भारत के फलते-फूलते गारमेंट उद्योग में बहुत गहरे हैं महिलाओं के यौन उत्पीड़न के 'घाव'

भारत के फलते-फूलते गारमेंट उद्योग में बहुत गहरे हैं महिलाओं के यौन उत्पीड़न के 'घाव'

खास बातें

  • एक अध्ययन के अनुसार, उद्योग में हर 14 में एक महिला शारीरिक हिंसा की शिकार
  • हर सात में से एक महिला बलात्कार या शारीरिक संबंध के लिए दबाव की शिकार
  • जो आवाज़ उठाती हैं, उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है
गुरुग्राम (गुड़गांव) / बेंगलुरू:

नविता और गीता से हमारी मुलाकात दिल्ली के दक्षिणी छोर पर कापसहेड़ा इलाके में एक कमरे में हुई... दोनों उन हज़ारों अन्य महिलाओं जैसी ही हैं, जो गैप, बनाना रिपब्लिक, एचएंडएम जैसे दुनिया के सबसे ज़्यादा मशहूर ब्रांडों को सप्लाई करने वाले देश में तेज़ी से फलते-फूलते गारमेंट उद्योग में काम कर जीवनयापन करने के इरादे से यहां पहुंची हैं...

महारानी एक्सपोर्ट्स नामक कंपनी में मिली पहली ही नौकरी में बहुत जल्द नविता को उन 'ज़हरीले' नियमों का पता चल गया, जिनके तहत इस तरह की कंपनियों में काम कराया जाता है...

नविता का कहना है कि उसके सुपरवाइज़रों ने उसे देखकर कहा, "यह माल खाने वाला है, छोड़ने वाला नहीं..." नविता ने बताया, "कंपनी में सुपरवाइज़रों के बीच इस बात को लेकर शर्त लगी थी कि उसे (नविता को) कौन 'हासिल' कर पाता है... उनमें से एक ने मुझे एक फोन देने की पेशकश की, और उससे संपर्क बनाए रखने के लिए कहा... उसने मुझे उसे कॉल करने के लिए कहा, क्योंकि वह मुझसे मिलना चाहता है... उसने कहा कि वह मुझे (उसके साथ बिताई) हर रात के लिए 5,000 रुपये देगा..."
 


...और नविता का दावा है कि जब उसने इसकी शिकायत की, उसे नौकरी से निकाल दिया गया...

दूसरी महिला गीता ने बताया, उसकी कंपनी में उसके सुपरवाइज़र ने उसे 'वेश्या' कहकर पुकारा, क्योंकि मैंने उसकी मेरे करीब आने की कोशिशों को ठुकरा दिया... उसने बताया कि वह लगातार सवाल कर परेशान करता रहता है कि 'जब उसका पति बूढ़ा है, तो वह उसे छोड़ क्यों नहीं देती...'

उधर, यहां से हज़ारों मील दक्षिण की तरफ गारमेंट उद्योग का एक अन्य बड़े केंद्र बेंगलुरू में भी मिलती-जुलती कहानियां सुनने को मिलती हैं...

टेक्सपोर्ट क्रिएशन्स में काम करने वाली रत्ना ने बताया कि कैसे उसके सुपरवाइज़र उस दिन उसकी पीठ ज़रूर 'थपथपाते' हैं, जिस दिन वह लो-कट ब्लाउज़ पहनती है...

हम इस प्रताड़ना के घातक रूप से भी परिचित हुए... देवकी डिज़ाइन्स के लिए काम करने वाली एक युवती सुष्मांता ने कथित रूप से इसलिए आत्महत्या कर ली थी, क्योंकि वह अपने एक सुपरवाइज़र द्वारा लगातार परेशान किए जाने से दुःखी हो गई थी...

सो, देश में फलते-फूलते और महिलाओं को बहुत बड़ी संख्या में रोज़गार देने वाले - लगभग 3 करोड़ 10 लाख महिलाओं को, जो उसकी कुल कार्यशक्ति का 70 फीसदी हिस्सा हैं - गारमेंट उद्योग का यह एक अंधेरा पहलू है...

इस उद्योग की ओर सरकार का भी खास ध्यान है... पिछले ही महीने केंद्र सरकार ने 6,000 करोड़ रुपये का पैकेज दिए जाने की भी घोषणा की थी, और अब स्मृति ईरानी की कपड़ा मंत्री के रूप में नियुक्ति भी साफ करती है कि भारत की आर्थिक वृद्धि में कपड़ा उद्योग के योगदान पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है...

लेकिन जिस तरह की घटनाएं हमारी जानकारी में आईं, उनसे साफ संकेत मिलते हैं कि इस उद्योग में काम करने वाली महिलाओं की संख्या भले ही ज़्यादा है, लेकिन वे एक ऐसे माहौल में काम करती हैं, जहां उन्हें यौन संबंध बनाने के लिए लगातार मजबूर किया जाता है... उन्हें यौन प्रताड़ना, और यहां तक कि बलात्कार का भी सामना करना पड़ता है, ताकि वे नौकरी पा सकें, या अपनी नौकरी बचाए रख सकें...
 


...और नविता, रत्ना और सुष्मांता ही चंद वे नाम नहीं हैं, जिन्होंने इसका सामना किया... इस उद्योग का लगभग एक-तिहाई हिस्सा निर्यात करने वाले कर्नाटक और गुड़गांव सेंटरों में हमने दर्जनों महिलाओं से बात की... लगभग सभी ने मिलते-जुलते अनुभव बयान किए... कुछ ने कैमरे के सामने आकर, लेकिन कुछ इतनी डरी हुई हैं कि बात को सार्वजनिक तक नहीं करना चाहतीं...

यूके स्थित एनजीओ 'सिस्टर्स ऑफ चेन्ज' द्वारा कर्नाटक के गारमेंट उद्योग को लेकर स्थानीय साझीदार 'मुन्नाडे' (Munnade) के साथ मिलकर किए एक अध्ययन में पाया गया कि हर 14 में से एक महिला गारमेंट उद्योग कर्मी को शारीरिक हिंसा का शिकार होना पड़ा है... पिछले महीने प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, हर सात में से एक महिला कर्मी को या बलात्कार का शिकार होना पड़ा है, या उन्हें यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया है...

यहां लगता है कि यौन हिंसा के खिलाफ बने नए कानून, जिनके तहत काम करने की हर जगह पर अंदरूनी शिकायत कमेटी होनी ही चाहिए, सिर्फ काग़ज़ पर ही रह गए हैं...

'महारानी' के लिए काम करने वाली शांति ने हमें बताया, "महारानी कंपनी में महिलाओं के लिए ऐसी कमेटी है, लेकिन वह नाममात्र के लिए है... कमेटी में भी महिलाओं को इतना ज़्यादा टॉर्चर किया गया, कि वे काम छोड़कर जाने के लिए मजबूर हो गईं..."

किसी भी ब्रांड या एक्सपोर्ट कंपनी ने हमारे सवालों का जवाब ख़बर लिखे जाने तक नहीं दिया है...

लेकिन गुड़गांव की गारमेंट एसोसिएशनों में से एक के प्रमुख गौतम नायर कहते हैं, "हम जिन अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के साथ काम करते हैं, वे हमारे काम और माहौल का ऑडिट करती हैं... और ये अंतरराष्ट्रीय ब्रांड काम के अनुकूल माहौल को लेकर काफी संवेदनशील होते हैं... काम के नियम भी मौजूदा कानूनों के हिसाब से होने चाहिए, जिनमें से कुछ तो भारतीय कानूनों से भी सख्त हैं... और काम की जगह पर यौन उत्पीड़न हमारे द्वारा किए जाने वाले ऑडिट का बेहद महत्वपूर्ण पहलू होता है..."

बहुत-सी महिलाओं ने हमें बताया कि जिस वक्त ये ब्रांड ऑडिट करने के लिए आते हैं, महिलाओं को सिखाया जाता है कि कैसे उन्हें ऑडिटरों के सामने साफ-सुथरे माहौल का भ्रम पैदा करना है...

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जिन्होंने भी हिम्मत जुटाकर आवाज़ उठाई, उन्हें बदतमीज़ी और बेइज़्ज़ती का सामना करना पड़ सकता है, या मुमकिन है, उनकी नौकरी ही अचानक खत्म कर दी जाए...

बेंगलुरू में अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश करते हुए गारमेंट उद्योग कर्मी मंजुला ने हमें बताया कि कैसे वह एक स्थानीय यूनियन का हिस्सा बन गई थी, और उसी की वजह से उसके मालिकों ने बार-बार परेशान किया, और आखिरकार वह काम छोड़ने के लिए मजबूर हो गई...