यह ख़बर 17 जून, 2014 को प्रकाशित हुई थी

एक मरीज की जान बचाने को ठहर गया चेन्नई का ट्रैफिक

एक मरीज की जान बचाने को ठहर गया चेन्नई का ट्रैफिक

चेन्नई:

आम तौर पर चेन्नई की सड़कों पर शाम के वक्त इतनी भीड़ होती है कि 12 किलोमीटर का सफर तय करने में पौन घंटे लग जाएं। लेकिन सोमवार की शाम सरकारी अस्पताल से एक एंबुलेंस चली और 12 किलोमीटर का सफर सिर्फ 14 मिनट में तय कर फोर्टिस मलार अस्पताल पहुंच गई।

इस एंबुलेंस में एक जिस्म से निकाला हुआ धड़कता हुआ दिल था, जिसे सिर्फ 4 घंटे के भीतर दूसरे जिस्म में प्रत्यारोपित कर दिया जाना था। ये करिश्मा हुआ, क्योंकि जान बचाने की इस मुहिम में दो अस्पतालों के डॉक्टर और शहर के अफसर सब जुट गए। इस मुहिम के लिए शहर का ट्रैफिक रोक दिया गया।

इस सिलसिले की शुरुआत सुबह पांच पैतालीस पर हुई जब मलार अस्पताल को सरकारी अस्पताल से एक टेलीफोन गया। एक मरीज को वेंटिलेटर से हटाया जाना था और उसका दिल, जिगर और गुर्दा दूसरों को दिए जा सकते थे। फौरन किसी जरूरतमंद की तलाश शुरू हुई और मुंबई की 21 साल की वोवी मीनोचरचोमजी खुशक़िस्मत निकली, जिनका ब्लड ग्रुप और वजन दोनों मृतक के बराबर थे।

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इसके बाद दोनों जगहों पर लगभग साथ−साथ तैयारी चली। शाम साढ़े पांच बजे मरीज का दिल निकाला गया और दूसरे मरीज की तैयारी शुरू हुई। चेन्नई पुलिस के एडिशनकल कमिश्नर ट्रैफिक से अनुरोध किया गया कि वह रास्ता खाली कराएं, जिसको लेकर वह फौरन हरकत में आ गए।

शाम 6 बजकर 44 मिनट पर डॉक्टरों की एक टीम निकाला हुआ दिल लेकर चली। इसे 4 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान पर एक स्पेशल कंटेनर में रखा गया था। और सिर्फ 13 मिनट 22 सेकेंड में सौ किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ती एंबुलेंस फोर्टिस मलार पहुंच गई।

फोर्टिस मलार में हृदय रोग विज्ञान के निदेशक डॉ. केआर बालाकृष्णन ने कहा, 'हृदय पाने वाली हवोवी मिनोचेरहोमजी की हालत सुधर रही है और उसके अभिभावक काफी खुश हैं।' उन्होंने कहा कि चिकित्सकीय रूप से मृत (ब्रेन डेड) रोगी का हृदय निकालने के बाद इसे चार घंटे के अंदर प्रतिरोपित किया जाना था और पुलिस के सहयोग से ऐसा किया गया।