Jharkhand Election: नागरिकता कानून और NRC पर छिड़ी बहस के बीच झारखंड में BJP की हार के 5 कारण

Jharkhand Election Results : देश में छिड़ी नागरिकता कानून (CAA) और एनआरसी (NRC) पर बहस के बीच बीजेपी के लिए झारखंड (Jharkhand Election Results) के लिए अच्छी खबर नहीं है.

Jharkhand Election: नागरिकता कानून और NRC पर छिड़ी बहस के बीच झारखंड में BJP की हार के 5 कारण

खास बातें

  • कांग्रेस-JMM गठबंधन को 47 सीटें मिलती दिख रही
  • बहुमत के लिए चाहिए 41 सीटें
  • बीजेपी 25 सीटों के आसपास
नई दिल्ली:

Jharkhand Election Results: देश में छिड़ी नागरिकता कानून (CAA) और एनआरसी (NRC) पर बहस के बीच बीजेपी के लिए झारखंड (Jharkhand Election) के लिए अच्छी खबर नहीं है. राज्य में 5 सालों से सत्ता में काबिज बीजेपी की करारी हार हुई है. पार्टी सिर्फ 21 सीटों के आसपास सिमटती दिखाई दे रही है. वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) को अकेले 30 से ज्यादा सीटें मिल रही हैं. जबकि उसकी साथी कांग्रेस की सीटें इसमें जोड़ दें तो उसे 49 सीटें हो जाती हैं. हालांकि शुरुआती रुझानों में ऐसा लग रहा था कि झारखंड के नतीजे किसी के भी पक्ष में नहीं जाएंगे लेकिन बाद में कांग्रेस और जेएमएम ने बाद में अच्छी खासी बढ़त बना ली है. हालांकि अभी इस बात का विश्लेषण करना जल्दबाजी होगी कि क्या बीजेपी को नागरिकता कानून और एनआरसी जैसे मुद्दों का फायदा नहीं मिला. जहां तक बीजेपी की चुनावी रणनीति देखें तो पूरे चुनाव प्रचार में पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की रैलियां चर्चा में रही हैं जिनमें वह राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे और 'राष्ट्रवाद' की ही बात करते नजर आए. हालांकि बीजेपी के घोषणापत्र में स्थानीय मुद्दों पर जोर दिया गया था. 

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1- आर्थिक मंदी का असर
झारखंड के चुनाव में आर्थिक मंदी का काफ़ी असर दिखा. सबसे ज़्यादा प्रभाव यहां के औद्योगिक क्षेत्र जैसे जमशेदपुर , बोकारो , धनबाद के इलाक़ों में है. यहां जमशेदपुर के आदित्यपुर इलाके में इंडस्ट्रियल एरिया ये बंद पड़े कारख़ाने अब आम हैं. टेल्को के सहारे चलने वाले ऐसे करीब 1400 उद्योग हैं जो हर तरह के कल-पुर्जे बनाते हैं. पिछले दिनों टेल्को में ऐसे कई दिन आए, जब काम बंद रहा. इसकी सबसे बुरी मार यहां बंद पड़े कारख़ानों के मजदूरों पर पड़ी है. जाहिर इन मजदूरों की रोजी-रोटी पर असर पड़ा है और बदलने में उन्होंने बीजेपी का इसका नुकसान उठाना पड़ा है. 

2-सत्ता विरोधी लहर
झारखंड में हालांकि ऐसा पहला मौका था कि जब किसी मुख्यमंत्री ने पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा किया है और ऐसा पहली बार था कि किसी पार्टी को बहुमत मिला है. और इन पांच सालों में बीजेपी को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ा है. हालांकि इसमें बहुत बड़ा योगदान राज्य सरकार के कुशासन का भी है. इसका उदाहरण झारखंड में सरकारी नौकरियों की परीक्षा कराने वाली संस्था झारखंड लोक सेवा आयोग का भी हाल से देखा जा सकता है.  इस आयोग ने 17 अगस्त 2015 को जिस परीक्षा का विज्ञापन निकाला था वो 25 जनवरी 2019 तक पूरी नहीं हो पाई थी. अब इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पांच साल बीजेपी सरकार का शासन किस तरह रहा है.

3- टिकट बंटवारे में CM रघुबर दास की तानाशाही
झारखंड में सीएम रघुबरदास की तानाशाही से भी काफी नाराजगी थी. टिकट बंटवारे में भी इसका असर देखने को मिला है. इसका सबसे बड़ा नतीजा बीजेपी के वरिष्ठ नेता सरयू राय का टिकट कटना है. जबकि भ्रष्टाचार का आरोप झेल रहे प्रत्याशी भानु प्रताप शाही को टिकट दे दिया गया. ऐसा ही कई जगहों पर देखने को मिल रहा जहां पर बीजेपी को नुकसाना उठाना पड़ा.

4-जेएमएम और कांग्रेस का मजबूत गठबंधन
बीजेपी के खिलाफ जेएमएम और कांग्रेस का गठबंधन का मजबूत गठबंधन खड़ा हुआ. इसके विपरीत बीजेपी को इस चुनाव में अकेले चुनाव में जाना पड़ा. झारखंड में आजसू एक प्रभावी भूमिका निभाती रही है जो बीजेपी की सहयोगी थी लेकिन इस बार उसने भी बीजेपी से अलग चुनाव लड़ा और ऐसा देखा जा रहा है कि आजसू ने बीजेपी को कई जगहों पर नुकसान पहुंचाया है. 
 
5-बीजेपी के पास आदिवासी चेहरे का न होना
बीते झारखंड विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने किसी भी चेहरे को सीएम पद के लिए घोषित नहीं किया था. लेकिन झारखंड में आदिवासी वोट हमेशा से ही निर्णायक भूमिका में रहे हैं और बीजेपी ने चुनाव जीतने के बाद गैर आदिवासी चेहरे रघुबर दास को सीएम बना दिया. जबकि दूसरी ओर जेएमएम के हेमंत सोरेन जो कि आदिवासी समुदाय से आते हैं और उनके पिता शिबू सोरेन झारखंड के बड़े नेता हैं. 

 
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