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महाकाल में रो पड़ीं एवरेस्ट फतह करने वाली अरुणिमा, मंदिर की अव्यवस्था की हुई शिकार, ट्वीट करके बताई आपबीती

अपने इस बुरे अनुभव के बारे में अरुणिमा ने सोशल मीडिया पर लिखा है. इसी बारे में जब एनडीटीवी इंडिया ने उनसे बात की तो उन्होंने अपने साथ हुई परेशानी और अपमानजनक स्थिति को बहुत ही भावुकता से बयां किया.

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महाकाल में रो पड़ीं एवरेस्ट फतह करने वाली अरुणिमा, मंदिर की अव्यवस्था की हुई शिकार, ट्वीट करके बताई आपबीती
नई दिल्‍ली: एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा फहरा चुकीं जानी-मानी पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा को महाकाल का दर्शन हिमालय पर चढ़ने से भी कठिन साबित हुआ. हालांकि इस कठिनाई के बाद भी वो गर्भ गृह जाकर भगवन शिव के दर्शन नहीं कर सकीं. अपने इस बुरे अनुभव के बारे में अरुणिमा ने सोशल मीडिया पर लिखा है. इसी बारे में जब एनडीटीवी इंडिया ने उनसे बात की तो उन्होंने अपने साथ हुई परेशानी और अपमानजनक स्थिति को बहुत ही भावुकता से बयां किया. अरुणिमा ने बताया कि मध्य प्रदेश महिला एवं बाल विकास विभाग मंत्री अर्चना चिटनिस के बुलावे पर युवाओं के एक सम्मलेन को संबोधित करने के लिए 23 दिसम्बर को बुरहानपुर गई थीं. इस दौरान थोड़ा वक़्त निकाल कर वह अगले दिन सुबह 5 बजे उज्‍जैन के महाकाल मंदिर दर्शन के लिए गईं. चूंकि वो मंत्री कि मेहमान थीं, लिहाज़ा मंदिर प्रशासन को अरुणिमा के आने के बारे में पहले ही बता दिया गया था.
 



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जब अरुणिमा वहां पहुंची और मंदिर के अंदर जाने लगीं तो मंदिर के कर्मचारियों ने उन्हें यह कह कर रोक दिया कि वो लोअर, टी-शर्ट और जैकेट पहन कर मंदिर के अंदर नहीं जा सकतीं. अरुणिमा बताती हैं कि हालांकि वहां मंदिर के अंदर जाने के लिए किसी ड्रेस कोड को बारे में मंदिर में उन्हें कुछ भी लिखा हुआ नहीं दिखा. इसके अलावा अरुणिमा दिव्यांग हैं और उनके पैर कृत्रिम हैं, लिहाज़ा उन्हें इन कपड़ों में ठंढ के दिनों में पैरों में आराम मिलता है. अरुणिमा ने सारी बात वहां मंदिर कर्मियों को समझाने कि पूरी कोशिश भी की पर किसी ने उनकी बातों को अहमियत नहीं दी.

 

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भावुक अरुणिमा कहती हैं कि 'जब दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर जाने से भगवान ने नहीं रोका लेकिन यहां भगवान के दर्शन करने से इंसानों ने रोक दिया. भगवान शंकर के दर्शन करने जब मैं महाकाल गई तो जो कुछ मुझे सहना पड़ा, वो मेरे लिए बहुत बुरा अनुभव था. मैं भगवान शिव कि भक्त हूं और महाकाल मंदिर पहुंच कर भी भगवान के दर्शन मैं नहीं कर पाऊंगी, ये सोच कर मेरी आखों में आसूं आ गए. मैंने थोड़ी जिद की तो उन्होंने महिला पुलिसकर्मी को बुला लिया और मुझे जताया गया कि अगर और मैंने और जिद कि तो वो मुझे धक्का देने से भी नहीं चूकेंगे. आखिरकार, गर्भगृह तक गए बिना ही मुझे वापस जाना पड़ा. हालांकि बाद में मंदिर प्रशासन ने मुझे फ़ोन कर पूरी घटना पर खेद भी जताया. वैसे भी मेरा इरादा किसी पर निशाना साधना नहीं है. मैं तो बस ये बताना चाहती हूं कि देश में मुझे लोग जानते हैं इसलिए मेरी आवाज़ आप लोगों तक पहुंच जाती है, लेकिन आम दिव्यांग की बात कैसे पहुंच पाएगी. आगे किसी दिव्यांग के साथ इस तरह की दुखद  स्थिति पैदा न हो यही मेरा मक़सद है, लिहाज़ा मैंने सबके सामने अपनी बात रखी है.'

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