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कुलभूषण केस: पाकिस्‍तान में लोगों ने सरकार को कोसा, विशेषज्ञों ने कहा-अधूरी थी तैयारी

पाकिस्‍तानी न्‍यूज वेबसाइट डॉन के मुताबिक भारत के पक्ष में इस फैसले के जाने से पाकिस्‍तान में अपनी ही सरकार के खिलाफ गुस्‍से का आलम है.

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कुलभूषण केस: पाकिस्‍तान में लोगों ने सरकार को कोसा, विशेषज्ञों ने कहा-अधूरी थी तैयारी

हेग स्थित आईसीजे में भारत-पाकिस्‍तान ने अपनी दलीलें रखी थीं.(फाइल फोटो)

खास बातें

  1. आईसीजे में भारत को मिली कामयाबी
  2. पाकिस्‍तान में विशेषज्ञ शरीफ सरकार पर उठा रहे सवाल
  3. पाक विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्‍तान की तैयारी अधूरी थी
कुलभूषण केस में अंतरराष्‍ट्रीय अदालत में भारत की बड़ी कामयाबी के बाद पाकिस्‍तान में हताशा का माहौल है. पाकिस्‍तानी न्‍यूज वेबसाइट डॉन के मुताबिक भारत के पक्ष में इस फैसले के जाने से पाकिस्‍तान में अपनी ही सरकार के खिलाफ गुस्‍से का आलम है. दरअसल पाकिस्‍तानी विश्‍लेषक पहले इस बात से आश्‍वस्‍त थे कि आईसीजे के पास इस मामले में हस्‍तक्षेप करने का अधिकार नहीं है. हालांकि फैसला आने के बाद पाकिस्‍तानी जानकार कह रहे हैं कि पाकिस्‍तान ने बेहद कमजोर दलीलें रखीं और इसके चलते उसको हार का सामना करना पड़ा.

डॉन न्‍यूज से बातचीत करते हुए रिटायर्ड पाकिस्‍तानी जज शेख उस्‍मानी ने कहा कि आईसीजे का य‍ह निर्णय चिंताजनक है क्‍योंकि उसके पास इस मामले में फैसला देने का अधिकार क्षेत्र ही नहीं था. लेकिन यह पाकिस्‍तान की गलती है कि वह अपना पक्ष रखने वहां गया. उनको वहां नहीं जाना चाहिए था. उन्‍होंने खुद ही अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी मार ली.

कुछ इसी तरह लंदन में रहने वाले पाकिस्‍तानी मूल के बैरिस्‍टर राशिद आलम ने डॉन से कहा कि पाकिस्‍तान कमजोर तैयारी के साथ आईसीजे में पहुंचा और उसको अपना पक्ष रखने के लिए जो 90 मिनट का मौका मिला था, उसका सही ढंग से इस्‍तेमाल नहीं कर पाया. उन्‍होंने कहा कि पाकिस्‍तान को अपना पक्ष रखने के लिए 90 मिनट का समय था लेकिन उसने 40 मिनट बर्बाद कर दिए. उनके मुताबिक पाकिस्‍तान की तरफ से पेश खावर कुरैशी ने पूरे समय का इस्‍तेमाल नहीं किया और उपलब्‍ध समय का पूरा उपयोग ही नहीं कर सके.

विश्‍लेषक जाहिद हुसैन ने कहा कि आईसीजे का यह निर्णय पाकिस्‍तान के लिए बाध्‍यकारी तो नहीं है लेकिन नैतिक रूप से इसका दबाव बनता है. उनके मुताबिक दरअसल अंतरराष्‍ट्रीय नियमों के तहत इस तरह के निर्णयों से नैतिक जवाबदेही बनती है. हालांकि उन्‍होंने यह भी कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि यह निर्णय भारत के पक्ष में गया है लेकिन इस निर्णय ने फांसी की सजा पर तो रोक लगा ही दी है.


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