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केदारनाथ त्रासदी : तबाही की आंखों देखी कहानी, हृदयेश जोशी की जुबानी

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केदारनाथ त्रासदी :  तबाही की आंखों देखी कहानी, हृदयेश जोशी की जुबानी
नई दिल्ली:

दो साल पहले केदारनाथ समेत उत्तराखंड में आई आपदा हिमालय के इतिहास में सबसे भयानक त्रासदी थी। उस वक्त एनडीटीवी की टीम सबसे पहले केदारनाथ पहुंची, जिसके प्रमुख सदस्य थे एनडीटीवी इंडिया के सीनियर एडिटर हृदयेश जोशी। एनडीटीवी की टीम अगले डेढ़ महीने तक केदारनाथ और उत्तराखंड के तमाम इलाकों से रिपोर्टिंग करती रही। उस आपदा के बाद हृदयेश जोशी ने केदारनाथ में आई इस आपदा के पल पल का वर्णन लिखा, जिसके लिए उन्होंने बहुत सारे चश्मदीदों से बात की। केदारनाथ आपदा के दो साल होने पर पेश है उस खौफनाक मंज़र के पल-पल का रोंगटे खड़े करने वाला ब्यौरा।

केदारनाथ में आई प्राकृतिक आपदा के बाद तुरंत किसी को भी समझ नहीं आया कि आखिर इतना बड़ा संकट किस वजह से आ गया। कयास तो बहुत लगाए गए, लेकिन पुख़्ता वजह किसी को पता नहीं थी। मैं घटना के कई हफ्तों बाद तक कई लोगों से इस बारे में बात करते रहा। आपदा के वक्त केदारनाथ में मौजूद रहे चश्मदीदों के अलावा देश के जाने माने इतिहासकार, वैज्ञानिक, भूगर्भशास्त्री और आपदा विशेषज्ञ सबके साथ मैंने बात की। आज हमारे पास कुछ तर्कपूर्ण विश्लेषण हैं, जो ये बताते हैं कि उस दिन कैसे ये सब हो गया, लेकिन बारीकियों में जाएं तो अब भी वैज्ञानिक और भूगर्भशास्त्री किसी एक नतीजे पर नहीं पहुंचे पाए हैं। जो भी विश्लेषण उपलब्ध हैं, उसे समझने के लिए उस दिन केदारनाथ में मची तबाही में क्या-क्या हुआ इसे क्रमवार जानना भी ज़रूरी है। केदारनाथ ही नहीं नदी के बहाव के साथ आगे बढ़ते हुए रामबाड़ा, गौरीकुंड, सोनप्रयाग, चंद्रापुरी, अगस्त्यमुनि और श्रीनगर जैसे इलाकों में भी कुदरत ने जमकर तबाही मचाई। इस पूरे इलाके में बरबादी तो केदारनाथ में आई बाढ़ से पहले ही शुरू हो गई थी। उत्तराखंड में कई जगह बड़े बड़े भूस्खलन हुए, रास्ते कट गए और पुल टूट गए। ये तबाही किसी एक दिन आई बाढ़ से नहीं हुई बल्कि दो तीन दिन तक अलग-अलग जगह पूरे राज्य में तांडव होता रहा। केदारनाथ में हुई बरबादी तकरीबन 24 घंटे की टाइमलाइन पर बिखरी हुई है।
 
रविवार, 16 जून - केदारनाथ में मौजूद हर शख्स सुबह से ही डरा हुआ था। बरसात पिछले 3 दिन से रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। इस इलाके में कई सालों से रह रहे लोगों ने भी आसमान से इतना पानी एक साथ बरसते कभी नहीं देखा था। लगातार हो रही बरसात का असर अब दिखने लगा था। 16 तारीख की सुबह भैंरोनाथ के मंदिर वाली पहाड़ी टूटने लगी। वहां से भूस्खलन शुरू हो गया और केदारनाथ से भैंरो मंदिर जाने वाला मार्ग बंद हो गया।

 
केदारनाथ में पिछले कुछ दिनों से एक धरना और हड़ताल चल रही थी। ये हड़ताल यहां कुछ प्राइवेट कंपनियों की ओर से दी जाने वाली हेलीकॉप्टर सेवा के विरोध में थी। ये हेलीकॉप्टर सेवा उन लोगों के लिए थी जो गौरीकुंड से केदारनाथ तक का रास्ता पैदल या घोड़ों और पालकियों की मदद से तय करना नहीं चाहते। घोड़े वालों का कहना था कि हेलीकॉप्टर सेवा चलने से उनका नुकसान हो रहा है। कुछ स्थानीय नेताओं ने इस हड़ताल में पर्यावरण का मुद्दा भी जोड़ दिया और ये शिकायत की कि हेलीकॉप्टरों से घाटी में शोर बढ़ रहा है और इससे यहां के संवेदनशील इलाके में वन्य जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
 
16 जून को जब पहली बार केदारनाथ में बाढ़ आई तो सबसे पहले ये हेलीपैड ही खत्म हुआ, जिस पर धरना चल रहा था। पूरा का पूरा हेलीपैड धंस गया और नदी उसे मिनटों में बहा ले गई। इस समय केदारनाथ के आसपास के इलाके में सारी नदियां उफान पर थीं। वासुकी ताल से आने वाली दूध गंगा और मधु गंगा अपने सामान्य स्तर से कई फुट ऊपर बह रहीं थीं। यही हाल मंदाकिनी और दूसरी नदियों का भी था। दोपहर होते-होते इन नदियों का पानी केदारनाथ को देश के बाकी हिस्से से जोड़ने वाले दो पुलों के ऊपर से बहने लगा। हालात बद से बदतर होते जा रहे थे।
 
35 साल का रघुबीर सिंह बिष्ट उस दिन केदारनाथ में ही था। श्रीनगर का रहने वाला ये नौजवान यात्रा सीज़न के वक्त हर साल ज़िला पंचायत की ओर से लीज़ पर दिया गया गेस्ट हाउस चलाता और ये उसके व्यापार का बड़ा हिस्सा था। रघुबीर ने उस दिन तबाही के कुछ वीडियो अपने मोबाइल में रिकॉर्ड किए. (रघुबीर ने 16 और 17 जून के वीडियो यू ट्यूब में पोस्ट किए जिन्हें अमेरिकी ज़ियोलॉजिकल यूनियन समेत कई वेबसाइट्स ने इस्तेमाल किया है.)  बाद में रघुबीर ने सोशियल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक पर उस दिन का आंखों देखा हाल भी लिखा। जब मैंने रघुबीर से श्रीनगर में मुलाकात की तो उसने बताया कि केदारनाथ में जो कुछ उसने देखा और झेला उसे याद करने के बाद इस बात का भरोसा ही नहीं होता कि वो ज़िंदा है, लेकिन उस दिन उसने अपने होशोहवाश पर काबू रखा और ना केवल अपनी बल्कि कई दूसरे लोगों की जान बचाई।

उस दिन मूसलाधार बारिश हो रही थी और लोग अपने अपने होटलों और गेस्ट हाउसों के अंदर ही रुके रहे। बाहर निकलना बिल्कुल नामुमकिन था। केदारनाथ में पहली बार ज़बरदस्त बाढ़ 16 तारीख की शाम को आई। शाम को मंदिर में होने वाली आरती से ठीक पहले ये रविवार का दिन था। बाढ़ अपने साथ बहुत सारा कीचड़ और बालू लेकर आई और मंदिर के पास बना हेलीपैड बह गया। ये शाम 6.50 की बात है। ये इतनी ज़बरदस्त बाढ़ थी कि जहां से पानी गुजरा वहां कुछ बचा ही नहीं। मैंने पानी के कम होने पर बस 3 लोगों को और कुछ जानवरों को बाहर निकलते देखा।
 
बरसात बिल्कुल नहीं रुक रही थी। लोग होटल के कमरों में इकट्टा होते रहे। ये सब कुछ देखने के बाद वो बाहर रहना नहीं चाहते थे। सारी दुकानें बंद हो चुकी थीं। रघुबीर का गेस्ट हाउस भी स्थानीय लोगों और तीर्थयात्रियों से खचाखच भर चुका था। रघुबीर और ये तीर्थयात्री खुशकिस्मत थे कि वो सब मंदिर के बाईं ओर मंदाकिनी नदी के पार (नदी के बहाव के दाईं ओर)  मौजूद थे। यहां पानी की मारक क्षमता उतनी नहीं थी, जितनी मंदिर की तरफ, रघुबीर के मुझे बताया -

गेस्टहाउस में सारे कमरे खचाखच भर चुके थे। कहीं कोई जगह बची नहीं थी। जहां तक मुझे याद है हर कमरे में 30 से 35 लोग भरे होंगे।  तभी एक बहुत ज़ोर की आवाज़ आई मंदिर की ओर से। हमें कुछ समझ में नहीं आया कि ये हुआ क्या। तब मैंने मंदिर के पास मौजूद अपने एक दोस्त को फोन लगाया और उससे पूछा कि आखिर हुआ क्या है। उसने कहा कि केदारनाथ में नदी के ऊपर बने दो पुल बह गए हैं। यानी हमारा मंदिर के साथ ज़मीनी संपर्क कट गया था। शंकरचार्य की 8वीं शताब्दी में बनी समाधि भी खत्म हो गई। इसके अलावा शंकराचार्य की दो प्रतिमाएं, एक स्फटिक लिंग और एक हनुमान की मूर्ति भी बह चुकी थी। इस सारे ढ़ांचों के अवशेष इक्का दुक्का जगह बचे थे। कई सारे आश्रमों का भी कुछ पता नहीं था।
 
तो यही थी रविवार शाम 16 जून को हुई वो तबाही, जिसका ज़िक्र मंदिर के पुजारी रवीन्द्र भट्ट ने हमसे तिलवाड़ा में किया था। केदारनाथ मंदिर परिसर मिनटों में पानी से लबालब भर गया था और बीसियों लोग इसमें डूब गए।
 
अंधेरा हो चुका था। पूरे इलाके में बत्ती गुल हो गई थी। बिजली के लिए लगा पावर हाउस फेल हो गया था। कुछ स्थानीय लोगों ने जेनरेटर ऑन किए, लेकिन बुरी तरह से डरे लोगों में भरोसा पैदा करने के लिए ये रोशनी काफी नहीं थी। बहुत सारे लोग तो डर कर पहले ही जंगल की ओर भाग गए थे और बहुत से और लोग भी यहां से जाना चाहते थे, लेकिन अंधेरे में चलना सभी तीर्थयात्रियों के लिए संभव नहीं था। उनमें से कई कमज़ोर थे, कई बुज़ुर्ग थे और कई लोगों के पास छोटे-छोटे बच्चे थे। ये सारे लोग कैसे जंगल के रास्ते निकलते खासतौर से तब जब उन्हें इस इलाके का अता पता ना हो और पहाड़ टूटकर गिर रहा हो। अब बहुतों ने पूजा पाठ करना और मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया, कुछ लोगों ने भगवान शिव की अर्चना की और कुछ ऐसे भी थे जो ये कहकर मन को समझा रहे थे कि अगर मर गए तो ये मौत केदारनाथ के दरवाज़े पर होगी और मोक्ष मिलेगा।
 
22 साल के आशीष सजवाण से मेरी मुलाकात गुप्तकाशी में हुई। आशीष भी आपदा वाले दिन केदारनाथ में ही था। मैं उससे 22 जून को मिला। तब मैं भी केदारनाथ से लौटकर आया था और वहां बरबादी के मंजर को अपनी आंखों से देखा था। आशीष ने मुझे बताया–


सर जी मैं आपको क्या बताऊं, केदारनाथ में उस दिन सबकुछ अस्तव्यस्त था। वहां हमारा एक होटल और एक दुकान थी। मैं और मेरे होटल स्टाफ के 18 लोग केदारनाथ में थे। मौसम इतना खराब हो गया था कि हर कोई वहां से निकलना चाहता था लेकिन 16 तारीख की शाम को जैसे आसमान ही टूट पड़ा। नदी के ऊपर बने दोनों पुल बह गए। मंदिर के पास पानी क्या आया बस उसने मुसीबत का पिटारा खोल दिया। अपने साथ इतना कीचड़ और बड़े बड़े पत्थर लेकर आया कि कम से कम 50-60 लोग बह गए होंगे। बस वही लोग बच पाए जिन्होंने किसी चीज़ को थाम लिया। पानी हर ओर फैल गया था। बाद में हमने मंदिर से लाउड स्पीकर पर ऐलान सुना, जिसमें लोगों से मंदिर के पास आने के लिए कहा गया, क्योंकि लग रहा था कि केदारनाथ मंदिर को छोड़कर बाकी सब कुछ बह जाएगा।


भारत सेवा आश्रम, बिड़ला आश्रम और शंकराचार्य समाधि 16 तारीख को हुई तबाही में खत्म हो गए थे। इस बाढ़ के बाद कुछ देर तक शांति बनी रही। बड़ी संख्या में लोग मंदिर के अंदर शरण लिए हुए थे और इसी तरह कई लोग यहां बने उन होटल, लॉज और गेस्ट हाउसों में छुपे थे, जो अब तक तबाह नहीं हुए थे। कुछ देर बाद बहुत सारे वो लोग जो बाढ़ के डर से पहाड़ी की ओर भागे थे वो भी वापस आ गए। बिना किसी लोकल गाइड की मदद के रात में रास्ता ढूंढना या खुले में रहना इन लोगों के  लिए नामुमकिन रहा होगा।
 
इस वक्त रघुबीर सिंह घबराए लोगों को शांत करने की कोशिश कर रहा था। मन में रघुबीर भी डरा हुआ था, लेकिन उसने अपना यह डर बाहर से केदारनाथ आए तीर्थयात्रियों को ज़ाहिर नहीं कि वरना व्याकुलता और बढ़ जाती।

मैंने अपने भाई और मां को फोन लगाया और उन्हें केदारनाथ में हो रही तबाही के बारे में बताया। मुझे लगा कि ये मेरी ज़िंदगी की आखिरी फोन कॉल है और मैं उनसे कभी मिल नहीं पाऊंगा। वह रात काफी लंबी थी। हर कोई मौत के डर को महसूस कर रहा था और हर किसी को बस सुबह होने का ही इंतज़ार था। जो लोग जंगल की ओर भागे थे उनमें से आधे से अधिक 2-3 घंटों में वापस आ गए। वो डरे हुए थे, उनके कपड़े भीगे थे और वो ठंड से कांप रहे थे। अपना ध्यान बंटाने के लिए मैंने चाय बनाने की कोशिश की, लेकिन डर था कि जाने का नाम नहीं ले रहा था। हम सबने चाय पी और बिस्कुट खाए और उसके बाद हम कमरों में भेड़-बकरियों की तरह सिमट कर बैठ गए। हम सबके चेहरों पर ऐसा खौफ था जैसे कि अगले दिन हमारी बलि दी जानी हो। लोग बस यही बात कर रहे थे कि सुबह कब होगी। कोई बता रहा था कि सुबह 4 बजे उजाला होता है तो कह रहा था कि उजाला होते होते 4.30 बज जाएंगे। ज़्यादातर लोगों ने पूरी रात बिना पलक झपकाए काटी और जब पौ फटी तो सबके चेहरों पर खुशी थी। सबको लग रहा था कि बुरा वक्त निकल गया, लेकिन किसी को पता नहीं था कि मौत फिर से आने वाली है।
 
17 जून 2013 - सुबह होते ही लोगों में भरोसा जगा कि जान बच गई और कुछ लोग बाहर मंदिर के पिछले इलाके में ये पता लगाने गए कि आखिर तबाही कितनी हुई है। लोगों को वहां कई शव बिखरे दिखाई दिए। केदारनाथ में होटल चलाने वाले स्थानीय कांग्रेसी नेता श्रीनिवास पोस्ती ने – जो उस दिन केदारनाथ में ही था - बाद में मुझे फोन पर बताया -

16 तारीख की शाम तबाही मचाने वाली थी। केदारनाथ मंदिर के पीछे सारी इमारतें खत्म हो गईं थी। 17 तारीख की सुबह मैं ये पता लगाने के लिए मंदिर के पीछे गया कि बीती शाम कितनी बरबादी हुई। मैंने वहां कई लाशें पड़ी देखी और मैं हक्का बक्का रह गया। कुछ शव ज़मीन की सतह पर थे और कुछ मलबे में आधे दबे थे। मैंने कम से कम 10 शव देखे और ज्यादातर के शरीर पर कपड़े नहीं थे।

 
हर कोई इस जगह से तुरंत निकलना चाहता था। पिछली रात एक कालरात्रि की तरह बीती थी। सुबह के उजाले में लोगों को लगता था कि अब तुरंत कुछ नहीं होगा और वो जल्द ही केदारनाथ के इलाके से सुरक्षित निकल जाएंगे, लेकिन सबसे बुरी चोट तो अभी होनी थी। सुबह 7 बजे से कुछ मिनट पहले एक ज़ोर की आवाज़ सुनाई दी जैसे पहाड़ टूट पड़ा हो और फिर केदारनाथ में तेज़ी से पानी भरने लगा और पानी का स्तर बढ़ता ही गया। रघुबीर ने मुझे बताया -

16 तारीख की कालरात्रि तो गुजर गई, लेकिन अगली सुबह और भी भयानक साबित हुई। मैंने एक के बाद एक इमारतों को पानी में डूबते देखा। मेरे एक दोस्त का होटल मेरे सामने नदी में बह गया। मोबाइल नेटवर्क अब भी काम कर रहे थे। दोस्त का होटल बहते देख मैंने घबरा कर उसे फोन लगाया। उसने मुझे कहा कि वह और उसका पूरा स्टाफ सुरक्षित है क्योंकि खतरे को भांप कर वो लोग पहले ही वहां से से निकल गए थे।
 
ये सारी विनाशलीला सुबह 6.55 पर शुरू हुई। एक बड़ा सैलाब मंदिर के पीछे से आया। लगा कि मंदाकिनी सब कुछ निगल रही है। मलबे के साथ चट्टाननुमा पत्थर लुढ़क कर आने लगे। लोगों ने फिर से इधर-उधर भागना शुरू कर दिया। पानी कई लोगों को बहा ले गया और कई लोगों को बड़े-बड़े भीमकाय पत्थरों ने कुचल दिया। केदारनाथ में मंदिर को छोड़कर सब कुछ तहस नहस हो गया। अपने गेस्ट हाउस की छत पर खड़ा मैं ये सब देख रहा था। कुछ लोगों ने फिर से भैंरो मंदिर की ओर भागने कोशिश की लेकिन सरस्वती की धारा उफान में थी और कई लोगों को बहा ले गई। लगता था कि मौत निश्चित है।
 
रघुबीर के अल्फाज़ों में ‘भगवान शिव का तांडव’ 15-20 मिनट से अधिक नहीं चला होगा। बाद में बहुत से चश्मदीदों ने भी यही कहा कि विनाश लीला 20 मिनट से अधिक नहीं चली, लेकिन वो 20 मिनट भी वहां फंसे लोगों को कई घंटों जैसे महसूस हुए होंगे। पानी अपने साथ विशालकाय पत्थर लेकर आया। भूगर्भशास्त्रियों की भाषा में बड़े पत्थरों को बोल्डर और बहुत बड़े पत्थरों को ब्लॉक कहा जाता है। इस परिभाषा के मुताबिक, आधे से अधिक पत्थरों का आकार तो ब्लॉक की श्रेणी में ही था यानी बहुत बड़े भीमकाय पत्थर.।


जब सिद्धार्थ और मैंने केदारनाथ का दौरा किया तो साफ पता लग रहा था कि पानी के साथ आए इन्हीं पत्थरों ने सबसे अधिक नुकसान किया। इन पत्थरों की चोट से जैसे सब कुछ नेस्तनाबूद हो गया था।  मंदिर के सामने खड़ा प्लेटफॉर्म जो ज़मीन की सतह से कई फुट ऊंचा होता था अभी बालू और मलबे के भर जाने से एक ही स्तर पर आ गया था। हमें कई शव यहीं पर चारों ओर बिखरे दिखे. यहां पर बारिश और बाढ़ के बाद अब करारी धूप पड़ रही थी और ऐसे में इनमें से कई शव तो सड़ने भी लगे थे। मंदिर के मुख्य प्रवेश स्थान और नंदी की मूर्ति के बीचों बीच मैंने कम से कम 6 लाशों का ढेर देखा, जिसमें महिला औऱ बच्चे भी थे।
 
इत्तिफाक से उखीमठ के एसडीएम राकेश तिवारी और सीओ (पुलिस) आरपी ढिमरी उस दिन केदारनाथ में ही थे। ये लोग घोड़े-खच्चर वालों की हड़ताल को खत्म कराने और इस विवाद में बीच बचाव कराने आए थे। इस तबाही में किसी तरह ये दोनों लोग बच गए। एसडीएम तिवारी तो शिव के वाहन नंदी की मूर्ति पर चढ़ गए और उन्होंने उछलकर मुख्य द्वार पर टंगी विशाल घंटी पकड़ ली। जब तक पानी का स्तर कम नहीं हो गया तिवारी घंटी पकड़ कर लटके रहे।
 
17 जून की सुबह मंदिर के पीछे तबाही देखने गए श्रीनिवास पोस्ती ने जब अचानक बाढ़ आते देखी तो जान बचाने के लिए पास ही एक बिल्डिंग की ओर दौड़ लगा दी भी। खुशकिस्मती से पानी उस दिशा में बहुत तेज़ी से नहीं आया जिधर पोस्ती ने दौड़ लगाई थी। पोस्ती ने किसी तरह एक घर पर चढ़कर जो देखा वो इस तरह है।
 
मैंने जो आंखों के सामने देखा उस पर आज मैं यकीन नहीं कर सकता। केदारनाथ मंदिर के आसपास का सारा इलाका काले पानी से भर गया था। मैं एक इमारत की दूसरी मंजिल पर चढ़ गया था। नीचे देखा कि पानी में बह रहा हर कोई आदमी कुछ न कुछ पकड़ कर बचने की कोशिश कर रहा था।  बहुत सारे लोग तो पानी में डूब गए... बचे वही जो मंदिर की ओर तैर पाए क्योंकि वहां उनको सहारा लेने के लिए कुछ ना कुछ मिल रहा था। 1 घंटे बाद जब मैं नीच उतर कर बाज़ार की ओर गया तो हर ओर लाशों का ढेर पड़ा था। कई लोगों के शरीर से कपड़े निकल चुके थे।  कुछ लोग पानी के बहाव में बहे तो कुछ अपने बूढ़े मां-बाप या बच्चों को बचाने की कोशिश में मर गए।

 
केदार होटल का आशीष सजवाण अब तक एक 4 मंज़िला बिल्डिंग की छत पर चढ़ चुका था और वहां से सब कुछ देख रहा था।
 
जब तक पूरे इलाके में पानी भरता उससे पहले ही मैं अपने होटल से भाग चुका था। मेरे स्टाफ का एक आदमी तो अपनी जान बचाने के लिए भैरोनाथ मंदिर की पहाड़ी की ओर भाग गया। स्टाफ के बाकी लोग मेरे साथ आए और हम सब एक चार मंज़िला इमारत में चढ़े। खुश किस्मती से इस बिल्डिंग के आगे एक बहुत बड़ा पत्थर रुका हुआ था, जिसने पानी के तेज़ बहाव को कुंद कर दिया था। इस वजह से ये इमारत को नहीं गिरी और हमारी जान बच गई, लेकिन छत से जो हमने देखा वो बहुत डराने वाले था। केदारनाथ का मंदिर किसी टापू की तरह लग रहा था और उसके चारों ओर करीब 15 मीटर गहरा पानी भरा हुआ था।

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हम सब एक-दूसरे की ओर देखते तो सबके मन में एक ही खयाल था। मौत से क्या हम बचा पाएंगे। हमें ये भरोसा नहीं हो रहा था कि हम लोग ज़िंदा हैं। तभी हमने देखा कि पानी के बहाव के साथ एक लड़का बहते हुए आया। वो पानी में हाथ पांव मार कर बचने की कोशिश कर रहा था। शायद उसे तैरना आता था इसलिए पानी के प्रचंड बहाव में डूबा नहीं। हमने बिल्डिंग के निचले माले पर जाकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसे खींचकर ऊपर ले आए। वो लड़का मुश्किल से 12-13 साल का रहा होगा। उसके मां-बाप उससे बिछड़ गए थे। उस वक्त तो पता नहीं चला कि उसके माता-पिता बचे हैं या नहीं, लेकिन पानी कम होने के बाद जब लोगों ने अपनों को ढूंढना शुरू किया तो इस लड़के के मां-बाप इसे मिल गए। पूरा परिवार सुरक्षित था। ये केदारनाथ त्रासदी में उन चुनिंदा लोगों में रहे होंगे, जो उस दिन यहां मौजूद थे और पूरे परिवार में किसी की जान नहीं गई।
 
हम पानी के कम होने का इंतज़ार करते रहे, लेकिन जब पानी कम हुआ तो एक बहुत ही वीभत्स नज़ारा हमारे सामने था। बहुत ही डराने वाला और मन को खराब करने वाला दृश्य। हमने देखा कि केदारनाथ के चारों ओर लाशें ही लाशें थीं। कुछ शव तो सतह पर थे, लेकिन अधिकतर शव चारों ओर फैले मलबे में दबे हुए थे। एक अजीब से बात हमने देखी कि ज़्यादातर लोगों के शरीर पर कपड़े नहीं थे।
 
हम बहुत डर गए थे और तुरंत यहां से निकलना चाहते थे। पानी कम होते ही हम लोग छत से नीचे कूद गए, लेकिन तब पता चला कि कितना मलबा केदारनाथ में भर चुका है। हममें से अधिकतर लोग कमर और पसलियों तक (करीब 5 फुट) कीचड़ और गाद में धंस गए।

 
केदारनाथ में चारों ओर पागलपन वाला नज़ारा था। हर ओर लोग चीख चिल्ला रहे थे और अपनों को ढूंढ रहे थे। हमने आने वालों दिनों में ऐसी कई कहानियां अपने कैमरे में कैद की जहां अपनों की तलाश कई दिनों, हफ्तों और महीनों तक चलती रही।

(केदारनाथ में आई आपदा का यह वर्णन हृदयेश जोशी की किताब “तुम चुप क्यों रहे केदार” से लिया गया है)



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