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गोरखपुर उपचुनाव : योगी की सीट पर पहले जैसा 'योग' नहीं, चौंका भी सकते हैं परिणाम

सीएम योगी आदित्यनाथ के सामने अपनी गोरखपुर सीट की विरासत को बचाने की कठिन चुनौती, जातिगत वोटों के गणित से जीत की राह नहीं आसान

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गोरखपुर उपचुनाव : योगी की सीट पर पहले जैसा 'योग' नहीं, चौंका भी सकते हैं परिणाम

योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर लोकसभा सीट पर बीजेपी के लिए सपा-बसपा का गठजोड़ कड़ी चुनौती बन गया है.

खास बातें

  1. समाजवादी पार्टी ने प्रवीण कुमार निषाद को बनाया उम्मीदवार
  2. कांग्रेस ने डॉ सुरहिता करीम को चुनावी मैदान में उतारा
  3. बीजेपी प्रत्याशी उपेंद्र शुक्ला के साथ संगठन की ताकत
नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र का उपचुनाव बीजेपी के लिए आसान नहीं है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की इस पारंपरिक सीट पर इस बार चुनावी गणित पहले की तरह बीजेपी के पक्ष में नहीं है. एक तरफ जहां सपा और बसपा मिलकर बीजेपी के खिलाफ ताल ठोक रही हैं वहीं जातिगत वोटों का हिसाब-किताब भी बीजेपी के पक्ष में नहीं है.    

गोरखपुर लोकसभा सीट का गोरखनाथ पीठ के महंत लंबे अरसे से नेतृत्व करते रहे हैं. बीजेपी ने इस उपचुनाव में उपेंद्र शुक्ला को उम्मीदवार बनाया है. गोरखपुर सीट से योगी आदित्यनाथ पांच बार से चुनाव जीतते आए हैं. उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद से यह सीट खाली है. गोरखपुर में 11 मार्च को उपचुनाव होगा.

उपेंद्र शुक्ला पिछले 30 सालों में बीजेपी के पहले ब्राह्मण प्रत्याशी होंगे. योगी आदित्यनाथ ठाकुर हैं. उनसे पहले उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ सांसद थे. योगी आदित्यनाथ ने खुद रणनीति बनाकर अपने गुरु अवैद्यनाथ को सांसद के पद पर पहुंचाया था. उनके बाद योगी ने स्वयं संसदीय क्षेत्र का नेतृत्व संभाल लिया. इस दौरान गोरखनाथ पीठ आराधना स्थल के साथ-साथ राजनीतिक वर्चस्व का प्रतीक भी बना रहा है. महंत अवैद्यनाथ ने पहली बार 1989 में गोरखपुर से चुनाव जीता था. सन 1998 से योगी आदित्यनाथ इस सीट का प्रतिनिधित्व करते रहे. इन दोनों ने मिलकर आठ बार लगातार चुनाव जीते.

उपेंद्र शुक्ला का गोरखपुर मंदिर से भी कोई संबंध नहीं है. हालांकि संगठन में उनकी अच्छी पैठ है. सन 2013 से वे गोरक्ष प्रांत के क्षेत्रीय अध्यक्ष हैं और इस कारण उनका हर तबके से जुड़ाव है. 58 वर्षीय उपेंद्र ग्रेजुएट हैं. उनके गोरक्ष प्रांत का अध्यक्ष बनने के बाद हुए लोकसभा चुनाव में इस प्रांत के 10 जिलों की 13 में से 12 सीटें बीजेपी ने जीतीं. आजमगढ़ से सपा नेता मुलायम सिंह यादव जीते थे. साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भी इस इलाके में बीजेपी को बड़ी सफलता मिली. पूर्वी यूपी के गोरक्ष प्रांत में विधानसभा की 62 सीटें हैं बीजेपी ने इनमें से 46 पर कब्जा किया. माना जाता है कि बीजेपी ने अब शुक्ला को गोरखपुर से उम्मीदवारी देकर पुरस्कृत किया है. गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ हर चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ते रहे हैं. उनकी जीत में मतों का अंतर लगातार बढ़ता गया है. यही कारण है कि यह सीट बीजेपी के लिए नाक का सवाल बनी हुई है.    

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सीएम योगी आदित्यनाथ के सामने अपनी गोरखपुर सीट की विरासत को बचाने की कठिन चुनौती है. समाजवादी पार्टी ने निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद के बेटे इंजीनियर प्रवीण कुमार निषाद को अपना उम्मीदवार बनाया है. जबकि कांग्रेस ने डॉ सुरहिता करीम को चुनावी मैदान में उतारा है. निषाद मछुआरा समुदाय से हैं. गोरखपुर में इस समुदाय की जनसंख्या तीन लाख से अधिक है. बताया जाता है कि निषाद को मुस्लिम दलित समुदाय का भी समर्थन हासिल है.

गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजयनाथ 1952 और 1957 का चुनाव हिंदू महासभा से लड़े थे और कांग्रेस से हारे थे. तीसरी बार 1967 में वे जीते और दो वर्ष बाद उनका निधन हो गया. सन 1969 में उपचुनाव हुआ जिसमें महंत अवैद्यनाथ जीते लेकिन 1970 के चुनाव में कांग्रेस के नरसिंह नारायण पांडेय से हार गए. कई वर्षों के अंतराल के बाद 1989 में वे राजनीति में लौटे. उनके बाद 1998 में योगी आदित्यनाथ राजनीति में सक्रिय हुए. उन्होंने 1998 का चुनाव 26,206 और 1999 का चुनाव सिर्फ 7,339 वोटों से जीता था. दोनों बार उन्हें सपा प्रत्याशी जमुना निषाद ने कड़ी चुनौती दी थी. योगी ने साल 1998 में जीतने के बाद हिंदू युवा वाहिनी गठित की. वर्ष 2004, 2009 और 2014 में योगी को मिलने वाले वोटों की संख्या और जीत का अंतर  बढ़ता गया. 2014 में वे 51.80 प्रतिशत मत हासिल करके 3,12,783 वोट के अंतर से जीते. पिछले तीन चुनावों से समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस को मिले कुल वोटों से भी अधिक मत योगी को मिले.

पिछले चुनावों में सपा और बसपा की पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता का फायदा भी योगी को मिलता रहा है. यह दोनों पार्टियां एक-दूसरे को हराने के लिए लड़ती रही हैं. 2004 में इन दोनों दलों के प्रत्याशी निषाद थे और साल 2009 में ब्राह्मण थे. साल 2014 में फिर सपा-बसपा के प्रत्याशी निषाद जाति से थे. जातिगत वोटों में बंटवारा होने और त्रिकोणीय मुकाबले के कारण योगी का राज बना रहा है.

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VIDEO : बीजेपी के प्रतिद्वंद्वी आए साथ-साथ

बसपा के मैदान में न होने और सपा को समर्थन देने से इस बार सपा और बीजेपी का सीधा मुकाबला है.
इस संसदीय क्षेत्र में निषाद जाति के सबसे अधिक मतदाता हैं. इनकी संख्या लगभग 3.5 लाख है. यादव और दलित मतदाता दो-दो लाख हैं. ब्राह्मण वोटर करीब डेढ़ लाख हैं. यदि चुनाव में निषाद, यादव, मुसलमान और दलित एकजुट हो जाते हैं तो चुनाव परिणाम चौंका भी सकते हैं.


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