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प्रियंका की एंट्री से बिगड़ेगा यूपी का सियासी 'खेल': कांग्रेस के दांव से टीम मायावती को नुकसान या बीजेपी को फायदा?

लोकसभा चुनाव से पहले प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi Vadra) की सक्रिय राजनीति में दस्तक ने यूपी की सियासी समीकरण को एक बार फिर से उलझा दिया है.

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प्रियंका की एंट्री से बिगड़ेगा यूपी का सियासी 'खेल': कांग्रेस के दांव से टीम मायावती को नुकसान या बीजेपी को फायदा?

प्रियंका गांधी और राहुल गांधी (फाइल फोटो)

खास बातें

  1. प्रियंका गांधी की एंट्री से यूपी में त्रिकोणीय मुकाबला हो गया है.
  2. मायावती-अखिलेश के गठबंधन को नुकसान पहुंचा सकता है कांग्रेस का यह दांव.
  3. बीजेपी को फायदा हो सकता है कांग्रेस के इस फैसले से.
नई दिल्ली:

लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election 2019) से पहले प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi Vadra) की सक्रिय राजनीति में दस्तक ने यूपी के सियासी समीकरण को एक बार फिर से उलझा दिया है. यूपी में अब तक भाजपा और सपा-बसपा गठबंधन के बीच सीधी टक्कर को प्रियंका गांधी की एंट्री ने अब मुकाबला त्रिकोणीय बना दिया है. प्रियंका गांधी की राजनीतिक एंट्री के बाद से अब हर कोई यही सवाल कर रहा है कि क्या एक मजबूत दावेदारी पेश करने का दावा करने वाली कांग्रेस से बीजेपी को फायदा मिलेगा? क्या कांग्रेस के इस कदम से मायावती को नुकसान होगा? अगर कुछ सियासी समीकरणों पर नजर दौड़ाया जाए तो ऐसे हालात बनते दिख रहे हैं कि कांग्रेस के आने से शायद भाजपा को सीधे तौर पर फायदा हो सकता है. 

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दरअसल, उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव द्वारा सपा-बसपा गठबंधन से कांग्रेस को अलग रखने के बाद पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने ऐलान किया था कि कांग्रेस पार्टी राज्य की सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. कुछ दिनों बाद ही उन्होंने अपनी बहन प्रियंका गांधी को कांग्रेस महासचिव और पूर्वी यूपी का प्रभारी बनाकर यूपी की सियासत में एक नया ट्विस्ट ला दिया. वहीं कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को पश्चिमी यूपी की कमान देकर यूपी में यह संदेश दे दिया है कि कांग्रेस अभी रेस से अलग नहीं हुई है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि राहुल गांधी ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि उनकी पार्टी कांग्रेस राज्य में किसी भी कीमत पर बैकफुट पर रहकर नहीं खेलेगी. 

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हालांकि, प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया को क्रमश: पूर्वी यूपी और पश्चिमी यूपी का प्रभार देने के बाद भी राहुल गांधी ने मायावती और अखिलेश यादव के प्रति सम्मान व्यक्त किया. उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वे दोनों दिग्गज उनके दुश्मन नहीं हैं और अगर संभव हुआ तो वह सपा-बसपा गठबंधन में सहयोग करने के लिए तैयार हैं. यानी राहुल गांधी ने अब भी यूपी में सपा-बसपा गठबंधन में अपने दरवाजे खोल रखे हैं. मगर अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या कांग्रेस के इस कदम से सपा-बसपा के वोटबैंक पर असर पड़ेगा? क्या कांग्रेस बसपा-सपा के वोटबैंक में सेंधमारी करेगी, जिससे बीजेपी को फायदा होगा. अगर ऐसा होता है ति 2014 में 71 सीट जीतने वाली भाजपा एक बार फिर से अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब रहेगी.

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सपा-बसपा गठबंधन के सूत्रों ने जोर देकर कहा कि कांग्रेस मायावती के वोट बैंक में सेंधारी करने में सक्षण नहीं होगी. वह मायावती के वोटबैंक को नहीं तोड़ पाएगी, जिसमें ज्यादातर दलित या फिर अन्य पिछड़ा वर्ग शामिल हैं. वहीं, इस गठबंधन में मुस्लिम वोटबैंक का संयोजन भी है जो अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी का समर्थन करते हैं. समाजवादी पार्टी की जूही सिंह ने कहा कि ऐसा कर पाना कांग्रेस के लिए मुश्किल है. 

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एक कांग्रेसी नेता ने कहा कि यह अधिक संभावना है कि कांग्रेस पार्टी बीजेपी के उच्च जाति (सवर्ण) के वोट बैंक में सेंधमारी करेगी, क्योंकि यह वर्ग पहले कांग्रेस का समर्थन करता था, जो बाद में भाजपा की ओर स्थानांतरित हो गया. सूत्रों ने कहा कि पार्टी उन महत्वपूर्ण सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारेगी जो ब्राह्मण-ठाकुर वोटरों वाले आधार पर कब्जा करेंगे. 

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हालांकि, भाजपा के सिद्धार्थ नाथ सिंह ने इन संभावनाओं को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि 'मुझे संदेह है कि कांग्रेस को ब्राह्मणों के वोट मिलेंगे. दरअसल, उच्च जातियां बुद्धिजीवी वर्ग हैं और उन्होंने पीएम मोदी को निर्णायक निर्णय लेते देखा है. इसके अलावा, उच्च जातियों को 10 प्रतिशत कोटा मिला है, जो वे चाहते थे. बता दें कि नया कोटा कानून जो सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण देगा. 

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वहीं, समाजवादी पार्टी की प्रवक्ता जूही सिंह ने स्पष्ट किया कि महागठबंधन के भीतर किसी भी नकारात्मक परिणाम के लिए  कांग्रेस को जिम्मेदार माना जाएगा. उन्होंने कहा, "यह कांग्रेस का आंतरिक मामला है कि वह कैसे चुनाव लड़ना चाहती हैं, लेकिन हमारे लिए उनकी यही सलाह है कि यदि आप जिम्मेदारी लेते हैं, तो आपको जवाबदेह भी होना होगा."

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साल 2009 में कांग्रेस ने 21 सीटें जीतीं थीं. मगर 2014 के लोकसभा चुनाव में यह आंकडा दो पर पहुंच गया और कांग्रेस पार्टी सिर्फ सोनिया गांधी की रायबरेली और राहुल गांधी की अमेठी सीट ही बचा पाई. इतना ही नहीं, कांग्रेस का वोट शेयर भी अब तक के सबसे नीचले स्तर 7.5 फीसदी पर आ गया. 

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वहीं, 2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में लड़ने वाली कांग्रेस ने अमेठी और रायबरेली लोकसभा क्षेत्रों में से 10 विधानसभा सीटों में से महज चार पर जीत हासिल की थी. उस वक्त भी अखिलेश यादव ने संकेत दिया था कि कांग्रेस के साथ गठबंधन ने उनकी संभावनाओं को खत्म किया था. मगर इस बार, अखिलेश यादव के साथ गठजोड़ की घोषणा करने वाली मायावती ने कांग्रेस को अलग रखने का कारण यह बताया कि कांग्रेस पार्टी के पास वोट ट्रांसफर करने की क्षमता नहीं है. वहीं, राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस के पास उत्तर प्रदेश की जनता को देने के लिए बहुत कुछ है. 

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