यह ख़बर 09 जनवरी, 2014 को प्रकाशित हुई थी

कोयला खदान आवंटन : अटॉर्नी जनरल बोले कोर्ट से नहीं कहा, कुछ गलत हुआ था

कोयला खदान आवंटन : अटॉर्नी जनरल बोले कोर्ट से नहीं कहा, कुछ गलत हुआ था

फाइल फोटो

नई दिल्ली:

केन्द्र सरकार ने आज सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया कि कोयला खदानों के आवंटन में कहीं कुछ गलत हुआ है और अधिक बेहतर तरीके से इस काम को किया जा सकता है। लेकिन, एनडीटीवी से बात करते हुए अटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती ने दावा किया कि उन्होंने सरकार की ओर से कोर्ट में यह नहीं स्वीकारा है कि कुछ गलत हुआ था।

बता दें कि इससे पहले कहा जा रहा था कि न्यायमूर्ति आरएम लोढा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष अटार्नी जनरल गुलाम वाहनवती ने एक तरह से कोयला खदानों के आवंटन में सरकार की गलती स्वीकार करते हुए कहा, हमें  लगता है कि कुछ गलत हुआ है। हम कह सकते हैं कि कहीं कुछ गलत हुआ है और कुछ सुधार करने की जरूरत है। वाहनवती ने यह प्रतिक्रिया उस समय व्यक्त की जब न्यायाधीशों ने कहा कि यह कवायद कहीं अधिक बेहतर तरीके से की जा सकती थी।

अटार्नी जनरल ने कहा, यह सब अधिक बेहतर तरीके से किया जा सकता था। मैं आपके विचार से सहमत हूं। इस मामले की आज सुनवाई शुरू होते ही न्यायाधीशों ने चुनिन्दा कोयला खदानों के आवंटन निरस्त करने के प्रति केन्द्र के दृष्टिकोण के संबंध में अटार्नी जनरल से जानना चाहा। अटार्नी जनरल ने इस पर कहा कि सरकार अगले सप्ताह इस मसले पर अपना दृष्टिकोण स्प्ष्ट करेगी।

अटार्नी जनरल ने सितंबर, 2013 में कहा था कि कोयला खदानों का आवंटन तो महज आशय पत्र है और यह प्राकृतिक संसाधनों पर कंपनियों को कोई अधिकार नहीं देता है, जिसके बारे में राज्य सरकार ही निर्णय करेगी।

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वाहनवती ने यह भी कहा था कि कंपनियों को कोयला खदान आवंटित करने का निर्णय तो पहला चरण है और तमाम मंजूरी प्राप्त करने के बाद जब कंपनियां खनन शुरू करेंगी तभी उन्हें कोयले पर अधिकार मिलेगा।

मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे खनन वाले राज्यों ने शीर्ष अदालत में कहा था कि कोयला खदानों के आवंटन पर पूरी तरह से केन्द्र का नियंत्रण है और इस मामले में उनकी भूमिका तो बहुत कम ही है। न्यायालय इस समय कोयला खदानों के आवंटन में नियमों का उल्लंघन किए जाने के आधार पर 1993 से किए गए आवंटन निरस्त करने के लिए दायर तीन जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि इस प्रक्रिया के दौरान चुनिन्दा कंपनियों को लाभ पहुंचाया गया है।