कोरोना से बचने के लिए लोगों का घरों में कैद होना वैध , लेकिन आपातकाल अवैध था: नायडू

'ये बंदी तो आज से 45 वर्ष पूर्व देश को तथाकथित आंतरिक विरोध से बचाने के नाम पर लगाई गई बंदी के मुकाबले कहीं अधिक वैध और औचित्यपूर्ण है.'

कोरोना से बचने के लिए लोगों का घरों में कैद होना वैध , लेकिन आपातकाल अवैध था: नायडू

'21 महीने लंबी उस गैर कानूनी बंदी के दौरान नागरिकों को जीवन के अधिकार सहित उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर दिया गया था.' (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:

उप राष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने बृहस्पतिवार को आपातकाल के 45 साल पूरे होने के मौके पर लॉकडाउन का हवाला देते हुए कहा कि खुद को कोरोना वायरस से बचाने के लिए लोगों का घरों में कैद होना वैध था, लेकिन 1975 में लगा आपातकाल अवैध था क्योंकि उस समय लोगों को उनके सभी मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया था. उन्होंने फेसबुक पोस्ट में कहा, ‘‘आज से ठीक तीन माह पूर्व हमने खुद ही स्वयं को कोरोना वायरस से बचाने के लिए घरों में कैद कर लिया था. अपने बचाव के लिए मास्क लगाने और सामाजिक दूरी रखने को तैयार हो गए. इस छोटी सी ही अवधि में ही हमें अनुभव हो गया कि बंदी क्या होती है.''

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नायडू ने कहा, ‘‘ ये बंदी तो आज से 45 वर्ष पूर्व देश को तथाकथित आंतरिक विरोध से बचाने के नाम पर लगाई गई बंदी के मुकाबले कहीं अधिक वैध और औचित्यपूर्ण है. 21 महीने लंबी उस गैर कानूनी बंदी के दौरान नागरिकों को जीवन के अधिकार सहित उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर दिया गया था. लाखों राजनेता, राजनैतिक कार्यकर्ता और नागरिकों को जेलों में भर दिया गया था. वह आपातकाल की काली अवधि थी.''

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उन्होंने कहा, ‘‘ वर्तमान में कोरोना महामारी ने वैध और स्वैच्छिक प्रतिबंधों के माध्यम से बंदी लगाई है, इसने बुनियादी स्वतंत्रता के महत्व को दोहराया है. निस्संदेह हम जल्द ही फिर से सामान्य जीवन जीयेंगे. आज जब हम वर्तमान बंदी से निपट रहे हैं, मैंने 1975 के आपातकाल के अनुभव को याद किया.''उप राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘संविधान द्वारा सुनिश्चित की गई स्वतंत्रता, जीवन की गरिमा की आधारशिला है. आइए हम जीवन की गरिमा की रक्षा करें.''