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केजरीवाल सरकार Vs एलजी : दिल्ली पर किसका 'राज', सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला आज

दिल्ली सरकार बनाम उप राज्यपाल (LG) मामले में अधिकारों को लेकर बड़ा फैसला सुनाएगा सुप्रीम कोर्ट

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केजरीवाल सरकार Vs एलजी : दिल्ली पर किसका 'राज', सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला आज

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और उप राज्यपाल अनिल बैजल (फाइल फोटो).

खास बातें

  1. एक नवंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था
  2. एलजी के पास दिल्ली में सेवाओं को विनियमित करने की शक्ति
  3. संविधान पीठ ने 4 जुलाई को शासन के लिए मापदंड निर्धारित किए थे
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट दिल्ली सरकार बनाम उप राज्यपाल (LG) मामले में अधिकारों को लेकर गुरुवार को  बड़ा फैसला सुनाएगा. जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की बेंच फैसला सुनाएगी. दस याचिकाओं पर फैसला आएगा.

सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि सेवाओं, अफसरों के ट्रांसफर- पोस्टिंग और एंटी करप्शन ब्यूरो, जांच कमीशन के गठन पर किसका अधिकार? एक नवंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार और केंद्र की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था.

सुनवाई के दौरान केंद्र ने शीर्ष अदालत को बताया था कि उप राज्यपाल (एलजी) के पास दिल्ली में सेवाओं को विनियमित करने की शक्ति है. राष्ट्रपति ने अपनी शक्तियों को दिल्ली के प्रशासक को सौंप दिया है और सेवाओं को उसके माध्यम से प्रशासित किया जा सकता है. केंद्र ने यह भी कहा कि जब तक भारत के राष्ट्रपति स्पष्ट रूप से निर्देश नहीं देते तब तक एलजी, जो दिल्ली के प्रशासक हैं, मुख्यमंत्री या मंत्रिपरिषद से परामर्श नहीं कर सकते.

एलजी को दिल्ली में सेवाओं को नियंत्रित करने की शक्ति : केंद्र


पांच जजों  की संविधान पीठ ने 4 जुलाई को राष्ट्रीय राजधानी के शासन के लिए व्यापक मापदंडों को निर्धारित किया था. ऐतिहासिक फैसले में इसने सर्वसम्मति से कहा था कि दिल्ली को एक राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता लेकिन उप राज्यपाल (एलजी) की शक्तियों को यह कहते हुए अलग कर दिया गया कि उसके पास "स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति" नहीं है और उन्हें चुनी हुई सरकार की सहायता और सलाह पर कार्य करना है.

19 सितंबर को केंद्र ने शीर्ष अदालत से कहा था कि दिल्ली के प्रशासन को दिल्ली सरकार के पास अकेला नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि देश की राजधानी होने के नाते इसकी "असाधारण" स्थिति है.केंद्र ने अदालत से कहा था कि शीर्ष अदालत की संविधान पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा था कि दिल्ली को राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता है.

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केंद्र ने कहा था कि बुनियादी मुद्दों में से एक यह है कि क्या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (GNCTD) के पास सेवाओं' को लेकर विधायी और कार्यकारी शक्तियां हैं या नहीं.  दिल्ली सरकार ने पहले अदालत को बताया था कि उनके पास जांच का एक आयोग गठित करने की कार्यकारी शक्ति है.

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आम आदमी पार्टी की सरकार ने शीर्ष अदालत से कहा था कि उसका कामकाज "पूरी तरह से पंगु" है. वह राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासन पर संविधान पीठ के फैसले के बावजूद अधिकारियों के स्थानांतरण या पोस्टिंग का आदेश नहीं दे सकती.


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