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मुज़फ़्फ़रनगर पुलिस की करतूत, बेगुनाह होने के बावजूद उपद्रवी बता जेल में डाला, 11 दिन बाद हुई रिहाई

20 दिसंबर को मुज़फ़्फ़रनगर में CAA के ख़िलाफ़ हुए हिंसक प्रदर्शन के मामले में 200 से ज़्यादा लोगों को संगीन धाराओं में जेल भेजा गया था, लेकिन इनमें 4 ऐसे बेगुनाह हैं जिन्हें पुलिस ने उपद्रवी बना कर जेल में डाल दिया था.

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मुज़फ़्फ़रनगर :

20 दिसंबर को मुज़फ़्फ़रनगर में CAA के ख़िलाफ़ हुए हिंसक प्रदर्शन के मामले में 200 से ज़्यादा लोगों को संगीन धाराओं में जेल भेजा गया था, लेकिन इनमें 4 ऐसे बेगुनाह हैं जिन्हें पुलिस ने उपद्रवी बना कर जेल में डाल दिया था. बड़ी मशक़्क़त के बाद इन्हें 11 दिन बाद जेल से छोड़ा गया. इन चार में से तो एक यूपी सरकार के मुलाजिम हैं. एनडीटीवी ने इन तमाम बेगुनाह लोगों से मुलाकात की, जिन्हें पुलिस ने बेवजह जेल में डाल दिया था. जब हम फ़ारूक़ के घर पहुंचे तो देखा कि घर का सारा सामान बिखरा पड़ा है. 56 साल के फ़ारूख़ मुज़फ़्फ़रनगर के सेवायोजन कार्यालय में बड़े बाबू यानी सरकारी मुलाज़िम हैं. हिंसा वाले दिन फ़ारूख़ शाम 6 बजे तक अपने दफ़्तर में थे, लेकिन देर रात पुलिस उनके घर पहुंची.

पुलिस ने पहले तो घर में तोड़फोड़ की और फिर फ़ारूख़ और उनके बेटे को पीटते हुए जेल ले गई. हिंसा वाले दिन सरकारी दफ़्तर में होने के तमाम सबूत दिखाने के बाद पुलिस ने 11 दिन बाद फ़ारूख़ को जेल से छोड़ दिया. जेल में गुज़ारे 11 दिन याद करके फ़ारूख़ भावुक हो जाते हैं. वे बताते हैं कि उन्होंने पुलिस वालों को बार-बार अपना कार्ड दिखाया और बताया भी कि वो सरकारी मुलाजिम हैं और हिंसा के वक़्त वो दफ़्तर में मौजूद थे. लेकिन पहले उन्हें पीटा गया और फिल जेल में डाल दिया गया. न ओढ़ने को कंबल दिया न खाने को ढंग का खाना. जब परिवार वाले तमाम दस्तावेज़ और हाज़िरी रजिस्टर लेकर मजिस्ट्रेट से मिले तब कहीं जाकर वो 11 दिन बाद जेल से छूटे हैं. फ़ारूख़ का 21 साल का बेटा अब भी जेल में है.

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इसी तरह, 55 साल के ख़ालिद हिंसा वाले रोज़ अपने 26 साल के बेटे शोएब और 22 साल के भतीजे अतीक के साथ अपने 52 साल के किडनी के मरीज़ चाचा हारून की डॉयलिसिस कराने मेरठ जा रहे थे. लेकिन पुलिस ने इन्हें गाड़ी से उतार कर पहले जमकर पीटा और फिर ख़ालिद, शोएब और अतीक को जेल में बंद कर दिया. ख़ालिद बताते हैं कि पुलिस ने बिना कुछ पूछे पहले तो तीनों की जमकर पिटाई की और फिर बस में डालकर जेल ले गई. ख़ालिद लगातार मेडिकल रिपोर्ट्स दिखाते रहे लेकिन पुलिस सुनने के लिए तैयार नहीं हुई. 21 साल के छात्र अतीक कहते हैं कि जेल में काटे वो 11 दिन उनकी ज़िंदगी के सबसे ख़राब दिन थे.

अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए उन्हें न जाने कितने लोगों के हाथ पैर जोड़ने पड़े. वहीं, 26 साल के शोएब कहते हैं कि अब उनका भरोसा पुलिस से पूरी तरह उठ चुका है. पुलिस का कहना है कि जांच में जिसको भी निर्दोष पाया जा रहा उसे छोड़ा भी जा रहा है. मुज़फ़्फ़रनगर के SP सतपाल अंटिल का कहना है कि पुलिस जांच में जिनको भी निर्दोष पा रही है उन्हें छोड़ा जा रहा है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि बिना जांच किए निर्दोष लोगों को जेल कैसे भेजा गया और सबसे बड़ी बात कि इनकी पिटाई क्यों की गई. 



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