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राष्ट्रपति के लिए बीजेपी की पसंद रामनाथ कोविंद को लेकर नीतीश कुमार और लालू यादव के ख्याल जुदा : सूत्र

कहा जाता है कि नीतीश कुमार अब भी विपक्ष द्वारा किसी प्रत्याशी को खड़ा करने के खिलाफ हैं, जबकि राज्य सरकार में उनके प्रमुख सहयोगी लालू प्रसाद यादव तथा कांग्रेस का मानना है कि चुनाव करवाना बेहद ज़रूरी हो गया है...

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राष्ट्रपति के लिए बीजेपी की पसंद रामनाथ कोविंद को लेकर नीतीश कुमार और लालू यादव के ख्याल जुदा : सूत्र

बिहार के सीएम नीतीश कुमार राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए प्रत्याशी रामनाथ कोविंद का समर्थन कर सकते हैं...

खास बातें

  1. नीतीश विपक्ष द्वारा राष्ट्रपति पद के लिए प्रत्याशी खड़ा करने के खिलाफ
  2. लालू चाहते हैं, रामनाथ कोविंद के विरुद्ध विपक्ष का प्रत्याशी ज़रूर हो
  3. कांग्रेस का भी मानना है, चुनाव करवाना बेहद ज़रूरी हो गया है
पटना: बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की ओर से राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित कर जिस तरह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) चाहती थी, बिल्कुल उसी तरह विपक्ष में दरारें दिखने लगी हैं. खासतौर से बिहार में, जहां कोविंद अगस्त, 2015 से राज्यपाल के रूप में कार्यरत हैं, और जहां सत्ता पर आरूढ़ दोनों साझीदारों - मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तथा पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव - के बीच अलग-अलग मुद्दों पर असहमति हो जाना कतई आश्चर्यजनक नहीं है.

सोमवार को बीजेपी ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी चुनकर विपक्ष को चारों खाने चित कर डाला है, क्योंकि कोविंद दलित समाज से ताल्लुक रखते हैं, और एनडीए की इस पसंद से असहमति जताना ज़्यादातर विपक्षी दलों के लिए काफी दुरूह कार्य साबित होगा. उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) प्रमुख मायावती, जो स्वयं 'दलितों की मसीहा' कही जाती हैं, ने कहा कि वह कोविंद की उम्मीदवारी का विरोध तब तक नहीं करेंगी, जब तक विपक्ष भी किसी दलित को ही प्रत्याशी के रूप में नहीं उतार देता.

दिल्ली में मंगलवार को ही विपक्षी दलों की एक बैठक होने जा रही है, जिसमें तय किया जाएगा कि रामनाथ कोविंद को ही समर्थन दे दिया जाए, या मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) नेता सीताराम येचुरी के सुझाव के अनुसार कोई अन्य प्रत्याशी खड़ा कर चुनाव की स्थिति पैदा की जाए.

वैसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्ष के इस संयुक्त मोर्चे का काफी अहम हिस्सा हैं, और रामनाथ कोविंद का नाम इसी रिश्ते का इम्तिहान लेने पर तुला हुआ है. सोमवार शाम को मुख्यमंत्री ने पटना स्थित गवर्नर हाउस जाकर रामनाथ कोविंद से मुलाकात की, और उनके नामांकन पर उन्हें बधाई दी. कोविंद की बीजेपी से जुड़ी जड़ों के बावजूद उनके द्वारा बिहार सरकार के साथ 'आदर्श संबंध' बनाए रखने और किसी भी तरह का पक्षपात नहीं करने के लिए के लिए नीतीश ने राज्यपाल की काफी तारीफ की, और कहा कि उनकी पार्टी गुरुवार की बैठक में अपना रुख साफ करेगी. हालांकि नीतीश के करीबी सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री मानते हैं कि दलितों के कल्याण के लिए काम करने वाली बीजेपी की इकाई के साथ जुड़े रह चुके रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी का विरोध करने का कोई आधार नहीं है.

वर्ष 2012 में नीतीश कुमार ने तत्कालीन केंद्र सरकार की पसंद डॉ प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद के लिए वोट देने की खातिर विपक्षी पार्टियों के उस गठबंधन से अलग रास्ता अपनाया था, जिसका वह स्वयं भी हिस्सा थे.

कहा जाता है कि नीतीश कुमार अब भी विपक्ष द्वारा किसी प्रत्याशी को खड़ा करने के खिलाफ हैं, जबकि राज्य सरकार में उनके प्रमुख सहयोगी लालू प्रसाद यादव तथा कांग्रेस का मानना है कि चुनाव करवाना बेहद ज़रूरी हो गया है, क्योंकि यह संदेश साफ-साफ दिया जाना आवश्यक है कि वे राष्ट्रपति बनने जा रहे किसी बीजेपी नेता के पीछे खड़े नहीं हो सकते.

लालू प्रसाद यादव भी ऐसे वक्त में बीजेपी के साथ एक ही पाले में खड़े नहीं दिखना चाहते, जब उनके बच्चों - जिनमें से दो मंत्री हैं और एक सांसद - के खिलाफ फर्ज़ी कंपनियों की मदद से ज़मीन-जायदाद हड़पने के मामले में जांच चल रही है.

बीजेपी तथा उनके सहयोगी दलों के पास कुल वोटों में से लगभग 48 फीसदी वोट हैं, तथा नवीन पटनायक के बीजू जनता दल (बीजेडी) तथा तमिलनाडु में सत्तासीन ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) द्वारा समर्थन मिलने से एनडीए का चुनाव जीत जाना तय है.

विपक्षी दलों की गुरुवार को होने वाली बैठक की अध्यक्षता कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी करेंगी, और विपक्ष द्वारा राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में मीरा कुमार के नाम पर विचार किया जा रहा है, जो दलित समाज से हैं, तथा लोकसभा अध्यक्ष रह चुकी हैं.

गौरतलब है कि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव अक्सर अहम मुद्दों पर एक-दूसरे से असहमत होते रहे हैं. उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पिछले साल नवंबर में अचानक की गई नोटबंदी की नीतीश कुमार ने खुलकर तारीफ की, जिससे लालू नाखुश थे. वैसे, नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल के सदस्य अपने पुत्रों पर एक के बाद एक लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों से भी दोनों के रिश्तों में तनाव पैदा हुआ है.


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