इन फूलों से विधवा आश्रमों में बनेगा इत्र, गुलाल, धूप और सुगन्धित जल. इससे त्यागी गई और विधवा महिलाओं को रोजगार मिलेगा. कोर्ट ने यूपी सरकार की योजना पर मुहर लगा दी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी व्यवस्था बनारस, तिरूपति जैसे नगरों में भी करने के प्रयास हों. साथ ही कोर्ट ने कहा कि सभी राज्य अपने विधवा आश्रमों की संख्या, रहने वाली महिलाओं और उनके कल्याण के लिए चलाई जा रही योजनाओं की जानकारी की रिपोर्ट दाखिल करेंगे.

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार ने बताया कि 1.67 करोड़ रुपये की लागत से इन उत्पादों के लिए उद्योग लगाए जाएंगे. कन्नौज के इत्र उद्योग विकास निगम और उत्तर प्रदेश महिला कल्याण निगम के साझा प्रयास के इस प्रोजेक्ट की निगरानी ज़िला अधिकारी करेंगे. कोर्ट को ये भी बताया गया कि एक विशेष नोडल एजेंसी बनाई गई है जिसके जरिए मंदिरों से फूल इकट्ठा कर इन आश्रमों तक लाए जाएंगे. यहां उनकी छंटाई के बाद उचित प्रोसेस होगा. और तब इनको अलग-अलग उत्पाद के लिए कारखानों में भेजा जाएगा. फिलहाल वृन्दावन में प्रदेश सरकार की ओर से चलाए जा रहे आश्रमों में 500 से अधिक विधवाएं रह रही हैं.


इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने उतराखंड, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, मिजोरम, असम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, पंजाब, तमिलनाडू और अरुणाचल प्रदेश पर दो- दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया था. विधवाओं के लिए उठाए गए कदम पर केंद्र सरकार को रिपोर्ट ना देने पर यह जुर्माना लगाया गया था. जिन राज्यों ने आधी अधूरी रिपोर्ट दी, उन पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था. कोर्ट ने केंद्र सरकार से सभी राज्यों की रिपोर्ट के आधार पर स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी.

इससे पहले देशभर में विधवाओं के हालात पर सुप्रीम कोर्ट ने पांच लोगों की कमेटी बनाई थी. कमेटी में सामाजिक कार्यकर्ता और वकील शामिल हैं और ये विधवाओं के हालात सुधारने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को लेकर अपनी सिफारिशें देगी. 18 जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि सामाजिक बंधनों की परवाह ना करते हुए वो ऐसी विधवाओं के पुनर्वास से पहले पुनर्विवाह के बारे में योजना बनाए जिनकी उम्र कम है. कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि पुनर्विवाह भी विधवा कल्याणकारी योजना का हिस्सा होना चाहिए. वहीं सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के रोडमैप पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें पौष्टिक भोजन, सफाई समेत कई मुद्दों पर खामियां हैं. कोर्ट ने यहां तक कहा कि विधवा महिलाओं से बेहतर खाना जेल के कैदियों को मिलता है.

जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने कहा था कि विधवाओं के पुनर्वास की बात तो की जाती है लेकिन उनके पुनर्विवाह के बारे में कोई नहीं बात करता. सरकारी नीतियों में विधवाओं के पुनर्विवाह की बात नहीं है जबकि इसे नीतियों का हिस्सा होना चाहिए. वास्तव में सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि वृंदावन सहित अन्य शहरों में विधवा गृहों में कम उम्र की विधवाएं भी हैं. पीठ ने कहा कि यह दुख की बात है कि कम उम्र की विधवाएं भी इन विधवा गृह में रह रही हैं.

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने महिला सशक्तिकरण की राष्ट्रीय नीति में भी बदलाव करने की बात कही है. अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय नीति 2001 में बनी थी और इसे 16 वर्ष बीत चुके हैं. लिहाजा इसमें बदलाव की जरूरत है. कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार से कहा कि हमें नहीं लगता कि महिलाओं का सशक्तिकरण हो पाया है. जवाब में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि स्थितियों में सुधार हो रहा है. सरकार लगातार प्रयास कर रही है. हालांकि उन्होंने कहा कि सरकार राष्ट्रीय नीति में बदलाव करेगी.

पिछली सुनवाई में विधवाओं के लिए रोडमैप तैयार कर ना देने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र पर एक लाख का जुर्माना लगाया था. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को फटकार लगाते हुए कहा था कि आपको विधवाओं की कोई चिंता नहीं है. आप खुद काम नहीं करते और बाद में कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट देश चला रहा है. आपको विधवा महिलाओं के लिए कुछ सोचना चाहिए.

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दरअसल देश में विधवा महिलाओं के कल्याण को लेकर NGO इनवायरमेंट एंड कंज्यूमर प्रोटेक्शन फाउंडेशन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है. इसमें अतुल सेठी की किताब "वाइट शैडो ऑफ वृंदावन" का हवाला भी दिया गया है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने वृंदावन में रहने वाली विधवा महिलाओं के रहने और मेडिकल आदि के लिए आदेश जारी किए थे और फिर मामले को सारे राज्यों से जोड़ दिया था.

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