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कहां हैं रोज़गार? इस मुद्दे पर देखें रवीश कुमार का फेसबुक लाइव

सरकारी आंकड़ों की मानें, तो पिछले दो वर्ष से रेलवे में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्‍या में कोई वृद्धि नहीं हुई है. वैकेंसी हज़ारों की तादाद में निकल रही हैं, लेकिन नियुक्‍तियों का पता नहीं.

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कहां हैं रोज़गार? इस मुद्दे पर देखें रवीश कुमार का फेसबुक लाइव

रवीश कुमार फेसबुक लाइव

नई दिल्ली: हिन्दू-मुस्लिम मुद्दों के बीच उलझी राजनीति में रोज़गार, शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य जैसे मुद्दे गायब हैं. सरकार आंकड़ों में अपनी तरक्‍की दिखाती है, युवा आवेदन कर परीक्षा का इंतज़ार करते हैं. परीक्षा हो भी गई, तो परिणाम का इंतज़ार रहता है, जो वर्षों चलता है. परिणाम आ गया, तो नियुक्‍ति का इंतज़ार बना रहता है. यही सिलसिला जारी है. सरकारी आंकड़ों की मानें, तो पिछले दो वर्ष से रेलवे में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्‍या में कोई वृद्धि नहीं हुई है. वैकेंसी हज़ारों की तादाद में निकल रही हैं, लेकिन नियुक्‍तियों का पता नहीं. अभी एक दिन पहले ही रेलवे में 90,000 से ज़्यादा पदों के लिए वैकेंसी निकली हैं. बैंकिंग का हाल भी कुछ ऐसा ही है. 'विश्‍वगुरु' होने का सपना देखने वाला देश अपने विद्यालयों और विश्‍वविद्यालयों में पर्याप्‍त शिक्षक मुहैया नहीं करा पा रहा है.

उधर, स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में डॉक्‍टरों की कमी अलग मसला है. ऐसे में युवाओं के रोज़गार की चिंता करने की जगह देश की राजनीति में हिन्दू-मुस्लिम, पद्मावती जैसे मुद्दे हावी हैं. युवाओं के भविष्‍य की चिंता किसे है...?
रोज़गार के इसी मुद्दे पर रवीश कुमार के साथ FB LIVE...


बेरोजगारी के मुद्दे पर रवीश कुमार के ब्लॉग

सरकारी नौकरियां हैं कहां
रोज़गार के सवाल को पकौड़ा तलने का रूपक मिल जाए और रूपक गढ़ने वाले आर्कमिडिज़ का फार्मूला समझ कर उस पर कायम रहे तो रोज़गार को लेकर मारे मारे फिर रहे नौजवानों की चुनौतियां और बढ़ जाती हैं. वो अपने रोज़गार और उसे देने की सरकारी व्यवस्था को लेकर सवाल पूछ रहे हैं मगर पूछने से पहले उन्हें पकौड़े का फार्मूला थमा दिया जा रहा है.

नौकरियों पर सीरीज़ : नतीजों के लिए लंबा इंतज़ार क्यों?
नौकरी सीरीज़ का हमारा ग्यारहवां एपिसोड जारी है. स्टाफ सलेक्शन कमीशन ने कहा है कि करीब 15 हज़ार नौजवानों को 28 फरवरी तक केंद्र के अलग-अलग विभागों में ज्वाइनिंग हो जाएगी. ये वे नौजवान हैं जिन्होंने स्टाफ सलेक्शन कमीशन 2015 बैच की परीक्षा अंतिम रूप से पास कर ली है. इनका रिज़ल्ट अगस्त 2017 में ही आ गया है फिर भी अभी तक ज्वाइनिंग नहीं हुई है.

सरकारी नौकरियां आख़िर हैं कहां - भाग 10 
नौकरियों पर हमारी सीरीज़ जारी है. इसे संक्षिप्त रूप में आज 10वां एपिसोड गिन सकते हैं. स्टाफ सलेक्शन कमीशन ने हमारी सीरीज़ के दौरान तीसरी बार पत्र जारी किया है. इस पत्र से अपनी ज्वाइनिंग का इंतज़ार कर रहे हैं भारत के प्यारे नौजवान बहुत खुश हैं. वो देख रहे हैं कि अगर हिन्दू मुस्लिम टॉपिक छोड़कर रोज़गार के सवाल पर आया जाए तो मुद्दों का असर होता है.

सरकारी नौकरियां आख़िर हैं कहां - भाग 9
नौकरियों पर हमारी सीरीज़ का यह 9वां एपिसोड है. इन नौजवानों की ज़िंदगी में पढ़ने के अलावा कोई और वक्त नहीं होता है. सुबह उठना और शाम तक कोचिंग में रहना और फिर तैयारी में लग जाना. इसके बीच जैसे ही ख़बर आई कि सरकार 5 साल से खाली पड़े पदों को ख़त्म कर देगी, नौजवानों में बेचैनी बढ़ गई है. आप कोचिंग में एडमिशन ले चुके होते हैं, इस उम्मीद में कि इस साल भर्ती निकलेगी और यह ख़बर आ जाए कि 5 लाख पद समाप्त होंगे, तो दिल पर क्या बीतेगी. अगर इसी फॉर्मूले पर राज्य सरकारें चल पड़ी तो भारत के नौजवानों के लिए सरकारी नौकरियों के रास्ते पहले से कहीं ज़्यादा संकरे हो जाएंगे. 

सरकारी नौकरियां आख़िर हैं कहां - भाग 8
जब भारत जैसे विशाल देश में एक फिल्म पर तीन महीने तक सुबह शाम टीवी पर चर्चा हो सकती है और नागरिकों से लेकर जानकारों तक ने इस बहस में हिस्सा लिया है तो उम्मीद है कि उनमें नौकरियों पर हमारी सीरीज़ का 8वां एपिसोड देखने की दिलचस्पी बची होगी. अलग-अलग राज्यों में परीक्षाओं से जुड़े छात्र उदासी के शिकार हो रहे हैं.

सरकारी नौकरियां आख़िर हैं कहां - भाग 7
भारत में बेरोज़गारी का विस्फोट हो गया है. जहां कहीं भर्ती निकलती है, बेरोज़गारों की भीड़ टूट पड़ती है. यह भीड़ बता रही है कि बेरोज़गारी के सवाल को अब और नहीं टाला जा सकता है. यह सभी सरकारों के लिए चेतावनी है चाहे किसी भी दल की सरकार हो. नौजवानों के बीच नौकरी का सवाल आग की तरह फैल रहा है.

राज्य चयन आयोग यूपीएससी से क्यों नहीं सीखते?
क्या कोई है जो बिहार के छपरा के जयप्रकाश नारायण यूनिवर्सिटी में फंसे हज़ारों छात्रों को बाहर निकाल सकता है. ये छात्र वैसे ही फंसे हैं जैसे पिछले साल मुंबई के कमला मिल्स में लगी आग में लोग फंस गए थे और एक सुदर्शन शिंदे नाम के जांबाज़ सिपाही ने 8 लोगों को अपने कंधे पर लादकर बाहर निकाला था. छपरा की जेपी यूनिवर्सिटी के छात्रों को सिपाही सुदर्शन शिंदे की ज़रूरत है जो वहां कई साल से फंसे छात्रों को बाहर निकाल सके. ये छात्र कई साल से वहां बीए में एडमिशन लेकर फंसे हैं. 

कई राज्य भर्ती बोर्डों के दुष्चक्र में फंसे छात्र
डावोस में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा है कि भारत का युवा नौकरी मांगने वाला नहीं, देने वाला बनने की राह पर है. नौकरियों में प्राइम टाइम का यह 5वां एपिसोड भारत के उन युवाओं के बारे में हैं, जिन्हें नौकरी देने वाली संस्था नौकरी नहीं दे रही है. लगता है ये संस्थाएं भी इसी राह पर काम कर रही हैं कि भारत के युवाओं को नौकरी न दें ताकि वे खुद अपनी नौकरी खोज लें और फिर दूसरों को भी दें.

राज्य चयन आयोगों का नौजवानों से खिलवाड़ क्यों?
भारत के बेरोज़गारों के लिए एक अलग से न्यूज़ चैनल होना चाहिए. उनकी समस्याएं बहुत हैं और जटिल भी हैं. कोई ठोस संख्या तो नहीं है मगर कोई बहाली निकलती है तो दस से बीस लाख छात्र फार्म भरने लगते हैं. इस अंदाज़ से आप देखेंगे तो पाएंगे कि देश भर में करोड़ों की संख्या में छात्र भांति भांति की सरकारी नौकरियों की तैयारी में पसीना बहा रहे हैं. फिर भी इनकी सुनवाई क्यों नहीं है.

सरकारी नौकरियां कहां गईं : पार्ट-3
राज्यों के चयन आयोगों पर बात करना अर्जेंट हो गया है. नौजवान फार्म भर कर परीक्षा का इंतज़ार कर रहे हैं और जो परीक्षा दे चुके हैं वो रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रहे हैं और जिनका रिज़ल्ट आ चुका है वो ज्वाइनिंग लेटर का इंतज़ार कर रहे हैं.

नौकरी पर नई रिपोर्ट : 2017 के साल में 55 लाख नौकरियां मिलीं?
भारत में रोज़गार की संख्या की गिनती के लिए कोई मुकम्मल और पारदर्शी व्यवस्था नहीं है. आईआईएम बंगलौर के प्रोफेसर पुलक घोष और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की सौम्य कांति घोष ने एक रिसर्च पेपर पेश किया है. उम्मीद है इस पर बहस होगी और नए तथ्य पेश किए जाएंगे. जब तक ऐसा नहीं होता, आप सभी को यह रिपोर्ट पढ़नी चाहिए. जब पे-रोल देख ही रहे थे तो प्रोफेसर साहब यह भी देख लेते कि कितनी नौकरियां गईं और जिन्हें मिली हैं उनमें महिलाएं कितनी हैं.

प्राइम टाइम इंट्रो : चयन के बावजूद नौकरी का लंबा इंतज़ार क्यों?
हर राज्य में कर्मचारियों और अधिकारियों की भर्ती के लिए चयन आयोग है जिनका काम है भर्ती निकालना, परीक्षा का आयोजन करना और फिर रिज़ल्ट प्रकाशित करना. क्या आप जानते हैं कि ये चयन आयोग किस तरह काम करते हैं, इनकी काम करने की क्षमता और कुशलता कैसी है.

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एक करोड़ नौकरियों का वादा कहां गया? रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम 
जब गांव-शहर और घर-बाहर हर जगह नौकरी की बात होती रहती है तो फिर मीडिया में नौकरी की बात क्यों नहीं होती है. विपक्ष में रहते हुए नेता बेरोज़गारी का मुद्दा उठाते हैं मगर सरकार में आकर रोज़गार के बारे में बताते ही नहीं है. यह बात हर दल और हर मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री पर लागू होती है.

VIDEO : बेरोजगारी की समस्या क्यों बनी हुई है



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