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मणि-वार्ता : 'ताकत की ऐंठ' के बारे में चेताया था गांधी ने...

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मणि-वार्ता : 'ताकत की ऐंठ' के बारे में चेताया था गांधी ने...
मणिशंकर अय्यर कांग्रेस की ओर से राज्यसभा सदस्य हैं...

महात्मा गांधी की 145वीं जयंती के अवसर पर एक सवाल फिर कौंधता है - क्या 21वीं सदी में भी गांधी प्रासंगिक हैं? 21वीं सदी की तकनीक के अमेरिकी 'गर्भगृह' पोर्टलैन्ड, ओरेगॉन में बसे तमिल मूल के निरंजन रामाकृष्णन ने - पैलग्रेव मैकमिलन, न्यूयॉर्क, 2013 द्वारा प्रकाशित - अपनी नई पुस्तक 'रीडिंग गांधी इन द ट्वेन्टी फर्स्ट सेंचुरी' (Reading Gandhi in the 21st Century; यह पुस्तक भारत में शीघ्र ही लॉन्च होने जा रही है) में इसका जवाब देने की कोशिश की है। उनका कहना है, मेरे विचार में गांधी जयंती मनाने का सबसे उपयुक्त तरीका है, यह पुस्तक 12वीं कक्षा तथा स्नातक कर रहे सभी विद्यार्थियों को मुफ्त वितरित की जाए (जहां इन 138 पृष्ठों के अनुवाद की ज़रूरत हो, किया जाए), ताकि अगली पीढ़ी का प्रत्येक व्यक्ति अपने-आप इस सवाल का जवाब तलाश करने की कोशिश कर सके।

रामाकृष्णन ने गांधी के बाद के युग में गांधी के प्रभाव को लेकर की गई दो विरोधाभासी टिप्पणियों के बीच तुलना की है, जिनमें से एक वर्ष 1952 में बरट्रांड लॉर्ड रसेल ने की थी, और दूसरी गांधी जी की हत्या के तुरंत बाद व्याकुल और उद्विग्न जवाहरलाल नेहरू ने की थी। रसेल का मानना था, "हालांकि 'गांधी की' यादों को सहेजकर रखा ही जाना चाहिए, लेकिन यह उम्मीद रखना गलती होगी कि भारत की सोच वैसी ही रहेगी, जैसी उन्हें बेहतरीन लगती थी... भारत को भी अन्य देशों की तरह अपना स्थान आधुनिक विश्व में खोजना होगा, बीते हुए ज़माने के किन्हीं सपनों में नहीं... उनका काम पूरा हो गया, और अब अगर भारत को फलना-फूलना है तो उसे नए रास्तों पर चलना ही होगा..."

दूसरी ओर, नेहरू ने गांधी जी की हत्या के कुछ ही घंटे बाद दावा किया था, "इस देश को कई वर्षों से प्रकाशित करती रही रोशनी कई और वर्षों तक इस देश को प्रकाशित करती रहेगी, और आज से एक हज़ार साल बाद भी इस देश में वह प्रकाश देखा जा सकेगा, और सारी दुनिया उसे देखेगी..."

कौन सही था...? रामाकृष्णन का जवाब होगा, 'दोनों...' क्योंकि वस्तुतः भारत ने नेहरू से लेकर मोदी तक, और खासतौर से मनमोहन सिंह के युग में, तरक्की को जीडीपी से जोड़कर देखने का खुद को इस तरह आदी बना लिया है कि जो कुछ गांधी ने कहा था, वह किसी का सनकभरा, बीते जमाने का (अप्रासंगिक), और शायद प्रतिक्रियावादी प्रलाप लगे, और ऐसा महसूस हो, जैसे किसी ऐसे शख्स की कल्पना है, जो भारत को गरीब ही रखना चाहता है। यह एक ऐसा आरोप होता, जिसे गांधी ने खुद ही कबूल कर लिया होता। उन्होंने निश्चित रूप से आर्थिक वृद्धि की संभावना को पहले ही देख लिया था, और उस हद तक इसका स्वागत भी किया होता, जहां इससे प्रत्येक व्यक्ति की ज़रूरतें पूरी हो जाएं, लेकिन वह लक्ष्मी की पूजा से जुड़े अपरिहार्य सहगामी परिणामों - सामाजिक-आर्थिक असमानता का घटिया स्तर, लगातार फैलती घटिया हरकतें तथा पर्यावरण को चौतरफा नुकसान - से घृणा भी करते थे। यदि वृद्धि कई की कीमत पर कुछ को लाभ पहुंचाए, व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करे, तथा प्रकृति के खिलाफ हो, यह गांधी जी को विचलित करता था, और इसी कारण उन्होंने इच्छाओं को नियंत्रित करने का विकल्प दिया, "सभ्यता, उसके वास्तविक अर्थ में, इच्छाओं को बढ़ाने में नहीं, उन्हें सोच-समझकर अपनी मर्ज़ी से नियंत्रित करने में है... इसीलिए, अनगिनत इच्छाओं को पालना तथा उन्हें पूरा करना एक जाल और भ्रम है..."

रामाकृष्णन साफ लिखते हैं कि ऐसा भारत, जिसमें एक हिंसक साम्राज्य को राजनैतिक-औद्योगिक दिग्गजों के ऐसे गठजोड़ से बदल दिया जाए, जो भ्रष्ट तथा निरंकुश हो, गांधी का आदर्श नहीं था। सबसे बुरे वक्त की आशंका से गांधी ने चेताया था, "आज भारत में जो भी महल दिख रहे हैं, वे रईसी का नहीं, उस ताकत की ऐंठ का प्रदर्शन हैं, जो रईसी ने कुछ को दी, जबकि वह ताकत आई उस अथक परिश्रम से थी, जो वास्तव में लाखों गरीबों ने किया..." उस वक्त वे महल सामंती महाराजाओं और नवाबों के थे, और अब वे दलाल स्ट्रीट और नरीमन प्वाइंट के रहने वालों के हैं।

गांधी ने यह भी पहले ही देख लिया था कि भारत में कामयाब हो जाने वाले लोग ही उन लोगों के रास्ते का सबसे बड़ा कांटा बनेंगे, जो अभी नाकामयाब हैं। रामाकृष्णन उस जवाब की याद दिलाते हैं, जो गांधी जी ने एक अमेरिकी मिशनरी को दिया था, जब उसने पूछा, वह भारत में किस बात से सबसे ज़्यादा हताशा महसूस करते हैं। गांधी जी ने जवाब दिया था, "पढ़े-लिखे हिन्दुस्तानियों की संगदिली..." अब पढ़े-लिखे हिन्दुस्तानियों की तादाद कई गुना बढ़ चुकी है, और साथ ही लगातार फैलते मध्यमवर्ग की संगदिली भी। रामाकृष्णन कहते हैं, "गांधी की समझदारी थी कि उन्होंने शहरों में बसे भारतीयों को अपनी अंतरात्मा का सामना करने पर मजबूर किया, और उनके दिमाग में यह बिठा दिया कि जब तक ग्रामीण भारत का खून चूसा जाता रहेगा, भारत की वास्तविक प्रगति हो ही नहीं सकती..." 21वीं सदी के भारत में गरीबों के प्रति उदासीनता अब अपने लिए कामयाबी और बेहतरी पर ही पूरे ध्यान के साथ जुड़ गई है। गांधी जी ने चेतावनी भी दी थी, "भारत के लिए सोने की भेड़ के पीछे भागना मृत्यु का आलिंगन करने जैसा है... क्या खत्म न होने वाली भौतिक प्राप्तियों पर टिका कल्पनालोक संभव भी है, इसकी कामना की बात तो जाने ही दें..."

इसी वजह से उन्होंने विकास के उस मॉडल को प्राथमिकता दी, जिसमें सभी की भागीदारी हो - पंचायत राज - भले ही इसका अर्थ यह हो कि देश का आर्थिक स्तर पर प्रदर्शन मामूली रह जाए, क्योंकि वैसा भारत बराबरी का भारत होगा, जिसमें सभी के लिए सम्मान होगा, जहां किसी व्यक्ति की सामर्थ्य को सर्वोच्च समझा जाएगा, और उस कारण उसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित हो जाएगी; यह ऐसा भारत नहीं होगा, जहां कुछ लोग ही बेपनाह तरक्की करेंगे, जबकि बाकियों को नीचे पड़े रहकर बदहाली की ज़िन्दगी बितानी होगी। वह हमेशा से कामयाब लोगों के स्वार्थ से चौकन्ने थे। उनका पैमाना कभी भी यह नहीं रहा कि कामयाब व्यक्ति कितना ऊंचा उठा, बल्कि यह था कि गरीब व्यक्ति कितना ऊंचा उठाया गया, व ज़्यादा कामयाब लोगों ने अपनी खपत को कितना कम किया, ताकि बाकी उनके बराबर आ सकें। यह वह सबक है, जो नव-उदारवादी भारत ने न सिर्फ भुला दिया है, बल्कि उसका मज़ाक भी उड़ाते हैं। रामाकृष्णन याद दिलाते हैं कि गांधी जी ने हमें सावधान किया था, "उन पापों और गलतियों के परिणाम बहुत भारी होते हैं, जो संपत्ति, शक्ति और प्रतिष्ठा मनुष्य से करवा लेते हैं..." और उनका प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो तेने ही कहिए जे, पीर पराई जाने रे...' भी यही कहता है, और यही हमारे गणराज्य का संघर्षगान होना चाहिए।

कुछ ऐसे वाक्य, जिनका ज़िक्र रामाकृष्णन ने नहीं किया है, उनमें से मैं ध्यान दिलाना चाहूंगा, उस जवाब को, जो गांधी जी ने एक संवाददाता को दिया था, जिसने पूछा था कि आज़ाद भारत के लिए उनका 'सपना' क्या है। गांधी जी ने जवाब दिया था, "मैं ऐसा भारत पाने के लिए काम करूंगा (ध्यान दें, 'सपना' नहीं, 'काम करूंगा'), जिसमें सबसे गरीब भी महसूस करें कि यह उनका देश है (ध्यान दें, कार्यक्रमों के 'मालिकाना' भाव पर ज़ोर उनके कल्याण के लिए था, और 'अपनेपन' पर ज़ोर देश की खातिर), जिसके निर्माण में (ध्यान दें, व्यक्ति देश-निर्माता है) उनकी आवाज़ प्रभावी होगी (ध्यान दें, सिर्फ आवाज़ नहीं, सबसे गरीब के वोट देने के संदर्भ में 'प्रभावी आवाज़'), एक निर्णायक आवाज़, जो उनका ही नहीं, देश का भी भविष्य निर्धारित करेगी..." अब जहां गांधी जी उस समय निराश हो गए थे, जब संविधान सभा ने हमारे लोकतंत्र के आधारभूत स्वरूप के रूप में गांवों में लोकतंत्र को ठुकरा दिया, वहीं राजीव गांधी की बदौलत हमारे पास संविधान के 'IX' तथा 'IX ए' भाग हैं, जिनके जरिये लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को भारत के ग्रामीण तथा शहरी, दोनों हिस्सों में स्थापित किया गया। एक ऐसे आर्थिक मॉडल पर ध्यान देते हुए, जो संपत्ति और आय को कुछ ही लोगों तक सीमित कर देता है और इस तरह, रामाकृष्णन के शब्दों में, 'हमारी चुनावी प्रक्रिया के कुछ हिस्सों का निजीकरण करते हुए', संविधान के इन बेहद महत्त्वपूर्ण प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने की नाकामी हमारे लोकतंत्र और विकास, दोनों के लिए खतरनाक है। हमें ऐसे भारत की ज़रूरत है, जैसा गांधी चाहते थे, "जिसमें गरीब को भी उतनी ही ताकत हासिल हो, जितनी देश के सबसे अमीर आदमी को..."

खासा फैलाव देते हुए, वैश्विक अर्थव्यवस्था के नव-उदार निजीकरण तथा वैश्वीकरण की 21वीं सदी की खासियतों के साथ-साथ रामाकृष्णन ने वैश्विक आतंकवाद, वैश्विक बहु-संस्कृतिवाद तथा वैश्विक पर्यावरण से जुड़े सवालों का भी ज़िक्र किया, ताकि यह पूछा जा सके कि क्या गांधी जी ने इन मुद्दों के बारे में, जो 66 वर्ष पहले गांधी की हत्या के समय तक वैश्विक शब्दकोश में दाखिल भी नहीं हुए थे, कुछ प्रासंगिक कहा था। उनके जवाब न सिर्फ चौंका देते हैं, बल्कि ज्ञान भी देते हैं।

आतंकवाद पर, गांधी जी ने समझाया था कि आतंकवादी तभी कामयाब होता है, जब वह मोटे तौर पर जनसाधारण में भय और खलबली मचा दे, और सरकार को मजबूर कर दे कि वह ज़्यादा से ज़्यादा अधिकारवादी हो जाए, और मुश्किल से हासिल की हुई व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं की रक्षा करने में कम से कम उदार हो जाए। गांधीवाद का रूढ़िवादी जवाब होगा कि आतंकवाद से आतंकित न हों, बल्कि उसका निडरता के साथ सामना करें... "हत्या के जरिये न्याय न तलाशें, क्योंकि उससे हमारे ही लोग हमारे अत्याचार का शिकार बनेंगे..." कैसे एक भविष्यदृष्टा की तरह गांधी 'बाटला हाउस' को इतना वक्त पहले साफ-साफ देख पाए थे? इसके बजाय वह चाहते थे कि हम आतंकवाद का सामना 'दयालु, सत्यनिष्ठ, विनम्र, ज्ञानी, ज़िद्दी होने के साथ-साथ स्नेही बनकर, तथा कभी भी अपराधी तथा घृणायोग्य बनकर नहीं' करें... यह ऐसा सबक है, जो 21वीं सदी में बराक ओबामा से लेकर पुलिस के बीट हवलदार तक सभी को सीखना चाहिए।

बहु-संस्कृतिवाद के बारे में, जो 21वीं सदी में वैश्विक स्तर पर अनिवार्य है, रामाकृष्णन बताते हैं, "गांधी ने कहा था, भेदों (भिन्नताओं) के लिए निपटने के लिए कोई भी साधन नहीं हो सकता, सिवाय उससे आगे बढ़ जाने के... किसी भी समूह या शक्ति के विरुद्ध नफरत फैलाने का मार्ग अंततः एक अभिशाप है..." आशा की एकमात्र किरण, जैसा गांधी ने समझा, इस बात से इनकार कर देने में है कि "मैं अपने घर के चारों तरफ दीवारों बना लूंगा, और खिड़कियों को हमेशा के लिए बंद कर लूंगा... मैं चाहता हूं कि मेरे घर में सभी ओर से दुनिया की सभी संस्कृतियां पूरी आज़ादी से हवा की तरह आ-जा सकें, लेकिन मैं इनमें से किसी एक से भी अपने पैर न उखड़ने दूं..." यह सबक सभी के लिए है, सिर्फ भारतीयों के लिए नहीं, क्योंकि आज का विश्व, खासतौर से विकसित विश्व, दुनिया के दक्षिणी छोर से उत्तरी छोर तक मानव इतिहास के सबसे ज़्यादा प्रवासन को झेल रहा है। भारत के लिए, और सारी दुनिया के लिए भी, गांधी ने कहा था, "मैं यह नहीं चाहता कि मेरे सपनों का भारत पूरी तरह हिन्दू, पूरी तरह ईसाई या पूरी तरह मुसलमान हो जाए, बल्कि मैं चाहता हूं कि वह पूरी तरह सहिष्णु हो जाए..."

पर्यावरण पर, गांधी के हवाले से रामाकृष्णन बताते हैं, "भगवान न करे, पश्चिम की देखादेखी भारत कभी औद्योगिकीकरण को उसी तरीके से अपनाए... आज राजशाही से शासित एक छोटे-से द्वीप का आर्थिक साम्राज्यवाद पूरी दुनिया को ज़ंजीरों में जकड़े हुए है... अगर 30 करोड़ की आबादी (आज 130 करोड़) वाला पूरा देश इसी तरह का आर्थिक दोहन करने लगा, तो वह दुनिया को टिड्डियों की तरह खोखला कर डालेगा..." आज की दुनिया बड़ी व्यापारिक टिड्डियों द्वारा खोखली की जा रही है। हमारी पीढ़ी के लिए जलवायु परिवर्तन भविष्य की चुनौती नहीं है, आज और अभी की समस्या है। गांधी की चेतावनी - "जल्दी नतीजे पाने के लिए ज़मीन के उपजाऊपन के साथ खिलवाड़ अदूरदर्शिता है, और प्रलयंकारी नतीजे लेकर आएगा" - सच साबित हो चुकी है। एमआईटी की 'वृद्धि की सीमाएं' रिपोर्ट के हवाले से रामाकृष्णन उनकी भविष्यवाणी - "तेजी से खपत का बढ़ते चले जाना प्राकृतिक संसाधनों को खत्म कर देगा, और सीधे परिणाम के रूप में वैश्विक स्तर पर आर्थिक व्यवस्थाएं ढह जाएंगी" - की ओर इशारा करते हैं, ताकि गांधी जी के आग्रह को रेखांकित कर सकें, जिसमें उन्होंने कहा था कि वैश्विक पर्यावरणीय प्रलय को रोकने का एकमात्र निश्चित उपाय स्व-नियंत्रण ही है।

21वीं सदी गांधी से ज़्यादा दूर भी नहीं आई है। वह नई सहस्राब्दि के आगमन ने 50 से भी ज़्यादा साल पहले मर चुके थे, लेकिन अगर हम गांधी को प्रागैतिहासिक मानने लगें, तो हम खुद के साथ सबसे बड़ा अपकार करेंगे। यह सब हमें याद दिलाने के लिए हमें निरंजन रामाकृष्णन का हृदय से आभारी होना चाहिए।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति एनडीटीवी उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार एनडीटीवी के नहीं हैं, तथा एनडीटीवी उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।


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