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जब 28 साल की युवा ममता बनर्जी ने दिया कांग्रेस के कद्दावर नेता कमलापति त्रिपाठी को 'चकमा'

ममता बनर्जी (Mamta Banerjee) ने सुब्रत दा के निर्देशों को जस का तस अनिमा चटर्जी के सामने रख दिया.

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जब 28 साल की युवा ममता बनर्जी ने दिया कांग्रेस के कद्दावर नेता कमलापति त्रिपाठी को 'चकमा'

ममता बनर्जी (Mamta Banerjee) शुरू से ही विद्रोही स्वभाव की रही हैं.

नई दिल्ली :

यह साल था 1983. युवा ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) सियासत का ककहरा सीख रही थीं. इसी दौरान कोलकाता में कांग्रेस का अधिवेशन बुलाया गया. इमरजेंसी के बाद सत्ता की कुर्सी गंवाने वाली कांग्रेस की जब वापसी हुई तो इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) का महासचिव बनाया गया और पार्टी के कद्दावर नेता कमलापति त्रिपाठी को कार्यकारी सचिव की जिम्मेदारी मिली. कोलकाता का अधिवेशन इसी नए नेतृत्व की अगुवाई में हो रहा था. अधिवेशन के दौरान 28 वर्षीय ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) को वरिष्ठ नेता सुब्रत बनर्जी की टीम में रखा गया और उन्हें कांग्रेस के बड़े नेताओं की देखभाल की जिम्मेदारी मिली. ममता बनर्जी और अन्य कार्यकर्ता नेताओं की देखरेख में जुटे थे, इस बीच पार्टी कमलापति त्रिपाठी को लेकर पेंच फंस गया. दरअसल, कमलापति त्रिपाठी (Kamalapati Tripathi) की अपनी कुछ मान्यताएं थीं और उसपर वे अडिग थे. इन मान्यताओं में से एक था कि वे सिर्फ ब्राम्हण के हाथ का बना खाना ही खाते थे. अधिवेशन की शाम सुब्रत दा ने ममता बनर्जी से कहा कि कमलापति त्रिपाठी सिर्फ ब्राम्हण महिला के हाथ का बना भोजन ही करेंगे और सुबह नाश्ते में उन्हें पिस्ता, मुनक्का और जूस चाहिए.

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ममता बनर्जी ने सुब्रत दा के निर्देशों को जस का तस अनिमा चटर्जी के सामने रख दिया, जो खानपान की जिम्मेदारी संभाल रही थीं. चूंकि अधिवेशन में सैकड़ों लोग थे, इसलिये अनिमा की व्यस्तता अलग थी. उन्होंने ममता से कहा कि मुझे मदद के लिए दो लोगों की जरूरत पड़ेगी. इधर ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था. उन्होंने कमलापति त्रिपाठी (Kamalapati Tripathi) की मान्यताओं को चुनौती देने की ठान ली थी. मोनोबिना गुप्ता अपनी किताब ''दीदी : अ पॉलीटिकल बायोग्राफी'' में लिखती हैं,  'ममता बनर्जी अनिमा की तरफ मुड़ीं और कहा ठीक है....मेरी दो गैर ब्राम्हण सहयोगी कमलापति त्रिपाठी के लिए खाना बना देंगी और तुम परोस देना'. ममता बनर्जी ने किया भी ऐसा ही. किसी को कानोकान इसकी भनक नहीं लगी. इस वाकये पर ममता बनर्जी अपनी आत्मकथा ''स्ट्रगल्स ऑफ एग्जिसटेंस'' में लिखती हैं, 'अब कमलापति त्रिपाठी इस दुनिया में नहीं हैं. अगर वे जिंदा होते और इस घटना का पता लगता तो मुझे पक्का बाहर का रास्ता दिखा देते'. बकौल मोनोबिना गुप्ता, ममता बनर्जी शुरू से ही 'पुरानी मान्यताओं' को चुनौती देती रही हैं. और जैसे-जैसे सियासी गलियारों में ममता बनर्जी के पैर जमे वे अपने रुख़ पर और पुख़्ता तरीके से कायम दिखीं.  

छात्रनेता से मुख्यमंत्री तक का सफर

ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की कॉलेज के दिनों से ही राजनीति में दिलचस्पी थी और बतौर यहीं से उन्होंने सियासत की एबीसीडी सीखी. 1970 से कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता के तौर पर ममता ने राजनीतिक सफर की शुरुआत की. साल 1976 से 1980 तक वह महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं. 1984 में ममता बनर्जी ने सीपीएम के कद्दावर नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोकसभा सीट से हराकर सबको चौंका दिया. वह देश की सबसे युवा सांसद बनीं. इसके बाद 1991 में कोलकाता से लोकसभा के लिए चुनी गईं ममता को केंद्रीय मंत्रीमंडल में शामिल होने का मौका मिला. वह नरसिम्हा राव सरकार में मानव संसाधन विकास, युवा मामलों और महिला एवं बाल विकास विभाग में राज्य मंत्री बनीं. इसके अलावा ममता नरसिम्हा राव सरकार में खेल मंत्री के तौर पर भी बनाई गईं, लेकिन बाद में कुछ मतभेदों के चलते इस मंत्रालय से उन्होंने इस्तीफा दे दिया. 

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एनडीए सरकार में संभाला रेल मंत्री का पद 

साल 1999 में ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की पार्टी टीएमसी बीजेपी के नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार का हिस्सा बनी और ममता को रेल मंत्री बनाया गया. अपने पहले ही रेल बजट के दौरान बंगाल को लेकर की गई घोषणाओं को लेकर उनकी आलोचना भी हुई. साल 2001 में जब तहलका घोटाला सामने आया तो ममता बनर्जी ने एनडीए से किनारा कर लिया, लेकिन 2004 में वह फिर एनडीए का हिस्सा बनीं. सियासी उठापटक का दौर जारी रहा और 2009 में वह सत्तारूढ़ यूपीए का हिस्सा बनीं और दूसरी बार रेल मंत्री का पद संभाला. इस बीच ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की सियासत में भी जड़ें जमा रही थीं और साल 2011 में  'मां, माटी, मानुष' का नारा देते हुए उनकी पार्टी ने विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से जीत हासिल ली. ममता बनर्जी ने बंगाल में अजेय माने जाने वाले लेफ्ट की सरकार को उखाड़ फेंका और मुख्यमंत्री बनीं. 2016 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने दोबारा करिश्मा दिखाया और फिर सीएम की कुर्सी पर काबिज हुईं. 

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सादगी की बदौलती बनीं जनता की 'दीदी'

5 जनवरी 1955 को जन्मीं ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) को विद्रोही स्वभाव के अलावा उनकी सादगी के लिए भी जाना जाता है और अपने प्रशंसकों के बीच वह 'दीदी' के नाम से भी चर्चित हैं. ममता बनर्जी हमेशा बंगाली सूती साड़ी और हवाई चप्पल में नजर आती हैं. उन्होंने शादी नहीं की है. ममता के पिता स्वतंत्रता सेनानी थे और जब वह छोटी थीं, तभी पिता का देहांत हो गया था. कहते हैं कि गरीबी के चलते ममता ने परिवार के भरण पोषण का जिम्मा खुद उठाया. कोलकाता के जोगमाया देवी कॉलेज से इतिहास में ऑनर्स की डिग्री के साथ एमए और बीएड पढ़ाई की पढ़ाई करने वाली ममता बनर्जी इन दिनों फिर चर्चा में हैं. सीबीआई vs बंगाल विवाद के बीच वह अपने चर्चित विद्रोही स्वभाव के साथ धरने पर बैठ गई हैं.   

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Video: सीबीआई के दुरुपयोग के आरोप के बाद धरने पर बैठीं ममता बनर्जी

 



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