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अरुण जेटली का स्वभाव चुनावी राजनीति से मेल नहीं खाता था, जानिए- कैसा था संपूर्ण जीवन

अरुण जेटली (Arun Jaitley) में नेतृत्व का उदय जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से हुआ था.

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नई दिल्ली:

अरुण जेटली (Arun Jaitley) कभी लोकसभा चुनाव जीतकर संसद में नहीं पहुंचे लेकिन वह चाहे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार हो या नरेंद्र मोदी की वे हमेशा प्रधानमंत्री के भरोसेमंद मंत्रियों में रहे. वास्तव में चुनावी राजनीति से उनका स्वभाव मेल नहीं खाता था. वे अध्ययनशील थे और देश, समाज के उत्थान के चिंता करने वाले थे. अरुण जेटली में नेतृत्व का उदय जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से हुआ था. छात्र जीवन में ही भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने वाले अरुण जेटली ने वित्त मंत्रालय, कार्पोरेट मामले के मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, कानून मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय संभाला. वे जहां भी रहे, सराहना हासिल करते रहे.          

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के दिग्गज नेता और प्रसिद्ध वकील अरुण जेटली का जन्म 28 दिसम्बर 1952 नई दिल्ली में हुआ था. वकील महाराज किशन जेटली और रतन प्रभा जेटली के पुत्र अरुण जेटली ने अपनी स्कूली शिक्षा दिल्ली के सेंट जेवियर्स स्कूल में 1957 से 1969 के दौरान ली. उन्होंने सन 1973 में दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से बीकॉम किया. इसके बाद उन्होंने सन 1977 में दिल्ली विश्‍वविद्यालय से लॉ की डिग्री हासिल की. वे सन 1974 में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संगठन के अध्यक्ष भी रहे. अरुण जेटली ने 24 मई 1982 को संगीता जेटली से विवाह किया. उनके दो बच्चे पुत्र रोहन और पुत्री सोनाली हैं. अरुण जेटली वेजेटेरियन थे और पंजाबी ब्राह्मण थे. उन्हें अध्ययन करने और लिखने का शौक था. उन्होंने कानून की कई पुस्तकें लिखीं.


अरुण जेटली ने अपने कॉलेज के छात्र जीवन से ही भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष शुरू कर दिया था

अरुण जेटली दिल्ली यूनिवर्सिटी में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र नेता थे. बाद में वे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष भी चुने गए. सन 1973 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भ्रष्टाचार समेत देश के कई तत्कालीन मुद्दों को लेकर संपूर्ण क्रांति आंदोलन शुरू किया जिसको देश भर में व्यापक समर्थन मिला. अरुण जेटली ने भी इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. अरुण जेटली सन 1975 में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय रहे. उस दौर में वे युवा मोर्चा के संयोजक थे. उन्हें आपातकाल के दौरान 19 महीने कानूनी हिरासत में रहना पड़ा था. वे पहले अंबाला जेल में और फिर तिहाड़ जेल में रहे थे. जेल से वापसी के बाद अरुण जेटली ने जनसंघ की सदस्यता ले ली. सन 1977 में अरुण जेटली लोकतांत्रिक युवा मोर्चा के संयोजक बने.   

अरुण जेटली सीए बनना चाहते थे लेकिन उन्होंने अपने पिता के पेशे वकालत को ही अपनाया. राजनीति में आने से पहले अरुण जेटली सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर रहे थे. सन 1977 में एलएलबी करने के बाद अरुण जेटली सुप्रीम कोर्ट और देश के कई उच्च न्यायालयों में वकालत करने लगे थे. जनवरी 1990 में अरुण जेटली को दिल्ली हाईकोर्ट ने वरिष्ठ वकील नामित किया. अरुण जेटली को सन 1989 में वीपी सिंह सरकार के दौर में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया गया था. इस दौरान उन्होंने बोफोर्स घोटाले की जांच की तफसील तैयार की थी. जेटली ने भारतीय ब्रिटिश विधिक न्यायालय के समक्ष 'भारत में भ्रष्टाचार और अपराध' विषय पर दस्तावेज प्रस्तुत किए. जून 1998 में नशीले पदार्थों की तस्करी पर रोक लगाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून को अधिनियमित करने के उद्देश्य से आयोजित संयुक्त राष्ट्र संघ सम्मेलन में वे भारत सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल हुए थे. विधिक और समसामयिक समस्याओं पर अनेक जेटली ने कई पुस्तकें लिखीं. लालकृष्ण आडवाणी, माधवराव सिंधिया समेत कई वरिष्ठ नेता अरुण जेटली के क्लाइंट रहे हैं.

अरुण जेटली के 1977 में जनसंघ में शामिल होने के साथ ही उसी वर्ष उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का सचिव और फिर 1980 में अध्यक्ष बनाया गया. वे 1991 में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने.एक जुलाई 2002 को उन्हें भाजपा का जनरल सेक्रेटरी नियुक्त किया गया. वे 1999 के आम चुनाव से पहले बीजेपी के प्रवक्ता थे. सन 1999 में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए गठबंधन की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के सत्ता में आने पर 13 अक्टूबर 1999 को अरुण जेटली को सूचना और प्रसारण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया. इसके अलावा उन्हें विनिवेश राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) भी नियुक्त किया गया. विनिवेश नीति को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए तब यह नया मंत्रालय बनाया गया था. इसके बाद जेटली 23 जुलाई 2000 को कानून, न्याय और कंपनी मामलों के केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बने. राम जेठमलानी के इस्तीफा देने के बाद उन्हें यह मंत्रालय सौंपा गया था. नवम्बर 2000 में उन्हें कानून, न्याय और कंपनी मामलों के अलावा जहाजरानी मंत्री बनाया गया. भूतल परिवहन मंत्रालय का विभाजन हुआ और तब वे नौवहन मंत्री बने. उन्हें जुलाई 2002 में जम्मू-कश्मीर सरकार के नामांकित व्यक्तियों और राज्यों में शक्तियों के विभाजन के मुद्दे पर अन्य समूहों के साथ चर्चा करने के लिए केंद्र सरकार का प्रतिनिधि नियुक्त किया गया था. उन्हें 29 जनवरी 2003 को केंद्रीय मंत्रिमंडल में वाणिज्य, उद्योग, कानून और न्याय मंत्री बनाया गया. मई 2004 में एनडीए की हार के बाद जेटली पार्टी के महासचिव बने और वकालत भी करने लगे.

अरुण जेटली को 3 जून 2009 को राज्यसभा में विपक्ष का नेता चुना गया. इसके चंद दिन बाद 16 जून को उन्होंने अपनी पार्टी की नीति के अनुसार एक पद, यानी बीजेपी के महासचिव के पद से इस्तीफा दे दिया. राज्यसभा में उन्होंने महिला आरक्षण विधेयक पर बहस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने जन लोकपाल विधेयक के लिए अन्ना हजारे का समर्थन किया. उन्होंने 2009 से 2014 तक राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में कार्य किया.

अरुण जेटली ने 1980 से बीजेपी में सक्रिय होने के बावजूद सन 2014 तक कभी कोई सीधा चुनाव नहीं लड़ा. सन 2014 के आम चुनाव में वे अमृतसर लोकसभा सीट पर लड़े लेकिन कांग्रेस के अमरिंदर सिंह से पराजित हो गए. वे पहले गुजरात से राज्यसभा सदस्य थे. उन्हें मार्च 2018 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए फिर से चुना गया. वे चौथी बार राज्यसभा सांसद बने.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में 26 मई 2014 को अरुण जेटली को वित्त मंत्री बनाया गया. उनको कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय का जिम्मा भी दिया गया था. नवंबर 2015 में जेटली ने कहा कि विवाह और तलाक को नियंत्रित करने वाले व्यक्तिगत कानून मौलिक अधिकारों के अधीन होने चाहिए, क्योंकि संवैधानिक रूप से गारंटीकृत अधिकार सर्वोच्च हैं. वित्त मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान 9 नवंबर, 2016 को भ्रष्टाचार, काला धन, नकली मुद्रा और आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिए 500 और 1000 के नोटों का विमुद्रीकरण कर दिया. यह एक ऐतिहासिक फैसला था, जिसका बड़ा असर पूरे देश और अर्थव्यवस्था पर देखने को मिला. अरुण जेटली को दो जून 2014 को राज्यसभा का नेता चुना गया. वे 27 मई 2014 से 14 मई 2018  तक केंद्रीय वित्त एवं कार्पोरेट मामलों के मंत्री रहे. उनके पास 27 मई 2014 से 9 नवंबर 2014 तक रक्षा मंत्रालय का प्रभार भी रहा. वे 13 मार्च 2017 से 3 सितंबर 2017 तक रक्षा मंत्री के पद पर रहे.

मई 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद जेटली को वित्त और रक्षा मंत्रालय का प्रभार दिया गया था. वे 2014 में छह महीने रक्षा मंत्री रहे. बाद में मनोहर पर्रिकर रक्षा मंत्री बनाए गए. पर्रिकर के गोवा का मुख्यमंत्री बनने के बाद जेटली को 2017 में छह महीने के लिए दोबारा रक्षा मंत्रालय का प्रभार दिया गया. बाद में उनकी जगह निर्मला सीतारमण रक्षा मंत्री बनीं. जेटली की बीमारी के चलते पीयूष गोयल ने दो बार वित्त मंत्रालय संभाला था. मई 2019 में अरुण जेटली ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कह दिया था कि वे नई सरकार में शामिल नहीं हो पाएंगे.



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