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हिन्दी दिवस पर विशेष : अब तक हुई रस्म निभाई, आखिर कैसे हो हिन्दी की भलाई

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हिन्दी दिवस पर विशेष : अब तक हुई रस्म निभाई, आखिर कैसे हो हिन्दी की भलाई

कंप्यूटर और मोबाइल पर हिन्दी का इस्तेमाल...

नई दिल्ली:

हिन्दी के लिए हिन्दी में कुछ किया जाए तो अच्छा लगता है, लेकिन जब दीगर भाषा-भाषी कुछ करते हैं तो हम आश्चर्य में होता है और ठगा-सा महसूस करते हैं। जिस दिन हिन्दी बोलने में हम गर्व महसूस करेंगे, सच में हिन्दी कहां से कहां पहुंच जाएगी।

इस बार हिन्दी दिवस पर दो दिन पहले ही भोपाल में संपन्न 10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन की चर्चा न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। काश यह आयोजन हिन्दी दिवस के दिन होता। क्या किया जाए, यही तो है हिन्दी की सच्चाई और रस्म निभाई, कैसे होगी हिन्दी की भलाई!

संविधान सभा ने भले ही 14 सितंबर, 1949 को एक मतेन यह निर्णय लिया कि हिन्दी राजभाषा होगी, लेकिन कड़वा सच यह कि यह कामकाज की भाषा आज तक न बन सकी। दुख तो इस बात का है कि हिन्दी भाषी क्षेत्र के जनप्रतिनिधि ही अंग्रेजी में हिन्दी की समृद्धि की बात करते हैं।

हिन्दी को आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि योग को 177 देशों का समर्थन मिला, लेकिन हिन्दी के लिए 129 देशों का समर्थन क्या नहीं जुटाया जा सकता?


सरहदों के पार जापान, मिस्र, अरब व रूस में हिन्दी को लेकर कुछ ज्यादा ही सक्रियता दिख रही है, जो बहुत ही सम्मान की बात है। मगर भारत में ऐसा क्यों नहीं? शायद इसका जवाब बहुत ही कठिन होगा।

अंग्रेजी बोलने में हमें गर्व होता है, हिन्दी बोलने में हीनता और जब तक इस भाव को हम पूरी तरह से नहीं निकाल देंगे, हिन्दी को सम्मान और सर्वमान्य भाषा के रूप में कैसे देख पाएंगे?

डॉ. मारिया नेज्येशी हंगरी में हिन्दी की प्रोफेसर हैं। मुंशी प्रेमचंद पर पीएचडी की है। वह असगर वजाहत के हिन्दी पढ़ाने के लहजे से प्रभावित हुईं और हिन्दी सीख गईं। जर्मनी में हिन्दी शिक्षक प्रो. हाइंस वरनाल वेस्लर हिन्दी को समृद्ध भाषा मानते हैं, जर्मनी की युवा पीढ़ी को भारतीय वेदों, ग्रंथों, चौपाइयों, दोहों इत्यादि के जरिये इसका विस्तृत परिचय देते हैं। उनका मानना है कि हिंदी के एक-एक शब्द का उच्चारण जुबान के लिए योग जैसा है।

वैज्ञानिक और सॉफ्टवेयर कंपनियों के कई मुखिया भी इस बात को बेहिचक मानते हैं कि डिजिटल भारत का सपना तभी पूरा हो पाएगा, जब हिंदी को सूचना और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनिवार्य किया जाएगा। एक आंकड़ा बताता है कि केंद्र और राज्य सरकारों की 9 हजार के लगभग वेबसाइट्स हैं जो पहले अंग्रेजी में खुलती हैं।

यही हाल हिंदी में कंप्यूटर टाइपिंग का है। चीन, रूस, जापान, फ्रांस सहित दूसरे देश कंप्यूटर पर अपनी भाषा में काम करते हैं, लेकिन भारत में हिंदी मुद्रण के ही कई फॉन्ट्स प्रचलित हैं। इनसे परेशानी यह कि अगर वही फॉन्ट दूसरे कंप्यूटर में नहीं हों तो खुलते नहीं हैं, विवशत: हिंदी मुद्रण के कई फॉन्ट्स कंप्यूटर पर सहेजने पड़ते हैं।

हिंदी समाचारपत्रों में रोमन शब्दों को लिखने का हिंदी चलन भी खूब हो चला है। इसकी वजह शब्दों की निश्चित सीमा या आसान मायने, कुछ भी हो सकते हैं, पर लगता नहीं कि यह भी हिंदी के साथ अन्याय है।

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रोमन लिपि के 26 अक्षरों की अंग्रेजी, देवनागरी लिपि के 52 अक्षरों पर भी अपना कब्जा जमाती दिखती है। शायद इसका कारण अपनी स्वयं की सर्वमान्य भाषा को लेकर बंटा होना और गंभीर नहीं होना है, जैसा दूसरे देशों में है। हम राज्य, भाषा और बोली को लेकर ही धड़ेबाजी करते हैं और अंग्रेजी को तरक्की का जरिया मानते हैं।

काश पूरे भारत में संपर्क और सरकारी कामकाज की अनिवार्य भाषा हिन्दी होती तो देश का मान और भी बढ़ता। समृद्ध हिन्दी के भी अच्छे दिन आएंगे, हिन्दी ही तो भारत में वह भाषा है, जो हर जगह, समझी और बोली जाती है। बस जरूरत है इसे देश में आपसी संपर्क भाषा के रूप में स्वीकारने की। हिन्दी के भी 'अच्छे दिन' आएंगे, जरूर आएंगे, बशर्ते बजाय औपचारिकता के, सकारात्मक और ईमानदार पहल की जाए।


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