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#मैंऔरमेरीहिन्दी : लोकप्रिय भाषा के रूप में हिन्दी का 'कमबैक'

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#मैंऔरमेरीहिन्दी : लोकप्रिय भाषा के रूप में हिन्दी का 'कमबैक'

इसकी पूरी संभावना है कि इस लेख में घुसने से पहले ही आप यह सोच बैठें कि एक तरफ 'हिन्दी-का-कुछ-नहीं-हो-सकता' किस्म की चिंता की जा रही है और दूसरी तरफ 'कमबैक' जैसे शब्द का इस्तेमाल करके हम हिन्दी को 'अशुद्ध' करने पर तुले हैं. लेकिन शायद हिन्दी का वर्तमान स्वरूप कुछ ऐसा ही हो गया है या फिर हमेशा से ही ऐसा था. उर्दू के साथ मिलकर हिन्दी बन गई हिन्दुस्तानी और अब अंग्रेजी के साथ मिलकर हिंग्लिश हो गई है. दरअसल हिन्दी स्वभाव से ही काफी 'मिलनसार' है, कोई उसे मिलाए न मिलाए, वह सबको अपने अंदर मिला लेती है.

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* यह हिन्दी क्विज़ खेलिए और जांचिए, कितनी हिन्दी जानते हैं आप...
* जब अंडर सेक्रेटरी को मज़ाक में कहते थे 'नीच सचिव'...
*शुक्रिया डोरेमॉन... हम हैरान हैं, बच्चे को इतनी अच्छी हिन्दी आई कैसे...'
* क्या अवचेतन की भाषा को भुला बैठे हैं हम
* इस तरह हिन्दी भारत की राष्ट्रीय भाषा बनते बनते रह गई

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जहां तक हिन्दी के 'कमबैक' की बात है, यह सवाल उठना जायज़ है कि हिन्दी गई कहां थी. लेकिन अगर हम गौर फरमाए तो 'कमबैक' को अक्सर तब उपयोग में लाया जाता है, जब कोई धमाकेदार तरीके से वापसी करता है, जो गया तो कहीं नहीं था, लेकिन कुछ ऐसा भी नहीं कर रहा था कि चर्चा में आए. ऐसा ही कुछ हिन्दी के साथ हो रहा है, आलोचकों का कहना है कि यह सुप्त अवस्था में पड़ी हुई थी. वैसे तो हिन्दी से हम कभी दूर हुए ही नहीं थे, लेकिन मौजूदा वक्त में जिस तरह और जिन लोगों द्वारा हिन्दी का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसने युवाओं के बीच हिन्दी को 'कूल' बना दिया है. साहित्य, सिनेमा, विज्ञापनों में हिन्दी पहले भी थी, लेकिन धीरे-धीरे उसे अंग्रेजी के तड़के के बगैर, एकदम देसी लिबास में पसंद किया जा रहा है.


आनंद भूषण विज्ञापन एजेंसी कॉन्ट्रैक्ट में क्रिएटिव डायरेक्टर हैं. विज्ञापन बनाते हैं इसलिए लोगों की नब्ज़ पकड़ना और समझना उनके काम का एक हिस्सा है. आनंद कहते हैं, विज्ञापनों में हिन्दी हमेशा से थी लेकिन अब वह और बिंदास तरीके से इस्तेमाल की जाने लगी है. प्रसून जोशी और उनसे भी पहले पीयूष पांडे जिस तरह भारतीय विज्ञापन की दुनिया में छाए रहे, उससे हिन्दी तो पहले ही विज्ञापनों में अपनी पकड़ बनाए हुई थी, लेकिन अब हिन्दी का दखल मीटिंग रूम में भी दिखाई देता है. अपनी बात को समझाते हुए आनंद कहते हैं, 'पहले जब हम क्लायंट के सामने कोई आइडिया रखते थे तो पसंद न आने पर वह कहता था 'Its not working' अब कहता है 'यार मज़ा नहीं आ रहा.' हिन्दी सिर्फ भाषा नहीं, एक अनौपचारिकता भी अपने साथ लेकर आती है, जो माहौल को ज़रा हल्का-फुल्का बनाती है.'

वैसे आनंद की मानें तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हिन्दी में बात करना, भाषण देना भी हिन्दी की लोकप्रियता को बढ़ा रहा है. आनंद कहते हैं 'मोदी शायद पहले पीएम हैं, जिन्हें अंग्रेजी बहुत अच्छे से नहीं आती और इसे वह 'छिपाते' नहीं हैं. पहले के प्रधानमंत्री भी हिन्दी में बोलते थे, लेकिन वह अंग्रेजी में भी सहज थे. यह कहीं न कहीं लोगों तक यह बात पहुंचाता है कि सिर्फ हिन्दी से भी काम बन सकता है. देश का सबसे बड़ा नेता अगर हिन्दी में अपनी बात रख सकता है तो फिर हम क्यों नहीं.'

इसमें कोई शक नहीं कि मोदी सरकार भी हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए तमाम प्रयास कर रही है. इसका एक उदाहरण इसी साल तब देखने को मिला, जब सरकार ने अपने एक आदेश के ज़रिये सभी केंद्रीय मंत्रालयों को साफ तौर पर कहा कि हिन्दी अखबार में किसी भी मंत्रालय का अंग्रेजी विज्ञापन न छापा जाए. साथ ही हर मंत्रालय यह स्पष्ट करे कि वह अपने फंड का कितना हिस्सा हिन्दी के बढ़ावे के लिए रख रहा है. इधर ट्विटर पर भी हिन्दी हैशटैग ने ट्रेंडिग लिस्ट में अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है. 2015 में ट्विटर ने हिन्दी में हैशटैग की शुरुआत की और पिछले ही साल जब विश्वकप के दौरान भारत ने पाकिस्तान को हराया तब #जयहिन्द ट्विटर पर ट्रेंड करने वाला पहला हिन्दी हैशटैग बना. इसके कुछ दिन बाद #हरहरमहादेव ने भी ट्रेंडिंग लिस्ट में जगह बनाई.

विज्ञापनों से अलग, साहित्य में भी हिन्दी ने एक नए तरह से वापसी की है. हिन्दी साहित्य को 'गंभीरता' और 'क्लिष्ट' होने का तमगा देने वालों के सामने अब 'नई वाली हिन्दी' आ गई है. हिन्द युग्म प्रकाशन के संपादक शैलेश भारतवासी बीते सालों में कुछ ऐसे हिन्दी उपन्यास और कहानियां बाज़ार में लेकर आए हैं, जो युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो रहे हैं. मम्मा की डायरी, मसाला चाय, बकर पुराण, टर्म्स एंड कंडीशन्स अप्लाय - अलग-अलग लेखकों की यह कृतियां शैलेश द्वारा गढ़ी गई लाइन 'नई वाली हिन्दी' की सोच के साथ प्रकाशित हुई हैं.
 


शैलेश अपना अनुभव बांटते हुए कहते हैं, 'अपने इंजीनियरिंग कॉलेज के ज़माने में मेरे दोस्त मुझे हिन्दी किताबों को पढ़ता देख अक्सर कहा करते, अरे! इतनी बोरिंग चीज़ें पढ़ता कैसे है! मैंने यह महसूस भी किया कि हिन्दी किताबें पढ़ते हुए मैं उनकी नज़र में उनसे अधिक बोरिंग, अधिक 'अकूल' और अधिक गंभीर हो गया था (जो किन्हीं भी अर्थों में अच्छा नहीं था). जीवन में ऐसे बहुत से मौक़े आए, जब मुझे या मेरे तमाम दोस्तों को हिन्दी पढ़ने की बात से ख़ुद को सौ साल पीछे पहुंच जाने वाली स्थितियों से दो-चार होना पड़ा.'

शैलेश के मुताबिक 'नई वाली हिन्दी - यह नारा या पंचलाइन हमने केवल इसलिए उछाला है ताकि तमाम ऐसे लोग जो हिंदी के पाठक हो सकते हैं, वे एक बार ठिठककर सोचें कि यार! ‘कूल चीज़ें तो हिंदी में भी हैं.' दरअसल हम कोई अलग हिंदी परोसने के उद्देश्य से इन नारे के इर्द-गिर्द अपनी दुकान नहीं सजा रहे बल्कि तमाम किस्म की चल रही हिंदी की रिपैकेजिंग कर रहे हैं. हिंदी में पाठकों के फ्लो का अभाव है. दरअसल यहां कोई फ्लो ही नहीं है. और हमें लगता है कि ‘नई वाली हिंदी’ की वजह से कुछ पाठक बने भी हैं, जो आगे चलकर हिन्दी की तमाम कालजयी-सालजयी किताबों के पाठक भी बनेंगे. हर दिन किसी-न-किसी किताब के बहाने हम तक ऐसा संदेश पहुंचता है कि आपके प्रकाशन से छपी फलां किताब हमारी ज़िंदगी की पहली हिन्दी किताब है (कोर्स की किताबों और प्रेमचंद की किसी किताब के बाद)...'

इधर फिल्मों में हिन्दी गाने एक बार फिर अपनी शायरी और कविता के साथ लौट रहे हैं. 80-90 के दशक पर अक्सर हिन्दी गानों के स्तर में गिरावट लाने की तोहमत लगाई जाती है, लेकिन मौजूदा दौर में अगर एक तरफ 'जॉनी जॉनी हां जी, तूने पी है ना जी' लोकप्रिय हो सकता है तो दूसरी तरफ 'पिया ना रहे बन बसिया' जैसा मधुर गीत भी उसके कद्रदानों तक पहुंच जाता है. राज शेखर ऐसे ही एक गीतकार हैं, जिनके गीत दिल टूटने वालों को 'मूव ऑन' का संदेश देते हैं, लेकिन साथ में हिन्दी का दामन भी थामे रखते हैं.
 


शेखर बताते हैं कि किस तरह 'तनु वेड्स मनु' का गीत 'ऐ रंगरेज़ मेरे' शायद कभी श्रोताओं तक पहुंच ही नहीं पाता. वह कहते हैं 'रंगरेज़ को फिल्म से निकालने की पूरी तैयारी हो चुकी थी, क्योंकि बहुत लोगों को लगता है कि उन्हें पता है कि दर्शकों और श्रोताओं को क्या चाहिए. लेकिन फिल्म के निर्देशक आनंद राय अड़ गए कि यह गाना कहीं नहीं जाएगा. गानों को कई बार ओपनिंग के नज़रिये से भी आंका जाता है, लेकिन बात यही है कि खाने में अगर सिर्फ अचार होगा तो वह खाना नहीं कहलाएगा न...'

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शेखर के मुताबिक वह खुशनसीब हैं कि उन्होंने जिन किरदारों के लिए गीत लिखे, वह काफी दिलचस्प थे. अगर यही गीत किसी शहरी लड़के या लड़की के लिए लिखने होते तो शायद उन्हें भी 'पुंगी बजाकर' लिखना पड़ता. 'बेसिर-पैर' की तोहमत झेल रहे गानों के लिए शेखर का कहना है कि संगीत कमाई का एक बहुत बड़ा साधन है, कॉलर ट्यून और कई सारी चीज़ों से कमाई होती है. ऐसे में संगीत कंपनियों में भी काफी अफरातफरी रहती है, सब चाहते हैं कि जल्दी से पैसे आ जाएं, जल्दी से हिट हो जाएं. हम कितने दिन तक रहेंगे, हम कब तक याद रहेंगे, इसके बारे में बहुत कम लोग सोचते हैं.'

RajShekhar@Facebook

वैसे फिल्मी गीतों से अलग राजशेखर और उनके मित्र गिटारिस्ट स्वरूपनाथ भात्रा ने ‘मजनूं का टीला’ नाम का एक अड्डा शुरू किया है जिसमें राज अपनी और अन्य कवियों की कविताओं को संगीत के नोट्स के साथ मिलाकर प्रस्तुति देते हैं. इससे जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए राज कहते हैं कि 'मजनूं का टीला का सबसे अच्छा रिस्पॉन्स मुझे वहां से मिला जहां मैंने उम्मीद ही नहीं की थी. साउथ मुंबई. यही नहीं बैंगलुरू के दर्शकों के बीच कुछ अपरिचित और देशज शब्दों के होते हुए भी मैं उन तक अपनी बता पहुंचा पाया.'

एक तरफ हिन्दी को लेकर स्यापे किए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ 'हिन्दी रिटर्न्स' का जश्न मनाया जा रहा है. तो क्या उम्मीद की जा सकती है कि यह नए पैकेज वाली हिन्दी अब कहीं नहीं जा रही है...



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