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सुप्रीम कोर्ट पहुंचा घर वापसी का मुद्दा, अब दलित क्रिश्चियनों ने मांगा आरक्षण

घर वापसी का मुद्दा अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है. दलित क्रिश्चियनों ने भी सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति के तहत आरक्षण देने की मांग की है.

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सुप्रीम कोर्ट पहुंचा घर वापसी का मुद्दा, अब दलित क्रिश्चियनों ने मांगा आरक्षण

प्रतीकात्मक तस्वीर.

खास बातें

  1. दलित क्रिश्चियनों ने भी अनुसूचित जाति के तहत आरक्षण की मांग की
  2. कोर्ट ने मामले में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय से मांगा जवाब
  3. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को 2004 के मामले के साथ जोड़ दिया है
नई दिल्ली: घर वापसी का मुद्दा अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है. दलित क्रिश्चियनों ने भी सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति के तहत आरक्षण देने की मांग की है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में संविधान के 1950 के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें कहा गया है कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अलावा अन्य किसी को अनुसूचित जनजाति के तहत आरक्षण या लाभ नहीं मिलेगा.

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'घर वापसी के नाम पर धर्म परिवर्तन करा रहे'
याचिका में कहा गया कि इस प्रावधान का गलत फायदा RSS और VHP जैसे राइट विंग संगठन दलित क्रिश्चियन और मुस्लिमों को घर वापसी के नाम पर धर्म परिवर्तन करा कर उठा रहे हैं. याचिका में यह भी कहा गया है कि RSS व उससे जुडे अन्य संगठन सुप्रीम कोर्ट में 2004 से लंबित मामले की सुनवाई में देरी के चलते घर वापसी जैसे फायदे उठा रहे हैं. यहां तक कि केंद्र सरकार भी मामले में जवाब दाखिल करने में देर कर रही है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को मामले की जल्द सुनवाई करनी चाहिए.

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2004 में भी दायर की गई थी याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करने के बाद इस मामले को 2004 के मामले के साथ जोड़ दिया है. याचिका में घर वापसी के मुद्दे पर चिंता जताते हुए इस प्रावधान को रद्द करने की मांग भी की गई है. दरअसल 2004 में इसी तरह की याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी, लेकिन इस पर सुनवाई नहीं हो सकी, क्योंकि केंद्र ने अभी तक जवाब दाखिल नहीं किया है. याचिका में कहा गया है कि RSS और VHP जैसे संगठन देरी का फायदा उठाकर दलित क्रिश्चियन को धर्म परिवर्तन के जरिए अनुसूचित जाति के तहत आरक्षण व लाभ दिलाने का लालच दे रहे हैं. इस तरह यह नियम क्रिश्चियन दलितों के साथ भेदभाव करता है और सरकारों को हिंदू धर्म को पसंद करने का विशेषाधिकार भी देता है. साथ ही यह संविधान के मूल ढांचे जिसमें समानता और धर्मनिरपेक्षता शामिल है का भी उल्लंघन करता है. 


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