जस्टिस एस. मुरलीधर ने अपने तबादले पर की स्थिति स्पष्ट, कहा- CJI की सूचना पर कोई आपत्ति नहीं

जस्टिस मुरलीधर (58) को गुरुवार को भव्य विदाई दी गई. उन्होंने कहा कि वह अपने तबादले पर भ्रम को स्पष्ट करना चाहते हैं और 26 फरवरी को सीजेआई से प्राप्त सूचना के बाद के घटनाक्रमों के बारे में उन्होंने जानकारी दी.

जस्टिस एस. मुरलीधर ने अपने तबादले पर की स्थिति स्पष्ट, कहा- CJI की सूचना पर कोई आपत्ति नहीं

न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर ने अपने तबादले से संबंधित विवाद पर स्थिति स्पष्ट की.

खास बातें

  • अपने तबादले से संबंधित विवाद पर स्थिति स्पष्ट की
  • CJI द्वारा दी गई सूचना पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है
  • न्यायमूर्ति मुरलीधर के तबादले की अधिसूचना के बाद विवाद पैदा हो गया था
नई दिल्ली:

न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर ने गुरुवार को दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीशों और वकीलों को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में अपने तबादले से संबंधित विवाद पर स्थिति स्पष्ट की. उन्होंने कहा कि प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे द्वारा दी गई सूचना पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. केंद्र सरकार द्वारा 26 फरवरी की रात को न्यायमूर्ति मुरलीधर के तबादले की अधिसूचना के बाद विवाद पैदा हो गया था. उसी दिन उनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने कथित तौर पर नफरत भरे भाषण देने के लिए भाजपा के तीन नेताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने में विफल रहने के लिए दिल्ली पुलिस की खिंचाई की थी. न्यायमूर्ति मुरलीधर (58) को गुरुवार को भव्य विदाई दी गई. इस दौरान बड़ी संख्या में न्यायाधीश और वकीलों सहित अन्य लोग मौजूद थे.

उन्होंने कहा कि वह अपने तबादले पर भ्रम को स्पष्ट करना चाहते हैं और 26 फरवरी को सीजेआई से प्राप्त सूचना के बाद के घटनाक्रमों के बारे में उन्होंने जानकारी दी. सीजेआई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने 12 फरवरी की बैठक में न्यायमूर्ति मुरलीधर के पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में तबादले की अनुशंसा की थी. न्यायमूर्ति मुरलीधर दिल्ली हाईकोर्ट में वरीयता के आधार पर तीसरे स्थान पर हैं. स्थानांतरण प्रक्रिया के बारे में उन्होंने कहा कि पांच सदस्यीय कॉलेजियम केंद्र सरकार को अनुशंसा भेजता है कि किसी हाईकोर्ट के न्यायाधीश को दूसरे हाईकोर्ट में भेजा जाए.

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उन्होंने कहा, ‘मेरे मामले में कॉलेजियम के निर्णय से सीजेआई ने मुझे 17 फरवरी को एक पत्र के माध्यम से अवगत कराया. मैंने पत्र प्राप्ति की सूचना दी, फिर मुझसे पूछा गया कि आप क्या चाहते हैं. मैंने कहा कि अगर मेरा तबादला दिल्ली हाईकोर्ट से होता है तो मुझे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट जाने में कोई दिक्कत नहीं है.' उन्होंने कहा, ‘मैंने सीजेआई को स्पष्ट किया कि मुझे प्रस्ताव पर आपत्ति नहीं है. मेरे तबादले का स्पष्टीकरण प्रेस में पहुंचा. 20 फरवरी को ‘हाईकोर्ट के कॉलेजियम के सूत्रों के हवाले से' जो खबर चली उसकी पुष्टि मुझे कुछ दिनों पहले कर दी गई थी.' 

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सीजेआई का 14 फरवरी का पत्र न्यायमूर्ति मुरलीधर को 17 फरवरी को मिला. उन्होंने कहा कि 26 फरवरी उनके जीवन का दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में संभवत: सबसे लंबा कार्य दिवस था जब उन्होंने 14 घंटे पीठ में बिताए थे. न्यायमूर्ति मुरलीधर ने यह कहते हुए भाषण समाप्त किया कि 26 फरवरी की मध्य रात्रि को जारी अधिसूचना में दो चीजें हुईं. उन्होंने कहा, ‘पहला, मेरा तबादला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में हो गया. दूसरा इसमें मुझे उस पद पर नियुक्ति मिली जहां से मेरा कभी तबादला नहीं होगा या मुझे नहीं हटाया जाएगा और वहां रहकर मुझे गर्व होगा. देश के सबसे बेहतर हाईकोर्ट का ‘पूर्व न्यायाधीश.' दिल्ली उच्च न्यायालय.'

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विदाई समारोह में न्यायमूर्ति मुरलीधर की मां, पत्नी उषा रामनाथन, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ए पी शाह, वरिष्ठ वकील शांति भूषण और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व वीसी उपेन्द्र बख्शी मौजूद रहे. न्यायमूर्ति मुरलीधर को विदाई देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी एन पटेल ने कहा कि वह दुखी हैं और उनकी गैर मौजूदगी हमेशा महसूस होगी. दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा ने न्यायमूर्ति मुरलीधर को ‘काफी विद्वान, साहसी, नैतिकता वाला एवं ईमानदार न्यायाधीश' बताया. 

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बता दें, न्यायमूर्ति मुरलीधर ने 2018 में निचली अदालत द्वारा ट्रांजिट रिमांड को निरस्त कर कार्यकर्ता गौतम नवलखा की कोरेगांव भीमा हिंसा मामले में नजरबंदी से रिहा करने के आदेश दिए थे, जिसके बाद विवाद पैदा हो गया था. उनकी अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अक्टूबर 2018 में हाशिमपुरा नरसंहार मामले में उत्तर प्रदेश के 16 पूर्व पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया था. वह उस पीठ की अध्यक्षता कर रहे थे जिसने उसी वर्ष कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई और 1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में उन्हें जेल भेजा. उन्होंने सितम्बर 1984 में चेन्नई में कानून की प्रैक्टिस शुरू की थी और वह हाईकोर्ट तथा दिल्ली हाईकोर्ट 1987 में आए.



(हेडलाइन के अलावा, इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है, यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
 
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